शनिवार, 19 अगस्त 2017

हिन्‍दू मंदिरों के प्रति मुगलों की क्रूरता आज फिर देखने को मिली

ध्‍यप्रदेश की संस्‍कारधानी में आज प्रवास के दौरान इतिहास के उस सच से सामना हुआ, जिसमें हिन्‍दू मंदिरों के प्रति मुगलों की नफरत और क्रूरता को प्रत्‍यक्ष देखा । इसे देखकर अनुभूति यही हुई कि भारतवर्ष में मुगलों ने धर्मांध होकर दो निशान, दो पहचान के आधार पर देश का विभाजन भले ही करवा लिया हो लेकिन वह इस भारत भू से सनातन संस्‍कृति को अपने लाख प्रयत्‍नों के बाद भी नहीं मिटा पाए। धन्‍य हैं वे हिन्‍दू स्‍वजन जिन्‍होंने समय समय पर प्राणोत्‍सर्ग करना उचित समझा, जिन्‍होंने पलायन उचित समझा किंतु अंत तक अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा।

असल में मैं बात कर रहा हूँ, जबलपुर के भेड़ाघाट स्थित चौसठ योगिनी मंदिर की । इस चौसठ योगिनी मंदिर का निर्माण 10 वीं सदी में हुआ था। जिसे त्रिपुरी के कल्चुरि शासक युवराजदेव प्रथम ने अपने राज्य विस्तार के लिए योगिनियों का आशीर्वाद लेने की मंशा से बनवाया था।

ये चौसठ योगनियां बहुरूप, तारा, नर्मदा, यमुना, शांति, वारुणी क्षेमंकरी, ऐन्द्री, वाराही, रणवीरा, वानर-मुखी, वैष्णवी, कालरात्रि, वैद्यरूपा, चर्चिका, बेतली, छिन्नमस्तिका, वृषवाहन, ज्वालाकामिनी, घटवार, कराकाली, सरस्वती, बिरूपा, कौवेरी, भलुका, नारसिंही, बिरजा, विकतांना, महालक्ष्मी, कौमारी, महामाया, रति, करकरी, सर्पश्या, यक्षिणी, विनायकी, विंध्यवासिनी, वीर कुमारी, माहेश्वरी, अम्बिका, कामिनी, घटाबरी, स्तुती, काली, उमा, नारायणी, समुद्र, ब्रह्मिनी, ज्वाला मुखी, आग्नेयी, अदिति, चन्द्रकान्ति, वायुवेगा, चामुण्डा, मूरति, गंगाधूमावती, गांधार, सर्व मंगला, अजिता, सूर्यपुत्री वायु वीणा, अघोर और भद्रकाली हैं। 

किंतु इस मंदिर का दुखद पक्ष यह है कि इन समस्‍त चौसठ योगिनीयों में से एक भी मूर्ति ऐसी शेष नहीं जोकि सही सलामत छोड़ी गई हो। हिन्‍दू आस्‍था के साथ मुगल विद्वेष की यह सभी मूर्तियां जीता जागता प्रमाण हैं।

इतिहास हमें बताता है‍ कि आतातायी औरंगजेब के आदेश पर उसकी मुगल सेना ने इन सभी मूर्तियों को खण्डित किया था। अक्‍सर ऐसे विषयों पर धर्मनिरपेक्षता के चलते कई पढ़े लिखे लोग, पत्रकार तक जिन्‍हें सत्‍य का साक्षी और कलम का सिपाही कहा जाता है, बोलने एवं लिखने में संकोच करते हैं,  किंतु यहां उनसे इतनाभर कहना है कि क्‍या सच छिपाने से इतिहास बदल जाएगा । जब मैं इस स्‍थान को देख रहा था तो विचार बार बार यही आ रहा था कि इतने ऊँचें स्‍थान पर तत्‍कालीन समय में इस मंदिर निर्माण में मूर्तिकारों का कितना श्रम एवं समय लगा होगा। मंदिर नर्मदा और बाणगंगा के संगम पर स्थित 500 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्‍थ‍ित है।

आज त्रिभुजी कोण संरचना पर आधारित इस मंदिर में योगिनियों की खंडित मूर्तियां बार बार यही पुकार रही हैं कि यदि कोई प्राचीन भग्‍नावशेषों को सुधारने की आधुनिकतम वैज्ञानिक प्रक्रिया हो तो आओ यहां हम पर अपनाओ। हमें पुन: अपने पुराने अस्‍तित्‍व में पुनर्जीवित होने दो । कोई तो सुध लो हमारी। मध्‍यप्रदेश पुरातत्‍व विभाग ने अब तक जो किया वह अच्‍छा, लेकिन जो वो नहीं कर पा रहा, उस बारे में कोई सोचे तो कितना अच्‍छा हो…….


मंगलवार, 8 अगस्त 2017

साहब, कुछ तो पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के नाम का खयाल करते....?

रो.रामदेव भारद्वाजचुनौतियां कम नहींसंदर्भ हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय को आखिरकार नए कुलपति प्रो.रामदेव भारद्वाज के रूप में मिल गए। इसी के साथ लम्‍बे समय से कुलपति के लिए चल रहा इंतजार समाप्‍त हुआ । किंतु इसी के साथ जो इस विश्‍वविद्यालय को गढ़ने का वृहत्तर कार्य उनके कंधों पर आन पढ़ा हैवह किसी चुनौती से कम नहीं है। वस्‍तुत: यह चुनौती इसलिए है क्‍योंकि कई मोर्चों पर अभी इस हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय का कायाकल्‍प करने हेतु कार्य किया जाना शेष है।

पूर्व में माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय के कुलाधिसचिव एवं भोज मुक्‍त विश्‍वविद्यालय के निदेशक रहे प्रो. रामदेव भारद्वाज ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि सार्थक और सकारात्मक सोच के साथ जब कोई भी कार्य किया जाएगा तो उससे समाज और देश का उत्थान होगा। वास्‍तव में उनके इस विचार से यह तो ठीक से समझ आ जाता है कि वे किस प्रकार के आग्रही और कैसी सोच रखनेवाले व्‍यक्‍ति हैं। सही भी हैहमें ओर समुची दुनिया को विस्‍तार देने का कार्य सोच की सही दिशा में आगे बढ़ने के कारण ही संभव हो सका हैऔर जहां नकारात्‍मक सोच हैवहां चहुंओर विध्‍वंस भी आज सीधेतौर पर देखा जा रहा हैइसलिए भी भारद्वाज कोई भी कार्य करने की सही दिशा एवं आवश्‍यक शर्त को लेकर जो कहते हैं वह सही जान पढ़ता है।

अब जरा हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय के बारे में भी जान लें। राज्‍य में हिन्‍दी विश्‍ववि़द्यालय मध्यप्रदेश सरकार द्वारा 19 दिसम्बर 2011 को स्‍थापित किया गया। 30 जून 2012 को प्रो॰ मोहनलाल छीपा इस विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति नियुक्त हुए। 6 जून 2013 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने इसकी आधारशि‍ला रखी । विश्वविद्यालय का उद्देश्‍य रखा गया विज्ञानतकनीकीचिकित्साकला और वाणिज्यमानविकी से जुड़े विषयों की शिक्षा हिन्‍दी में प्रदान करना। अगस्त 2013 से विश्वविद्यालय में शिक्षण कार्य प्रारम्भ कर दिया गया।

मोहनलाल छीपा जब यहां कुलपति बनाए गए तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौ‍ती थीपहले वे अपने यहां किन नए डिग्रीडिप्‍लोमा और प्रमाणपत्र पाठ्यक्रमों को आरंभ करें और उसके लिए आवश्‍यक कोर्ससिलेबस कितनी जल्‍दी तैयार कराये जा सकते हैं। प्रो. छीपा ने दिनरात एक करके नए विविध विषयों के पाठ्यक्रमों को तैयार करने में सफलता पाई। उनका शुरू से ही इस बात पर जोर था कि जब दुनिया के ताकतवर देशों में शुमार रूसइसराइलचीनजापानकोरियाऔर जर्मनी तथा अन्‍य वैश्‍विक राष्‍ट्रों में शिक्षा इन देशों की अपनी भाषा में दी जाती है और जिसकी प्राप्‍ति के बाद ये सभी देश तरक्की कर रहे हैं तो भारत में क्‍यों नहीं विज्ञानतकनीक एवं अन्‍य विषयों का अध्‍ययन हिन्‍दी में कराया जा सकता है जिस भाषा में विद्यार्थी स्‍वप्‍न देखता और विचार करता हैयदि उसी भाषा में उसे उच्‍च शिक्षा दी जाए तो वह निश्‍चित ही बहुत अधिक प्रतिभा सम्‍पन्‍न होकर अपने जीवन में श्रेष्‍ठता को प्राप्‍त करेगा।

