शनिवार, 7 अक्तूबर 2017

भारत का आतंकवाद निर्मूलन के लिए सुझाव : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ महासभा में भारतीय विदेशमंत्री सुषमा स्‍वराज ने जिस तरह से अपनी बात रखी है उससे दुनिया यह ठीक से जान गई कि भारत सरकार गरीबी मिटाने के लिए काम कर रही है। मानव अधिकार संरक्षण के लिए कार्य कर रही है। इन्‍फॉरमेंशन टेक्‍नोलॉजी में वैश्‍विक ताकत बनने के लिए काम कर रही है और तो और डाक्‍टरइंजीनियरप्रबंधक बनाने के लिए कार्य कर रही है। कुल मिलाकर भारत के पास विश्‍वभर को देने के लिए अपनी पर्याप्‍त ऊर्जा हैजो उसके नागरिकों के माध्‍यम से आज चहुंओर अभिव्‍यक्‍त हो रही है।

यहां सुषमा स्‍वराज ने जोर देकर विश्‍वभर के देशों के बीच पूछा कि कौन है आतंकवाद का शौकीन देशआतंकियों के कोई बैंक खाते नहीं हैंउनकी कोई फैक्ट्री नहीं हैफिर उन्हें हथियार कौन देता हैकौन धन मुहैया कराता हैकौन सहारासंरक्षण देता हैवास्‍तव में दुनिया में कुछ ऐसे देश हैं जो आतंकियों को बोतेउगाते और पालते हैं। आतंकवाद का निर्यात भी करते हैं। आतंकवाद के ऐसे शौकीन देशों की पहचान होनी चाहिए। औरउन्हें अलग-थलग कर देना चाहिए।  वस्‍तुत: अपने भाषण के दौरान भारत की विदेश मंत्री स्‍वराज का सीधे तौर पर जोर इस बात पर था कि विश्व समुदाय में ऐसे देशों को कोई जगह नहीं मिलनी चाहिए जो आज आतंक को प्रश्रय देते हैं। दुनिया को यह देखना होगा कि जिनके द्वारा भी आतंकियों को पैसाहथियार मुहैया कराए जा रहे हैंउन्‍हें चिन्‍ह‍ित कर ऐसे देशों पर सख्‍त कार्यवाही की जाए।

यूएनओ के मंच पर भले ही पाकिस्‍तान को ध्‍यान में रखउसके आतंक प्रोषित क्रिया कलापों को लेकर ये सभी बाते कही गई होंकिंतु हैं तो यह सभी सच । वर्तमान में इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि भारत ने विश्‍व के इस शक्‍तिशाली मंच पर अपनी जो-जो भी बातें पाकिस्‍तान को लेकर कही हैं उनमें से कुछ भी झूठ हो । सुषमाजी का यह तर्क भी बहुत सत्‍य था कि हमने दुश्मनी छोड़ मित्रता के आधार पर सारे मसले सुलझाने की कोशिश की। हमने पिछले दो बरस में मित्रता का पैमाना खड़ा कियालेकिन हमें मिला क्यापठानकोटउड़ी और बहादुर अलीबहादुर अली तो जिंदा सुबूत है कि सीमा पार से आतंकी आया है।

इसमें भी जो सबसे ज्‍यादा जोर सुषमा स्‍वराज ने दियावह बात यही है कि आतंकवाद पर दुनियाभर में दो प्रकार के नियम नहीं हो सकते हैं। किसी देश के लिए कुछ और किसी देश के लिए कुछ । इसलिए भारत ने यूएनओ में इस बात को एक बार फिर दोहराया कि आतंकवाद के खिलाफ व्यापक वैश्विक संधि (सीसीआईटी) का जो प्रस्ताव पिछले 20 सालों से लंबित है उस पर गंभीरतापूर्वक अमल हो और विश्‍व के सभी देश मिलकर कार्य करना आरंभ करें । वास्‍तव में आज आतंकवाद के खिलाफ कोई अंतरराष्ट्रीय कानून नहीं जो आतंकवादियों को सजा दे सकेइसका फायदा आतंकी गुट उठा रहे हैंइसलिए विश्‍व के देशों को आतंकवाद के मुद्दे पर एक हो जाना चाहिए

