सोमवार, 19 दिसंबर 2016

पाकिस्तान पर अमेरिका की दोहरी नीति : डॉ. मयंक चतुर्वेदी


पाकिस्तान कई वर्षों से लगातार आतंकवाद को प्रश्रय दे रहा है, यह बात आज विश्व जानता है, ऐसे में यह कहना बिल्कुल गलत होगा कि अमेरिका से यह बात छिपी हुई है, किंतु उसके बाद भी अमेरिका आतंकवाद को समाप्त करने एवं अन्य सामाजिक व्यवस्था में सुधार के नाम पर लगातार पाकिस्तान को कई हजार करोड़ डालर की आर्थिक सहायता कर रहा है। भारत द्वारा अनेक अवसरों पर अंतर्राष्ट्रीय मंचों से इस बात को साझा करने के साथ प्रमाण स्वरूप दस्तावेज भी दुनिया के सामने सौंपे जा चुके हैं कि किस तरह से हिन्दुस्तान का यह पड़ौसी मुल्क आतंकवाद को हवा देकर दहशतगर्दों को प्रोत्साहित करने एवं उन्हें हर संभव सहायता देने में लगा हुआ है।

अभी दो माह पूर्व ही अमेरिका के दो बड़े राजनीतिक दलों के दो प्रभावशाली सांसदों ने पाकिस्तान को आतंकवाद प्रायोजित करने वाला देश घोषित करने के लिए प्रतिनिधिसभा में एक विधेयक पेश किया था। उस वक्त कांग्रेस के सदस्य एवं आतंकवाद पर सदन की उपसमिति के अध्यक्ष टेड पो ने कहा था कि अब समय आ गया है कि हम पाकिस्तान की धोखाधड़ी के लिए उसे धन देना बंद कर दें और उसे वह घोषित करें जो वह है, 'आतंकवाद को प्रायोजित करने वाला देश'। इसी के साथ ही दूसरे सांसद डेमोक्रेटिक पार्टी से कांग्रेस के सदस्य डाना रोहराबाचर ने भी ‘पाकिस्तान स्टेट स्पॉन्सर ऑफ टेरेरिज्म डेजिगनेशन एक्ट’ को सदन में पेश किया था। 


पो ने तो अमेरिकी संसद में यहां तक बताया था कि क्यों पाकिस्तान विश्वास करने योग्य देश नहीं। अमेरिका सरकार द्वारा उसकी आर्थिक सहायता इसलिए बंद कर देनी चाहिए कि उसने अमेरिका के शत्रुओं की वर्षों मदद की है और उन्हें बढ़ावा दिया है। यह सच भी है कि ओसामा बिन लादेन को शरण देने से लेकर हक्कानी नेटवर्क के साथ उसके निकट संबंध तक, सभी में पाकिस्तान के संलिप्त होने के पर्याप्त सबूत मौजूद हैं, जिनसे साफतौर पर दिखाई देता है कि किस तरह पाकिस्तान की आतंकवाद के खिलाफ जंग सिर्फ दिखावाभर है। जब यह विधेयक प्रस्तुत किया गया, तब चहुंओर संदेश गया था कि भारत जिस बात को वर्षों से कहता आया है कि पाकिस्तान आतंकवादियों की आश्रय-स्थली है, उस बात को अब अमेरिका ने भी स्वीकार कर लिया है।

अमेरिका के जितने भी पूर्व राष्ट्रपति रहे और वर्तमान राष्ट्रपति तक, सभी आतंकवाद के मुद्दे पर एकमत देखे गए हैं, जिसमें सभी की एक बात समान है कि वह आतंकवाद को कहीं बढऩे नहीं देंगे, जहां होगा भी तो मानवता के हित में उसे वहां जाकर जड़ से समाप्त करने में कोई देरी नहीं करेंगे, किंतु उन तमाम राष्ट्रपतियों की बात पाकिस्तान के मामले में अब तक गलत साबित होती आ रही है। आगे डोनाल्ड ट्रम्प से यह अम्मीद की जा रही है कि वे जरूर इस विषय को गंभीरता से लेंगे और पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित कर उसे दिया जा रहा धन देना बंद कर देंगे। लेकिन कभी-कभी पुराने अनुभव को देखकर लगता है कि वे भी कहीं ऐसा न हो कि पाकिस्तान को लेकर आतंकवाद समाप्त करने की बात हवा में करते रहे हों। क्योंकि यदि अमेरिका की नीति ही इस प्रकार की है तो उसे ही आगे बढ़ाना ट्रंप की मजबूरी साबित होगी, जो हर हाल में मानवता की विरोधी है।