प्रो. छीपा ने नए पाठ्यक्रम तैयार करने के साथ ही विज्ञान और तकनीक में हिन्‍दी भाषा में पुस्‍तक निर्माण की दिशा में बड़ा कार्य आरंभ किया जो अनवरत जारी है। डिग्री कोर्सेस में जैवविविधता में स्‍नातकोत्‍तरएलएलएममत्‍स्‍यकीबीएडइंजीनियरिंग में इलेक्ट्रिकलमकैनिकल एवं सिविल इंजिनियरिंग डिग्री और डिप्लोमा कोर्सों में दाखिला तथा इस क्षेत्र में करीब 250 सालों से कायम अंग्रेजी के वर्चस्व को तोड़ना उनके द्वारा अब तक किए गए संस्थापक कुलपति के रूप में वे स्‍थापित कार्य हैंवहीं योग के विविध पाठ्यक्रमगर्भ संस्‍कार तपोवन केंद्र जिनके लिए यह विश्‍वविद्यालय सदैव उन्‍हें याद करेगा। किंतु जो वह नहीं कर पाए वह हैंअपने यहां शिक्षक और अन्‍य कर्मचारियों की स्‍थायी भर्तीनियमित और संविदा आधारित। विश्‍वविद्यालय अभी भी राज्‍य उच्‍चशिक्षा विभाग के प्राध्‍यापकों के भरोसे ही चल रहा है। दूसरा जो बड़ा कार्य अब तक होना था वह था उसके अपने शिक्षा परिसर का निर्माण जोकि लम्‍बे समय से निर्माणाधीन ही है।

इसके अतिरिक्‍त जिस तरह की मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भोपाल में हुए विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन 2015 में इस विश्‍वविद्यालय के विकास को लेकर घोषणाएं की थीं, उसके अनुरूप उन घोषणाओं को अमलीजामा पहनाने के लिए जो कार्य होना चाहिए थादो वर्ष बीतने को हैं उस दिशा में कुछ भी कार्य संभव नहीं हो सका है। इस सम्‍मेलन में स्‍वयं मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह ने आगे होकर कहा था कि   मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय को अब अंतरराष्ट्रीय स्तर के संस्थान के तौर पर विकसित किया जाएगा।

इसके बाद मुख्‍यमंत्री शिवराजजी ने 18 अप्रैल 2017 को हुए इस विश्‍वविद्यालय के दीक्षान्‍त समारोह में उपस्‍थ‍ित छात्र-छात्राओं के बीच फिर एक बार अपनी बात को दोहराते हुए कहा था कि निज भाषा सब उन्नतियों का मूल है। हिन्दी के उदभट विद्वान के नाम पर देश का प्रथम हिन्दी विश्वविद्यालय प्रदेश की धरती पर है। यह गर्व का विषय है। विश्वविद्यालय की सभी जरूरत को पूरा किया जायेगा। यहां चिकत्‍सा पाठ्यक्रम शीघ्र शुरू होगा । मध्‍यप्रदेश की धरती पर संसाधनों की कमी प्रतिभा की उन्नति में बाधक नहीं बनने दी जाएगी। किंतु क्‍या ऐसा हकीकत में अब तक हुआ है इसका सीधा उत्‍तर हैनहीं हुआ । मुख्‍यमंत्री शिवराजजी ने जो कुछ भी कहा,वह विश्‍वहिन्‍दी सम्‍मेलन में किया गया उनका वायदा हो या फिर उसके बाद विविध कार्यक्रमों में प्रकट किए गए हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय के पक्ष में उनके विचार। शासन ने अपने मुख्‍यमंत्री के कहे शब्‍दों की पूर्ति अब तक किसी भी कारण से ही सही नहीं की है।

यह हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय एक बार में तो ऐसा प्रतीत होता है कि श्रद्धेय अटल जी के नाम का तिलक लगाकर अपने सौंदर्यबोध और आभा के प्रकटीकरण से उन परिस्‍थ‍ितियों में भी अब तक दूर बना हुआ हैजिसमें कि केंद्र से लेकर राज्‍य में उन्‍हीं अटल जी के तप से सिंचित सरकारें हैं। अभी जिस पुरानी विधानसभा परिसर में यह संचालित हैवह जर्जर अवस्‍था में है और पर्यटन निगम ने यहां अपना नवीनीकरण का कार्य आरंभ किया हुआ है। इसके चलते यह जहांगीराबाद स्थित शासकीय बेनजीर कॉलेज में शिफ्ट होने जा रहा है। लेकिन उसकी भी स्‍थ‍िति बहुत अच्‍छी नहींयानि की एक जर्जर अवस्‍था से निकलकर दूसरी अव्‍यवस्‍था के बीच इसके स्‍थान्‍तरित किए जाने की बात चल रही है।

वस्‍तुत: ऐसे में नए वीसी के सामने चुनौतियां अपार हैं। सबसे पहले उन्‍हें अपने यहां स्‍थायी कर्मचारियों के भर्ती किए जाने की आवश्‍यकता है। संस्‍था ने विज्ञान की डिग्री संबंधी पाठ्यक्रम तो शुरू कर दिएकिंतु उसने अपनी किसी एक विभाग की भी ठीक लेब अब तक विकसित नहीं है। प्रकाशन के स्‍तर पर जितना कार्य अन्‍य विश्‍वविद्यालयों ने कियाउस तुलना में यहां कार्य के प्रति न तो कोई स्‍थायी योजना दिखाई देती है और न ही कार्य । विश्‍वविद्यालय ने जो अपने रीजनल सेंटर खोले हैंउनका भी कार्य संतोषजनक नहीं माना जा सकता है।

यह भी इस विश्‍वविद्यालय के साथ एक बड़ा सच जुड़ा हुआ है कि आर्थि‍क स्‍तर पर शासन से जितनी अधिक मात्रा में इसे मदद मिलनी चाहिएवह इसे अब तक नहीं मिली है। पूर्व कुलपति अक्‍सर यह बात खुलकर भी कहते   रहेहमारे पास धन का बहुत अधिक अभाव हैहम चाहते तो बहुत कुछ करना हैं किंतु इस अभाव के चलते हम अपना श्रेष्‍ठ नहीं दे पा रहेजो परिस्‍थि‍तियां हैं उनके बीच जितना बेहतर कर सकते हैं वही करने का हमारा प्रयास सदैव से रहता है। वस्‍तुत: पूर्व कुलपति प्रो. छीपा की इन बातों में इस विश्‍वविद्यालय के प्रति शासन का यह नजरिया स्‍पष्‍ट समझ आ जाता है कि वह अपने इस विश्‍वविद्यालय से कितना प्रेम करता है और हिन्‍दी के प्रति मध्‍यप्रदेश शासन कितना समर्पित है ?

नए वीसी को सबसे ज्‍यादा जो कार्य करना होगा वह है, मध्‍यप्रदेश शासन से अधिक से अधिक रुपए इस विश्‍वविद्यालय के विकास के लिए प्राप्‍त करनाजोकि किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। कहा जा सकता है कि नए कुलपति प्रो. रामदेव भारद्वाज के सामने यही सब चुनौतियां आज व्‍यापक स्‍तर पर विद्यमान हैं।

मोदी मन की राह..चल दिए शिवराज .....डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारतीय जनता पार्टी की सरकार में प्रधानमंत्री बनते ही नरेंद्र मोदी ने यह सर्वविदित है कि एक के बाद एक नवाचारों को आरंभ किया है, उसमें से एक निर्णय जनता से सीधे जुड़ने का भी है। इस निर्णय को उन्‍होंने नाम दिया मन की बात। देखते ही देखते मन की बात आकाशवाणी पर प्रसारित किया जाने वाला एक ऐसा कार्यक्रम बन गया जिसके जरिये भारत के प्रधानमंत्री से देश के करोड़ों नागरिक सीधे जुड़े और देशभर के समाज सेवा के प्रकल्‍पों, समूह एवं व्‍यक्‍तियों के श्रेष्‍ठ उदाहरणों के माध्‍यम से श्रेष्‍ठ बनने की प्रेरणा लेने लगे। कार्यक्रम के पहले प्रसारण 3 अक्टूबर 2014 लेकर अब तक प्रसारित हो चुके 34 आयोजनों में शायद ही कोई भारत निर्माण का विषय ऐसा छूटा हो, जिस पर प्रधानमंत्री मोदी ने बेबाकी से अपनी बात न रखी हो।  जनता के द्वारा पूछे गए प्रश्‍नों के सीधे उत्‍तर नहीं दिए हों और सशक्‍त राष्‍ट्र के विकास में योगदान देने वालों का गुणगान न किया हो। मोदी पहले कार्यक्रम से लेकर अब तक राष्‍ट्र जागरण की दिशा में संवाद के माध्‍यम से अपने प्रयास करते रहे हैं जिसका कि कई जगह सकारात्‍मक असर भी इन दिनों दिख रहा है। इस प्रयोग से देश के सभी राज्‍यों में छत्‍तीसगढ़ के मुख्‍यमंत्री रमन सिंह के बाद मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री अवश्‍य सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। रमन सिंह ने 'रमन के गोठ' के नाम से रेडियो प्रसारण शुरू किया है।

संभवत: यही वजह है कि प्रधानमंत्री की इस पहल को मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने स्‍तर पर अमलीजामा पहनाते हुए इन दिनों देखे जा सकते हैं। वैसे भी विधानसभा चुनाव अब दूर नहीं, हाल ही में भोपाल में हुई भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में और इससे पूर्व भी पार्टी की जितनी कार्यसमितियां हुई हैं, उनमें सभी पार्टीजनों ने एक स्‍वर में अपनी आगामी सरकार के लिए बतौर मुख्‍यमंत्री शिवराज को ही चुना है। 2018 में विधानसभा चुनाव होने हैं, इस बीच संगठन स्‍तर पर भी चुनाव के लिए अभी से तैयारियां करने के लिए कह दिया गया है। शायद यह भी वह कारण हो, जिसमें प्रदेश की जनता से सीधे संवाद स्‍थापित कर शिवराज सिंह चौहान उन तक भाजपा सरकार की उपलब्‍धियों को पहुंचाना चा‍हते हों । इसलिए अब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी प्रदेश की जनता से सीधे जुड़ेंने के लिए प्रतिमाह रेडियो कार्यक्रम का सहारा लेने का निर्णय ले लिया है।

मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री शिवराज आगामी सप्‍ताह से मोदी के मन की बात के समानार्थी जैसे भावनात्‍मक शब्‍द दिल सेके माध्यम से प्रदेश के नागरिकों से सीधा संवाद करेंगे। इस संवाद में मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान लोगों से जुड़े विभिन्‍न मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त करेंगे और प्राथमिकतायें बतायेंगे।

मुख्‍यमंत्री कई दफे यह कह चुके हैं कि उनका स्‍वप्‍न स्‍वर्णिम मध्‍यप्रदेश है। इसके लिए ही वे आज से 6 वर्ष पहले अपने मुख्‍यमंत्री के पूर्व कार्यकाल में ही स्विर्णम म.प्र. के संकल्प के बिन्दु लेकर आए थे। उस वक्‍त में 14 मई 2010 का दिन मध्‍यप्रदेश के इतिहास में भी स्‍वर्णाक्षरों में दर्ज हो गया, जब स्‍वर्णिम मध्यप्रदेश के निर्माण के लिए आहूत की गई विधानसभा की विशेष बैठक में मुख्यमन्त्री ने घोषणाओं की एक लम्‍बी श्रंखला दृढ़ता के साथ प्रस्‍तुत की थी।

मुख्यमन्त्री ने मुख्यमन्त्री कन्यादान योजना के तहत कन्याओं को दो जाने वाली साहयता राशि को दोगुनी करने की घोषणा क साथ विस्थापित मछुआरों के लिए निम्‍नतम ब्याज पर कर्ज देने का ऐलान, किसानों की जमीन उद्योग के लिए खरीदने पर प्रति एकड़ समुचित मुआवजा दिए जाने की बात कही थी । उस वक्‍त विधानसभा में शिवराज ने कहा था कि किसानों को खेती हेतु इस सदन का मत है कि राज्य का ऐसा सर्वांगीण एवं समावेशी विकास हो, जिससे प्रदेशवासियों का जीवन उत्तरोत्तर समृद्ध एवं खुशहाल बने तथा उन्हें अपनी क्षमताओं के अनुरूप सर्वक्षेष्ठ कार्य करने और राष्ट्र के विकास में योगदान देने का अवसर प्राप्त हो। उक्त उद्देश्य की पूर्ति के लिए यह सदन संकल्प करता है कि हम प्रदेश में खेती को लाभ का धंधा बनायेंगे, मूलभूत सेवाओं के विस्तार के साथ अधोसंरचना का निरन्तर सृदृढ़ीकरण करेंगे, निवेश का अनुकूल वातावरण निर्मित करेंगे, सबको गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं स्वास्थ्य व्यवस्था उपलब्ध करायेंगे, महिलाओं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक एवं सामान्य निर्धन वर्ग को सशक्त कर उनकी विकास में सक्रिय भागीदारी सुनिश्‍चित करेंगे, सुदृढ़ सुरक्षा एवं कानून व्यवस्था बनाये रखेंगे तथा राज्य व्यवस्था का संचालक सुशासन के स्थापित सिद्धान्तों पर करेंगे।
इसी के साथ मुख्‍यमंत्री जो सदन में संकल्प के बिन्दु लाए वो कुछ इस तरह से थे :-

प्रदेश की विकास दर को 9 से 10 प्रतिशत तक रखे जाने का प्रयास किया जाये । चौबीस घंटे सिंगल फैस विद्युत प्रदाय तथा कृषि कार्यों के लिए 8 घंटे बिजली प्रदाय हेतु फीडर विभक्तिकरण सहित आवश्यक अधोसंरचना निर्मित की जाये। बिजली की उपलब्धता तथा गुणवत्ता में सुधार एवं बिजली की दरों में कमी करने के उद्देश्य से समग्र तकनीकी एवं वाणिज्यक हानियों में 9 प्रतिशत की कमी लायी जाये। प्रदेश में बिजली आपूर्ति की स्थिति में सुधार के लिए वर्तमान में स्थापित कुल क्षमता में न्यूनतम 5000 मेगावाट की वृद्धि की जाए। गैर अपरम्परागत ऊर्जा के उत्पादन, उपकरणों एवं ऊर्जा संरक्षण के उपायों के प्रोत्साहन के लिए अनुदान की व्यवस्था की जाये।प्रदेश से संभागीय मुख्यालयों को 4 लेन एवं जिला मुख्यालयों को 2 लेन सड़कों से जोड़ा जाये, सभी ग्राम को बारहमासी संपर्क सड़कों से जोड़ा जायेगा। चि‍ह्नित राजमार्गों के समुचित संधारण के लिए स्टेट हाइवे फण्ड का निर्माण किया जाये। शासकीय भवनों के निर्माण के लिए परियोजना क्रियान्वयन इकाइयों का गठन किया जाये। सुनियोजित विकास के लिए सभी शहरों के सिटी डेवेलपमेंट प्लान तैयार कराये जायें।