इस सबके बीच बात अब पाकिस्तान और आतंकवाद के बीच कैसा गहरा नाता है इसे लेकर हालिया अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन ने जो एक रिपोर्ट जारी की है, उसकी हो जाए। इस रिपोर्ट में उसने पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद को पालने-पोसने पर गंभीर चिंता जताई है। उसके मुताबिक तालिबान, हक्कानी व अन्य कई आतंकी समूह पाकिस्तान में पूरी आजादी के साथ अपने कारनामों को अंजाम दे रहे हैं।

पिछले छह महीनों में इन्हें रोकने की पाकिस्तान की कोशिशें नाकाम रही हैं। यहां पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सरहद पर बड़ा इलाका इन आतंकी संगठनों के लिए महफूज बना हुआ है। ये संगठन यहां बैठकर दुनियाभर में आतंक फैला रहे हैं। अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन तथ्यों के आधार पर आज यह बता रहा है कि यहां कई प्रमुख आतंकी संगठन एक साथ काम कर रहे हैं। कुछ मामलों में मिलजुलकर और कुछ में अलग होकर यहां पर यह संगठन सक्रिय हैं। इन आतंकी संगठनों में तालिबान वह संगठन है, जिससे 60 हजार से ज्यादा आतंकी जुड़े हुए हैं। अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज ने जब इसे खदेड़ दिया, तो यह पाकिस्तान में अपना अड्डा बनाने में सफल हो गया।

हक्कानी नेटवर्क, जिसमें 15 हजार आतंकवादी हैं ने अपना मुख्य कार्यालय यहां खोला हुआ है। 40 हजार आतंकियों की ताकत रखने वाला अल-कायदा को यहां कोई रोकटोक नहीं है। भारतीय उपमहाद्वीप में सक्रिय 600 आतंकवादियों का एक्यूआइएस अल कायदा का आतंकी संगठन इस क्षेत्र में फलफूल रहा है। इसी प्रकार लश्कर-ए-तैयबा, 50 हजार से ज्यादा आतंकियों को जोडक़र भारतीय उपमहाद्वीप में सक्रिय है, जिसका उद्देश्य भी स्पष्ट है कि वह कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाना चाहता है। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान आतंकी संगठन में 25 हजार लोग जुड़े हुए बताए जाते हैं। एक संगठन आइएसआइएल-के हैं, जिसमें एक हजार आतंकी सक्रिय हैं। इस्लामिक स्टेट (आईएस) का समूह, इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उज्बेकिस्तान भी पाकिस्तान की धरती से अपने आतंक के मंसूबों को हवा देने में लगा है।  

अभी जब दो माह पूर्व उड़ी में पाकिस्तानी आतंकियों ने भारतीय सेना पर हमला किया था तब भी हमले में पाकितान के लोगों के शामिल होने के ठोस सबूत मिले थे। पठानकोट हमले के बाद तो पाकिस्तान ने यह स्वीकार ही कर लिया था कि इन हमलों में पाकिस्तान के कुछ संगठन शामिल थे। जिसके कारण ही आगे पाकिस्तान ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को दिखाने के लिए उन संगठनों के खिलाफ कुछ दिनों के लिए प्रतिबंध भी लगाए। ऐसे ही मुंबई में हुए सीरियल ब्लास्ट से जुड़ा मामला हो या फिर अजमल कसाब के जिंदा पकड़े जाने का विषय अथवा अन्य फिर कोई और भारत पर हुए आतंकी हमले का मामला, सभी में पाक की भूमिका किसी न किसी स्तर पर अवश्य मिलती रही है। किंतु इसके बाद भी अमेरिका सदैव से पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करने से बचता रहा है। इससे साफ नजर आता है कि अमेरिका ने आतंकवाद पर अपनी दोहरी नीति अपना रखी है, एक तरफ उसका रक्षा विभाग कहता है कि पाकिस्तान आतंक पोषित देश है तो दूसरी ओर अर्थिक सहयोग देकर अप्रत्यक्ष रूप से आतंक को बढ़ावा देने में भी अमेरिका किसी न किसी तरह लगा हुआ दिखाई देता है।

(लेखक : हिन्दुस्थान समाचार के रीजनल हेड एवं सेंसर बोर्ड एडवाइजरी के सदस्य हैं।)

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