संकल्‍प पत्र में यह भी जोड़ा गया कि नगरीय क्षेत्रों के विकास के लिए अधोसंरचना बोर्ड का गठन किया जाये। सभी नगरीय निकायों के फायर ब्रिगेड की सुविधा उपलब्ध करायी जाये। इन्दौर एवं भोपाल में मैट्रो ट्रेन फिजिबिलटी सर्वे कराया जाये। ग्रामीण क्षेत्र की पेयजल समस्याओं के समाधान के लिए मुख्यमन्त्री पेयजल योजना प्रारम्भ की जाए। प्रत्येक ग्राम का मास्टर प्लान बनाया जाये। आगामी 3 वर्षों में प्रत्येक ग्राम पंचायत में पंचायत भवन का निर्माण किया जाए। आगामी वर्षों में सिंचाई की स्थापित क्षमता में वृद्धि की जाए। सिंचाई की स्थापित क्षमता के समुचित उपयोग के लिए कमाण्ड एरिया डेवलपमेण्ट प्रेाग्राम सिहत सभी कारगर उपाय किये जाएं। वैज्ञानिक आधारों पर जल के युक्तियुक्त दोहन की योजना बनायी जाए।वैज्ञानिक कृषि के लिए मृदा स्वास्थ्य पत्रक (सॉइल हेल्थ कार्ड ) तैयार किये जायें।किसानों को देय अनुदान की राशि सीधे उनके खातों में जमा की जाये। उद्यानिकी फसलों के क्षेफल में 5 लाख हेक्टेयर की वृद्धि की जाए। भण्डारगृह क्षमता तथा सुदृढ़ विपणन व्यवस्था के साथ प्रदेश को लाजिस्टिक हब के रूप में विकसित किया जाये।

इतना ही नहीं तो मुख्‍यमंत्री ने इस संकल्‍प पत्र में यह भी जुड़वाया कि प्रदेश की विपणन सहकारी संस्थाओं को सृदृढ़ किया जाए। प्रदेश के सभी पात्र किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड दिया जाए। चिन्‍हित विकास खण्ड़ों में चलित पशु चिकित्सालय चलाये जायें। दुग्ध क्रान्ति लाने के उद्देश्य से दुग्ध समितियों के गठन के साथ नये मिल्क रूट विकसित किए जाएं। किसान क्रेडिट कार्ड के अनुरूप फिशरमेन क्रेडिट कार्ड पर तीन प्रतिशत ब्याज दर पर कार्यशील पुंजी हेतु ऋण उपलब्ध कराया जाये। मछुआरों की मजदूरी दरों में वृद्धि की जाए तथा प्रभावित मछुआरों के पुनर्वास की नई नीति बनाई जाये। वन आधारित रोजगार को बढ़ाने के लिए वनों में टसर, लाख एवं चारागाह का विकास किया जाये। वन्य जीवों के संरक्षण का कार्य प्रभावी तरीके से किया जाये। पुनर्वास नीति का समग्र पुनरीक्षण कर किसानों के हितों का संरक्षण सुनिश्‍चित हो । भावी परियोजनाओं में किसान की भूमि का अर्जन पांच लाख रूपये प्रति एकड़ की दर से कम दर पर नहीं किया जाए। पब्लिक प्रायवेट पार्टनरशिप में अभी तक हुए निवेश में दुगनी वृद्धि की जाये। खनिजों का मूल्यों संवर्धन प्रदेश में ही किये जाने को प्रोत्साहित करने की नीति बने।

रोजगार एवं आर्थ‍िक विकास के लिए यह संकल्‍प पत्र तय करता है कि दिल्ली-मुम्बई, भोपाल-इन्दौर, भोपाल-बीना, जबलपुर-कटनी-सतना-सिंगरौली औद्योगिक कॉरिडोर का योजनाबद्ध विकास किया जायेगा। प्रदेश में स्थापित होने वाले उद्योगों में सृजित रोजगार में यथासम्भव 50 प्रतिशत प्रदेश के मूल निवासियों को उपलब्ध कराये जाने की व्यवस्था की जायेगी। प्रदेश में नियमित रूप से रोजगार मेलों का आयोजन किया जाये। समग्र समाजिक सुरक्षा कार्यक्रम बनाये जायें। शासकीय प्राधिकरण द्वारा आवंटित ईडब्ल्यूएस आवास एवं भूखण्डों के विक्रय-पत्रों व पट्टों को स्टाम्प शुल्क से छूट प्रदान की जाए। प्रत्येक आदिवासी विकास खण्डों में अंग्रेजी माध्यम की आश्रम शालायें संचालित की जाए। 50 से कम सीटों वाले आदिमजाति कल्याण विभाग के समस्त छात्रावासों को 50 सीटर छात्रावासों में परिवर्तित किया जायेगा । कपिलधारा से लाभान्वित अनुसूचित जाति के कृषकों को सिंचाई के लिए विद्युत, डीजल पम्प उपलब्ध कराया जाए।आगामी वषों  में सभी जिलों में पिछडे़ वर्ग के लिए 100 सीटर बालक छात्रावास उपलब्ध कराये जायें।

प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह ने अपनी शासकीय येाजनाओं में मुख्यमन्त्री कन्यादान योजना के अन्तर्गत राशि बढ़ाकर रूपये 10,000 किए जाने के प्रावधान पर जोर दिया ।प्रदेश में अटल बाल आयोग्य एवं पोषण मिशन की स्थापना की कही ।राज्य बीमारी सहायता निधि एवं दीनदयाल उपचार योजना के विस्तार का संकल्‍प दोहराया गया । शिशु मृत्यु दर एवं मातृ मृत्यु दर घटाने के प्रयासों पर जोर दिया गया । सकल प्रजनन दर पर गंभीर विचार हुआ । शिक्षा के स्‍तर को सुधारने के लिए आवश्यकतानुसार पांच किलोंमीटर के दायरे में हाईस्कूल की स्थापना काने का संकल्‍प दोहराया गया ।उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सकल पंजीयन अनुपात प्रतिशत को बढ़ाकर 15 प्रतिशत करने पर जोर दिया गया। यहां गुणवत्तायुक्त व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए आईटीआई के सुदृढ़ीकरण एवं उन्नयन किए जाने की भी बात आई ।

इतना ही नहीं तो इस संकल्‍प पत्र में कहा गया कि प्रदेश की बहुविध बोलियों यथा- बुदेंली, मालवी, निमाडी, बघेली, बैगा, भीली कोरकू, गौण्डी आदि के विकास व संरक्षण का कार्य किया जाये। राज्य स्तर पर मेलों एवं वृहद् धार्मिक आयोजनों के विकास एवं संचालन के लिए प्राधिकरण गठित किया जाए। खेल सुविधाओं का विस्तार पंचायत स्तर तक किया जाये। मध्य प्रदेश खेल प्राधिकरण का गठन किया जाये। पुलिस बल में चरणबद्ध तरीके से वृद्धि की जाए तथा इण्डिया रिजर्व बटालियन का गठन किया जाये। सेना के भूतपूर्व सैनिकों की एक सुरक्षा वाहिनी का गठन किया जाये। अवैध वन कटाई, अवैध खनिज उत्खनन, बिजली चोरी, शासकीय भूमि पर अतिक्रमण रोकने तथा बीपीएल सूची में दर्ज अपात्र व्यक्तियों के नाम काटने के लिए प्रभावी कार्यवाही की जाये। राजस्व प्रकरणों के त्वरित निराकरण के लिए भू-राजस्व संहिता में संशोधन किये जायें।ग्रामीण आबादी के पट्टे वितरित किये जाये। पंचायत सचिवों के जिला कैडर की स्थापना की जाये। ग्रामीण क्षेत्रों में आवास की समस्या के समाधान के लिए मुख्यमन्त्री ग्रामीण आवास मिशन आरम्भ किया जाये।सार्वजनिक वितरण प्रणाली हेतु बार कोडेड फूड कूपन योजना लागू की जाये।राशन की दुकान प्रत्येक कार्य दिवस को खुली रखी जाए।

शिवराज के इस संकल्‍प पत्र में यहां तक कहा गया कि उनकी सरकार को तकनीतिक का इस्‍तेमाल किस स्‍तर तक जाकर करना है। यहां कहा गया कि पारदर्शी, जबावदेह एवं संवेदनशील प्रशासन स्थापित करने के लिए व्यवस्था के लिए सूचना प्रौद्यागिकी का अधिकाधिक उपयोग किया जाए। एकीकृत वित्तीय प्रबंध सूचना प्रणाली स्थापित की जाए। राज्य में वांछित प्रशासनिक व्यवस्था में निरन्तर सुधार की अनुशांसाऐंक रने का उत्तरदायित्व अटल बिहारी वाजपेई लोक प्रशासन संस्थान को सौंपा जाये। प्रशासनिक अमले को पुरस्कृत एवं दण्डित करने की प्रक्रिया को प्रभावी बनाया जाये। सिटीजन चार्टर को लोक सेवाओं के प्रदाय की गारण्टी अधिनियम के रूप में लागू किया जायें। शासकीय खरीदी पारदर्शी एवं उचित दरों पर करने के लिए वर्तमान व्यवस्था में यथोचित परिवर्तन किये जायें।

साथ में शिवराज सरकार ने अपने इस संकल्‍प पत्र के माध्‍यम से केंद्र सरकार की ओर भी सहयोग के लिए आग्रह किया है। जिसमें कि यह भी प्रस्तावित किया गया कि यह सदन केन्द्र शासन से अनुरोध करें कि कृषि उत्पादों का वायदा बाजार पूर्णत : बन्द करने, प्रदेश के बीपीएल परिवारों की वास्तविक संख्या के अनुसार खाद्यान्न आवंटित करने, आवासहीनों की संख्या के अनुरूप इन्दिरा आवास योजना में राशि प्रदान करने, ताप विद्युतगृहों की आवश्यकता के अनुरूप उचित गुणवत्ता का कोयला प्रदान करने, प्रदेश के वन क्षेत्रों के विकास के लिए उचित कार्य । शिक्षा का अधिकार अधिनियम की क्रियान्वयन के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन दिये जाने, इन्दौर दाहोद एवं अन्य रेल लाईन निर्मित करने तथा विभिन्न विकास परियोजनाओं की पर्यावरण सम्बंधी अनुमातियां शीघ्र जारी किए जाने के लिए कहे।

वस्‍तुत: इस संकल्‍प पत्र के आए आज 7 साल बीत चुके हैं । इस बीच पुन: भाजपा की सरकार बनी और अब फिर वर्ष 2018 में भाजपा अपनी सरकार बनाने के लिए आश्‍वस्‍त दिख रही है। किंतु सरकार के स्‍तर पर पार्टी को भी समय बीतने के साथ यह समझ में आ गया लगता है कि जो संकल्‍प हमने सार्वजनिक रूप से लिए, यदि समय रहते उन्‍हें पूरा नहीं किया गया तो प्रदेश में पुन: सरकार बनाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होगा।  संभतया इ‍सलिए ही शिवराज शासन की नीतियों, कार्यक्रमों, योजनाओं और भविष्य की कार्य योजनाओं को आमजन से साझा करने के लिए इतने अधिक उत्‍साहित दिख रहे हैं । प्रदेश अपने मुख्‍यमंत्री का इस तरह का पहला कार्यक्रम 13 अगस्त की शाम 6.00 बजे सभी आकाशवाणी केन्द्रों से रिले होगे पर सुन सकता है।

मुख्यमंत्री श्री चौहान इस कार्यक्रम के माध्यम से युवाओं, महिलाओं, किसानों, मजदूरों, व्यापारियों सहित सभी वर्गों से जुड़ेंगे। यह कार्यक्रम श्री चौहान की उन भावनाओं की अभिव्यक्ति के रूप में होगा, जिसमें वे खुलकर जनता से बात करेंगे। उनके कल्याण के लिये अपनी आत्मीय भावनाओं और प्रतिबद्धता को प्रगट करेंगे।

अच्‍छी पहल, भारत में पर्यावरण सुधार के‍ लिए हो रहा राजमार्गों का उपयोग


भारत में जलवायु सुधार एवं पर्यावरण सुधार के लिए राष्‍ट्रीय राजमार्गों का भरपूर उपयोग इन दिनों मोदी सरकार कर रही है। हालांकि यह पूर्व में भी होता रहा है लेकिन इस समय इसमें पूर्व की अपेक्षा भारी सुधार हुआ है। देश में अधिकतम लोगों को सड़क से गुजरते वक्‍त स्‍वच्‍छ हवा मिले इसके लिए आसपास के वातावरण को हरा-भरा, स्‍वच्‍छ और प्रदूषण मुक्‍त बनाने के लिए भारतीय राष्‍ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने पिछले साल 2.59 लाख वृक्ष लगाने में सफल रहा।

वृक्षारोपण को राजमार्ग विकास के अविभाज्‍य अंग के रूप में संस्‍थागत रूप प्रदान किये जाने का मोदी सरकार ने फैसला किया है। सरकार भारतीय राष्‍ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के जरिए वृक्षारोपण की प्रगति पर नजर रखने के लिए पीएमआईएस पोर्टल भी तैयार करने जा रही है। जिसे लेकर एनएचएआई के अध्‍यक्ष दीपक कुमार ने सभी क्षेत्रीय कार्यालयों को निर्देश दिये हैं ।

इन निर्देशों में कहा गया कि वे वर्तमान मॉनसून के सीजन के दौरान कम से कम एक लाख वृक्ष लगाना सुनिश्चित करें। उन्‍हें रियायतग्राहियों, ठेकेदारों, सामाजिक संगठनों, वन विभाग और अन्‍य हितधारकों को भी साथ जोड़ने की सलाह दी गई है। इसी के साथ ही एनएचएआई के हरित राजमार्ग प्रभाग ने मॉनसून के सीजन में उगाई जा सकने वाली उपयुक्‍त प्रजातियों की सूची प्रसारित की है।

इस संबंध में यह भी बताया जा रहा है कि एनएचएआई राष्‍ट्रीय राजमार्गों को हरा-भरा, स्‍वच्‍छ और प्रदूषण मुक्‍त बनाने के लिए वृक्षारोपण अभियान मॉनसून के दौरान तो जारी रखेगा ही, उसके बाद भी वृक्षों को पानी देने और उनका रखरखाव करने जैसी नियमित गतिविधियों के रूप में अपने इस कार्य को आगे करता रहेगा। 

निश्‍चित रूप से मोदी सरकार के इस प्रयास की सराहना होनी चाहिए। हम जितने अधिक पौधे लगाएंगे वे हमारे पर्यावरण के लिए उतने ही उपयोगी सिद्ध होंगे। वैसे भी सरकार को ही क्‍यों पौधे लगाने चाहिए। देश के हर नागरिक का यह कर्तव्‍य है कि जितनी वह ऑक्‍सीजन लेता है और जितना प्रदूषण वह अपने मल, वाहन इत्‍यादि के माध्‍यम से करता है, उसके प्रभाव को नष्‍ट करने के लिए वह अपने हिस्‍से के पौधे लगाए ताकि भविष्‍य में वह इतनी ऑक्‍सीजन दे सकें कि हमारा वातावरण पूरी तरह स्‍वस्‍थ हो सके ।

रविवार, 30 जुलाई 2017

चीनी सामान को क्‍यों न अलविदा कह दिया जाए ? डॉ. मयंक चतुर्वेदी

से लालच की कौन सी पराकाष्‍ठा माना जाए ?  कुछ समझ नहीं आता । चीनी सामान के प्रति हमारी भक्‍ति किस स्‍तर तक है, इसका एक बड़ा उदाहरण जबलपुर में बनी बोफोर्स तोप के स्वदेशी संस्‍करण धनुष में सीधेतौर पर देखने को मिला है। जिसमें कि देश के साथ सुरक्षा के स्‍तर पर भी कर्तव्‍यनिष्‍ठ स्‍वदेशवासियों ने गंभीरता से विचार नहीं किया। लालच की यह पराकाष्‍ठा निश्‍चित ही अशोभनीय और देशद्रोह जैसा कर्म तो है ही, किंतु इसके साथ यह इस विचार के लिए भी प्रेरित करता है कि आखिर हम भारतीयों को हो क्‍या गया है ?  जिनके लिए जननी और जन्‍म भूमि स्‍वर्ग से भी महान रही है और है। (रावण के निधन के बाद श्रीराम लक्ष्मण से कहते हैं: अपि स्वर्णमयी लंका मे लक्ष्मण न रोचते, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी । वाल्मीकि व अध्यात्मरामायण में तो नहीं, किंतु अन्‍यत्र किसी अन्‍य रामायण में उल्‍लेखित)

भारतीय सीमाओं पर चीन हमें आँखे दिखा रहा है। भारत के 43 हजार 180 वर्ग किलोमीटर पर चीन ने अवैध कब्जा कर रखा है। इस भू-भाग में वर्ष 1962 के बाद से हमारी भूमि का 38 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चीन के कब्जे में है। इसके अतिरिक्त 2 मार्च 1963 को चीन तथा पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षरित तथाकथित  चीन-पाकिस्तान 'सीमा करार' के अंतर्गत पाकिस्तान ने पाक अधिकृत कश्मीर के 5180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अवैध रूप से चीन को दे दिया था ।

चीन किस तरह से हमें मूर्ख बनाता है, इसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि लोकसभा में प्रस्‍तुत दस्तावेजों में विदेश मंत्रालय ने स्‍वीकारा कि वर्ष 1996 में चीन के तत्कालीन राष्ट्रपति च्यांग चेमिन की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने एलएसी पर सैन्य क्षेत्र में विश्वास बहाली के कदम के बारे में समझौते पर हस्ताक्षर किए थे ।  जून 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की चीन यात्रा के दौरान दोनों पक्षों में से प्रत्येक ने इस बारे में विशेष प्रतिनिधि नियुक्त करने पर सहमति जताई थी ताकि सीमा मुद्दे के समाधान का ढांचा तैयार करने की संभावना तलाशी जा सके । उसके बाद इस विषय पर अब तक दोनों पक्षों की कई बैठकें हो चुकी है लेकिन चीन सीमा विवाद पर भारत के आगे होकर लाख सकारात्‍मक प्रयत्‍नों के बाद भी कोई प्रगति होने नहीं देना चाहता। वह तो कश्‍मीर से लेकर अरुणाचल तक जहां-जहां चीन के साथ भारतीय सीमाएं लगती हैं, कई किलोमीटर अंदर भारतीय क्षेत्र पर भी अपना कब्‍जा बता रहा है। उल्‍टे हमें ही कहता है कि फलां क्षेत्र पर भारत ने कब्‍जा जमा रखा है, उसे भारत शांति के साथ चीन को सौंप दे। यानि कि उल्‍टा चोर कोतवाल को डांटे (एक कहावत) यहां चरितार्थ हो रही है। दूसरी ओर व्‍यापार के नाम पर हम इतने लालची हैं कि थोड़े से मुनाफे के लिए चीन का बहुतायत माल खरीदकर उसकी आय में रात-दिन बढ़ोत्‍तरी करने में लगे हैं।

पिछले वर्ष एक आंकड़ा आया था, उसके अनुसार भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा बढ़कर 46.56 बिलियन डॉलर (3 लाख करोड़ रुपए) तक जा पहुंचा था। चीन का भारत में निर्यात वर्ष 2016 के वित्त वर्ष में 58.33 बिलियन डॉलर था। 2015 के मुकाबले निर्यात में 0.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। दूसरी तरफ भारत का चीन में निर्यात 12 प्रतिशत गिरकर 11.76 बिलियन डॉलर तक जा पहुंचा था। वर्ष 2017 साल के पहले 4 महीने में व्यापार घाटा 14.88 अरब डॉलर रहा। बीते साल कुल व्यापार घाटा लगभग 52 अरब डॉलर का रहा था, जबकि कुल द्विपक्षीय व्यापार 70 अरब डॉलर से कुछ अधिक का रहा।

वस्‍तुत: यहां इससे सीधेतौर पर समझा जा सकता है कि भारत को कितना अधिक व्यापार घाटा हुआ है और निरंतर हो रहा है। कुछ अर्थप्रधान लालची विद्वान यह कहकर इस विषय की गंभीरता को समझना नहीं चाहते कि चीन के कुल निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 2 प्रतिशत है। अगर चीनी माल का भारत में बहिष्कार हो भी जाता है तो उससे चीन की अर्थव्यवस्था पर इतना असर नहीं पड़ेगा जिसे दबाव बनाकर भारत अपनी बात मनवा सके। किंतु क्‍या यह पूरा सच है ? इसके पीछे के सच को भी जानना चाहिए। भारत में जो 2 प्रतिशत निर्यात की बात कही जाती है, वह पूरी तरह सच नहीं, क्‍योंकि जितना माल कानूनी स्‍तर पर 1 नम्‍बर में चीन से भारत आता है, उससे कई गुना अधिक चीनी माल भारत की सीमाओं में अवैध रूप से आता है । इसलिए भले ही चीनी माल के बहिष्कार का वहां की अर्थव्यवस्था पर तुरंत कोई असर न पड़े लेकिन इसका असर बाद में बहुत व्‍यापक स्‍तर पर दिखेगा, यह तय मानिए।

वस्‍तुत: चीन अपने व्‍यापारिक माल के जरिए ही 21वीं सदी में महाशक्ति के रूप में उभरना चाहता है,  इसलिए वह अपने इस स्‍पप्‍न को इन दिनों 'वन बेल्ट वन रोड' के जरिए साकार करने में लगा है । इसके जरिए चीन आर्थिक तरीके से दुनिया पर राज करने का प्लान बना रहा है। जिसका कि पिछले दिनों मोदी सरकार ने विरोध किया था। किंतु इस सब के उपरान्‍त भी सरकार को यह समझना ही होगा कि वह अपनी निर्भरता क्‍यों चीन के सामने बनाए रखना चाहती है। क्‍या जरूरत है, सरकार को उसके सामने व्‍यापारिक हितों के नाम पर खड़े होने की ? यह इसीलिए भी कहा जा रहा है, क्‍योंकि आज जिस मोदी सरकार ने चीन की 'वन बेल्ट वन रोड' नीति का विरोध किया है, उस मोदी सरकार के लिए बहुत अच्‍छा तब ओर होता जब वह चीन से पेट्रोल, डीजल का आयात करने से भी बचती। पहली बार ही सही किंतु इसी वर्ष मार्च 2017 तत्‍कालीन चालू वित्‍तवर्ष के नौ माह में चीन से 18,000 टन पेट्रोल और 39,000 टन डीजल का आयात किया गया। जिसे कि स्‍वयं पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में स्‍वीकार्य किया । हालांकि उन्‍होंने दुनिया के तीसरे सबसे बड़े उपभोक्ता देश भारत के खपत के बड़े अंतर को देखते हुए यह निर्णय लिए जाने की बात कही थी । किंतु इसी के साथ देश को यह भी जानना चाहिए कि भारत में पेट्रोल और डीजल का कुल उत्पादन घरेलू खपत से ज्यादा है । इसी समय के अंतराल में अप्रैल से दिसंबर 2016 अवधि में देश में 2.71 करोड़ टन पेट्रोल का उत्पादन किया गया, जबकि इस दौरान खपत 1.80 करोड़ टन रही। जहां तक डीजल की बात है इसका घरेलू उत्पादन 7.65 करोड़ टन और खपत 5.72 करोड़ टन रही थी ।

इस सब के बीच सच तो यह भी है कि हमारे पास चीन के अलावा भी तमाम विकल्‍प मौजूद हैं । जब आवश्‍यकता के अनुरूप भारत में पिछले चालू वित्त वर्ष अप्रैल से दिसंबर अवधि में कुल मिलाकर 8,20,000 टन डीजल का और 4,76,000 टन पेट्रोल का आयात किया गया।  इन नौ महीनों में सिंगापुर के मुकाबले यूएई ने सबसे अधिक 2,43,000 टन पेट्रोल की आपूर्ति की गई थी और डीजल में भी यूएई से सबसे अधिक 3,80,000 टन डीजल आयात किया गया था, जबकि सिंगापुर से 1,69,000 टन पेट्रोल आयात किया गया था। फिर चीन की ओर देखने का औचित्‍य क्‍या है ? यानि कि इतने अधिक विकल्‍प होने के बाद भी हमारा चीन की ओर देखना कहीं न कहीं हमारी राष्‍ट्रभक्‍ति पर भी प्रश्‍नचिह्न खड़े करता है।

वस्‍तुत: इस संदर्भ में राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ और उससे जुड़े कई संगठन जो बार-बार चीनी सामान के बहिष्कार की मांग दोहराते आए हैं, प्रयोग के तौर पर वे अपने स्‍तर पर चीनी माल के इस्‍तेमाल से भी बचने का भरसक प्रयत्‍न करते रहे हैं, और समय-समय पर अपने स्‍वयंसेवकों को चीनी सामान के बहिष्कार करने का संकल्प दिलाते हैं। उसे पूरे देश को समझना होगा। यह केवल स्‍वदेश प्रेम से ही नहीं जुड़ा है, यह इसलिए भी जरूरी है कि 500 अरब डालर के अनुमानित नकली और पायरेटेड वस्तुओं के वैश्विक आयात में 63 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ चीन शीर्ष पर है। हमारे मुल्क को चीन घटिया ही नहीं, कई जहरीले उत्पाद भी निर्यात कर रहा है। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओइसीडी) की रिपोर्ट से भी यह प्रमाणित हो चुका है।  ओइसीडी ने अपने अध्ययन में यह भी माना है कि हैंडबैग व परफ्यूम से लेकर मशीनों के कलपुर्जे तथा रसायनों तक, सब के नकली उत्पाद बन रहे हैं। यानि की जिस कंपनियों के विदेशी लेवल लगे होने पर भारतीय उपभोक्‍ता बड़े ही शान से माल खरीद रहे हैं, अधिकांश में वह उसे खरीदकर ठगे जा रहे हैं। क्‍यों कि उन्‍हें चीन बना रहा है और उनकी खरीदारी का भारत सबसे बड़ा बाजार है। वास्‍तव में चीन हमें दो तरह से ठग रहा है, हम सस्‍ते के चक्‍कर में भी ठगे जा रहे हैं और महंगी चीजों में चीन का बना नकली सामान लेकर भी धोखा खा रहे हैं।

चलो, देश इस धोखे को भी झेल लेगा, किंतु क्‍या इससे भी मुंह मोड़ा जा सकता है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत के बाजार में चीनी उत्पादों की सस्‍ती बाढ़ आने से इसका बुरा असर देसी उत्पादकों पर पड़ा है। कई छोटी इकाइयों पर चीनी उत्‍पादनों के कारण ताले लग चुके हैं। कई बड़ी इकाइयां अपने उत्पाद बनाने के लिए दूसरे विकल्पों को तलाश रही हैं जिससे कि चीनी माल से मुकाबला किया जा सके। इस अंतर्विरोध का जो सबसे दुखद पक्ष है वह यही है कि एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मेक इन इंडिया और मेड इन इंडिया पर जोर दे रहे हैं तो दूसरी ओर केंद्र व राज्‍यों के कई विभाग हैं जोकि अपनी पूर्ति चीन के सामान से करने में लगे हुए हैं। वस्‍तुत: आज भी भारतीय परियोजनाओं के लिए अस्सी फीसद ऊर्जा संयंत्रों के उपकरण चीन से मंगाए जा रहे हैं। यह एक अकेला मामला नहीं, ऐसे तमाम विभाग और परियोजनाएं गिनाई जा सकती हैं।

इस पर अंत में इतना ही कहना है कि चीनी समान के प्रति हमारी भक्‍ति जब तक नहीं टूटेगी और हम यह नहीं देख और समझ पाएंगे कि आखिर मेरे देश के हित में क्‍या है, तब तक भारत भक्‍ति के लाख प्रयत्‍न कर लिए जाएं, प्रधानमंत्री मोदी मेक इन इंडिया और मेड इन इंडिया के अभियान को सफल बनाने के लिए अपना संपूर्ण अस्‍तित्‍व झोंक दे। राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ जैसे तमाम संगठन अपना सर्वस्‍व समर्पण मातृभूमि के लिए कर दें लेकिन उनके यह प्रयत्‍न सफल नहीं होने वाले हैं। देश में बोफोर्स तोप के स्वदेशी संस्‍करण धनुष जैसी सुरक्षा के स्‍तर पर भी लालच की पराकाष्‍ठा देशद्रोह जैसा कर्म होता रहेगा । वस्‍तुत: देश के प्रत्‍येक नागरिक को इस विषय पर गंभीरता से एक बार अवश्‍य विचार करना चाहिए।

प्रेम का कुचक्र : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

प्रेम शब्‍द आनन्‍द की अनुभूति कराता है। प्रेम समर्पण का प्रतीक है। प्रेम का आशय सीधे तौर पर त्‍याग है।  प्रेम प्रतिउत्‍तर में कोई अपेक्षा नहीं करता, वह तो सिर्फ देने में और सतत देते रहने में ही अपना विश्‍वास करता है। प्रेम में त्‍याग का उदाहरण कैसा होता है, इसे सूरदास कुछ यूं समझाते हैं - प्रीति करि काहू सुख न लह्यो। प्रीति पतंग करी दीपक सों आपै प्रान दह्यो।। अलिसुत प्रीति करी जलसुत सों¸ संपति हाथ गह्यो। सारंग प्रीति करी जो नाद सों¸ सन्मुख बान सह्यो।। हम जो प्रीति करी माधव सों¸ चलत न कछू कह्यो। जब एक दीपक से पतंग को प्रेम हो जाता है तो वह उसके लिए अपने प्राण त्‍यागने में संकोच नहीं करता । किंतु इसके साथ सत्‍य यही है कि प्रेम में पतंग और दीपक दोनों ही अपने सत्‍य को जानते हैं। दोनों ही अपने स्‍वभाव के अनुरूप व्‍यवहार करते हैं। पर अंत तक सत्‍य पर अडिग रहते हैं।

जब किसी स्‍त्री को या पुरुष को प्रेम होता है, तब फिर उसे कोई ज्ञान दे, तो उसका उत्‍तर कुछ इस तरह का होता है, जैसे की गोपियां उधो को देती हैं, उधो, मन न भए दस बीस।एक हुतो सो गयौ स्याम संग, को अवराधै ईस॥ सिथिल भईं सबहीं माधौ बिनु जथा देह बिनु सीस। स्वासा अटकिरही आसा लगि, जीवहिं कोटि बरीस॥ तुम तौ सखा स्यामसुन्दर के, सकल जोग के ईस। सूरदास, रसिकन की बतियां पुरवौ मन जगदीस॥

अर्थात् मन तो हमारा एक ही है, दस-बीस मन तो हैं नहीं कि एक को किसी के लगा दें और दूसरे को किसी और में। अब वह भी नहीं है, कृष्ण के साथ अब वह भी चला गया।..गोपियां कहती हैं,यों तो हम बिना सिर की-सी हो गई हैं, हम कृष्ण वियोगिनी हैं, तो भी श्याम-मिलन की आशा में इस सिर-विहीन शरीर में हम अपने प्राणों को करोड़ों वर्ष रख सकती हैं वास्‍तव में प्रेम के पथिक का भी कुछ यही हाल होता है। किंतु सोचनेवाली बात यह है कि जब प्रेम के नाम पर पान्‍थिक धोखा किया जाए। जिसे की दूसरा एक नाम दिया गया है लव जिहाद, तब अवश्‍य ही प्रश्‍न खड़े हो जाते हैं, आखिर इस प्रेम के पीछे की सच्‍चाई इतनी अधिक कड़वी क्‍यों है कि वह अपने साथ कई लोगों को सिर्फ दुख एवं अवसाद के अतिरिक्‍त अन्‍य कुछ और नहीं देती है।

सत्‍य पुरुष और श्रेष्‍ठ पुरुष के बारे में संस्‍कृत वांग्‍मय में आया है कि यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा  क्रियाः । चित्ते वाचि क्रियायांच साधुनामेक्रूपता ॥ इसके अर्थ को समझें तो अच्छे लोगों के मन में जो बात होती है, वे वही बोलते हैं और ऐसे लोग जो बोलते हैं, वही करते हैं. सज्जन पुरुषों के मन, वचन और कर्म में एकरूपता होती है। किंतु जब इस प्रेम में कपट हो, धोखा हो, संदेह हो, अविश्‍वास हो, स्‍वार्थ हो, लालच हो तब फिर यह प्रेम न सूरदास सा प्रेम रहता है और न ही राधा और मीरा, रैदास की तरह पवित्र प्रेम रहता है। वस्‍तुत: प्रेम तो सत्‍य पर ही  आधारित है, इसलिए इसे अंत तक सत्‍य पर ही अडिग रहना होता है। लेकिन क्‍या ऐसा व्‍यवहार में हो रहा है ? तो कहा जाएगा, नहीं ऐसा नहीं हो रहा है। आज देश में अधिकांश जन इस पान्‍थ‍िक स्‍वार्थ प्रेरित प्रेम पर बोलने से बचते हैं, कहीं उनकी धर्मनिरपेक्षता खतरे में न आ जाए ?  किंतु सत्‍य यही है कि जब त‍क इस विषय पर खुलकर नहीं बोला जाएगा, तब तक इससे संबंधित बुराइयाँ सुधरनेवाली नहीं हैं।

देश में वर्तमान में इस कुचक्रपूर्ण प्रेम का जो स्‍वरूप दिखाई दे रहा है, वह इतना भयावह है कि उसकी सत्यता जानने के बाद लगता है कि जितनी जल्‍दी इसे रोका जाए, उतना ही यह देश के बहुसंख्‍यक समाज के हित में होगा। इस पर कहा तो यह भी जा सकता है कि यह न केवल हिन्‍दू समाज के हित में है बल्कि यह मानवता के हित में भी है। क्‍योंकि अपनी जनसंख्‍या का घनत्‍व बढ़ाने के लिए प्रेम के नाम पर किसी स्‍त्री पर अत्‍याचार करना पूरी तरह पांथि‍क रूप से ही गलत नहीं मानवीयता के रूप में भी विद्रूपित है। लव जिहाद के विवादित मामले में दो वर्ष पूर्व इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था। हाई कोर्ट ने कहा कि इस्लाम में आस्था और विश्वास के बिना मुसलमान युवक से शादी के लिए गैर-मुस्लिम युवती के धर्म परिवर्तन को वैध नहीं ठहराया जा सकता। इस तरह की शादियां कुरान के सुरा-2 आयत 221 के खिलाफ हैं। इसी प्रकार से इसाईयत भी कहती है। किंतु व्‍यवहार में ठीक इसके विपरीत हो रहा है। प्रेम करना बुरा नहीं है। लेकिन वह सत्‍याधारित तो हो ? अब तक उत्‍तरप्रदेश के सहारनपुर, शामली और मुजफ्फर नगर इलाकों में पिछले कई सालों से लगातार 'लव जिहाद' के 'वेरिफाइड' मामले सामने आए हैं, जिनकी संख्‍या हजारों में है। इसी प्रकार मध्‍यप्रदेश के भोपाल शहर का हाल है। हिमाचलप्रदेश, झारखण्‍ड और बिहार, पश्‍चिम बंगाल से लेकर दक्षिण के कई प्रदेशों के साथ यही बात देश के उन अन्‍य नगरों एवं महानगरों में लागू होती है जहाँ हिन्‍दुओं के अलावा इस्‍लाम एवं ईसाईयत पर विश्‍वास व्‍यक्‍त करने वालों की संख्‍या ज्‍यादा मात्रा में है।

भोपाल में प्रकाश में आया अभी का इससे जुड़ा हालिया मामला यह सोचने पर अवश्‍य विवश करता है कि प्रेम के नाम पर आदमी धोखा क्‍यों दे रहा है ? गौतम नगर थाने पहुंची एक महिला ने शादी के एक महीने के अंदर ही पति के खिलाफ धोखा देकर शादी करने और दहेज के लिए प्रताड़ित करने का मामला दर्ज कराते हुए सीधे शब्‍दों में कहा,  'सर! इसने मुझे धोखा दिया है। अपना धर्म बदलकर अपने आप को ब्राह्मण बताकर मुझसे शादी की। बाद में मालूम हुआ कि वह शर्मा नहीं मि‍स्‍टर मार्टिन एक ईसाई है। 
 
यह कोई एक मामला नहीं है। देशभर में चर्चा में रांची का तारा सहदेव लव-जिहाद मामला अभी भी लोगों को याद है, जिसमें कि रकीबुल हसन द्वारा तारा पर इस्लाम धर्म अपनाने का इस हद तक दबाव बनाया गया था कि उसके चुंगल से बाहर आना असंभव जैसा हो गया था । यदि वह नेशनल शूटर नहीं होती तो हो सकता है कि मामला कभी इतने बड़े स्‍तर पर प्रकाश में ही न आ पाता । तारा शाहदेव के पति रंजीत सिंह कोहली (रकीबुल हसन) पर पत्‍नी को प्रताड़ित करने के मामले में जांच कर रही सीबीआई ने जो चार्जशीट दाखिल की है। उसमें कई बातें सामने आई है। सीबीआई के अनुसार, रकीबुल और उसकी मां तारा शाहदेव से जबरन इस्‍लाम धर्म कबूल करवाने पर अड़े थे। तारा की सास ने उससे साफ कह दिया था कि, अगर इस्‍लाम कबूल नहीं किया तो तुम्‍हारा बिस्‍तर वही रहेगा लेकिन मर्द बदलते रहेंगे। तारा के सिंदूर लगाने पर भी पाबंदी थी। रकीबुल और उसकी मां सिंदूर लगाने पर हाथ-पैर तोड़ने की धमकी देते थे। तारा ने बताया, रंजीत उर्फ रकीबुल हसन उसे विवाह के लिए प्रभावित करने के कई हथकंडे अपनाता था। वह अफसरों के साथ महंगी गाड़ियों में शूटिंग रेंज पर आता और खुद को बेहतर इंसान दिखाने की हर संभव कोशिश करता था। आज तारा जैसी कई ताराएं देशभर में मौजूद हैं जो नितरोज लवजिहाद के चंगुल में फंस रही हैं। पिछले वर्ष मंगोलपुरी क्षेत्र में रहनेवाली एक युवती ने ‘लव जिहाद’ से बचने के लिए अपनी जान दे दी। आत्महत्या से पहले लिखी चिट्ठी में जो कुछ उसने लिखा है, उससे साफ हो जाता है कि, युवती प्रेमी से बहुत तंग आ गई थी।
 
वस्‍तुत: कहना यही है कि जब प्रेम हो तो वह सशर्त न हो । वह पान्‍थ‍िक केनवास से बंधा न हो । जब इस तरह का प्रेम प्रसंग सामने आता है तो निश्‍चित रूप से उसमें से षड्यंत्र की बू आती है। प्रेम तो भ्रमणगीत जैसा होना चाहिए, जिसमें अपने प्रिय के मिलने और बियोग दोनों ही स्‍थ‍िति में निसि दिन बरषत नैन हमारे, सदा रहति बरषा रितु हम पर जब तें स्याम सिधारे॥ दृग अंजन न रहत निसि बासर कर कपोल भए कारे। कंचुकि पट सूखत नहिं कबहूं उर बिच बहत पनारे॥ आंसू सलिल भई सब काया पल न जात रिस टारे।
 
इस पद में श्री कृष्‍ण को यादकर गोपियां कहती हैं कि हे कन्हाई! तुम्‍हारी याद में हमारे नयन नित्य ही वर्षा के जल की भांति बरस रहे हैं अर्थात् तुम्हारे वियोग में हम दिन-रात रोती रहती हैं। रोते रहने के कारण इन नेत्रों में काजल भी नहीं रह पाता अर्थात् वह भी आंसुओं के साथ बहकर हमारे कपोलों (गालों) को भी श्यामवर्णी कर देता है। हे श्याम! हमारी कंचुकि (चोली या अंगिया) आंसुओं से इतनी अधिक भीग जाती है कि सूखने का कभी नाम ही नहीं लेती। फलत: वक्ष के मध्य से परनाला-सा बहता रहता है। इन निरंतर बहने वाले आंसुओं के कारण हमारी यह देह जल का स्त्रोत बन गई है, जिसमें से जल सदैव रिसता रहता है। वास्‍तव में यही तो सच्‍चा प्रेम है, और प्रेम की उच्‍चावस्‍था भी । काश, यह सभी ठीक से समझ लें तो कितना अच्‍छा हो ! देश में कहीं लवजिहाद न हो।