सुषमा स्‍वराज ने जो दूसरी महत्‍वपूर्ण बात यूएनओ के मंच से रखी वह है कि संयुक्त राष्ट्र का निर्माण 1945 में कुछ ही देशों के हितों की रक्षा के लिए किया गया था। किंतु आज की वास्तविकता और परिस्थितियों में पिछले 72 सालों में बहुत बदलाव आया हैइसलिए इसे ध्‍यान में रखते हुए सुरक्षा परिषद की स्थायी और अस्थायी सदस्यता का विस्तार होना चाहिए। देखाजाए तो संयुक्त राष्ट्रएक अंतरराष्ट्रीय संगठन बनाने का तत्‍कालीन उद्देश्‍य यही रहा था कि यह संगठन अंतरराष्ट्रीय कानून को सुविधाजनक बनाने के सहयोगअन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षाआर्थिक विकाससामाजिक प्रगतिमानव अधिकार और विश्व शांति के लिए कार्य करेगा। वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र में  विश्व के लगभग सारे अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त देश हैं। इस संस्था की संरचना में आम सभासुरक्षा परिषदआर्थिक एवं सामाजिक परिषदसचिवालय और अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय सम्मिलित हैं। किंतु कहीं न कहीं यहां भी शक्‍ति सम्‍पन्‍न देशों अमेरिकाचीनफ्रांसरूस और यूनाइटेड किंगडम की मनमानी देखने को मिलती है।

भारत की विदेश मंत्री स्‍वराज का यहां सीधा यही कहना था कि कुछ देशों की बपौती नहीं बनना चाहिए इस अंतरराष्‍ट्रीय मंच को । ऐसा नहीं होना चाहिए कि आतंकवाद पर यदि भारत के समर्थन में अमेरिका खड़ा होता है तो चीन सुरक्षा परिषद का स्‍थायी सदस्‍य होने का नाजायज फायदा उठाए और हमारा विरोध यह कहकर करे कि आतंकवाद पर पाकिस्‍तान से त्रस्‍त होने की भारत की बातें सच नहीं। वस्‍तुत: आतंकवाद तो आतंकवाद हैवह हर देश का एक सा सच होगाउसे अलग तरह से परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए।  

वास्‍तव में यह हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्‍वराज का संयुक्त राष्ट्र के मंच से पाकिस्तान की आतंकियों को पालने की मंशा पर एक करारा प्रहार है। श्रीमती स्वराज ने इस मंच से पाकिस्तान को बिंदुवार जवाब दिया है। वहीं उसे यह भी जता दिया‍ कि जो स्‍वयं ही मानवाधिकारों पर अमल नहीं करता उसे भारत को लेकर मानवाधिकार की बातें करने का कोई नैतिक हक नहीं। पहले पाकिस्‍तान आतंक को पालना बंद करे तब मानवाधिकारों की पैरवी करे।

इस सब के बीच सच यही है आतंकवाद भारत या फ्रांसअमेरिका या किसी अन्‍य एक देश का दुश्‍मन नहीं हैयहपूरी दुनिया और मानवता का दुश्मन है । इसे उखाड़ फेंकने के लिए दृढ़ संकल्प और प्रबल इच्छाशक्ति चाहिए जोकि आज यूएनओ के सदस्‍य देशों के बीच स्‍थायी एकमत स्‍वरूप में दिखाई नहीं देती है। शायदसुषमाजी यही कहना चाहती थीं कि आतंकवाद पर सभी देश एकमत हों और जो देश आतंकवादी गतिविधियों में सम्‍मलित पाया जाएउसका सार्वजनिक वहिष्‍कार हो। यदि आज यह सुझाव दुनिया के देश स्‍वीकार कर लें तो संभवत: अलग-थलग पड़ने के भय से हो सकता है कि विश्‍व में आतंकवाद गतिविधियों में कमी आ जाए।

केंद्र का सबके लिए आवास पर काम : डॉ. मयंक चतुर्वेदी



भारत में 80 के दशक में एक फिल्‍म आई थी रोटीकपड़ा और मकान । इस फिल्म में अभिनेता शशिकपूर का एक प्रसिद्ध डायलॉग है, किसी भले आदमी ने कहा है कि ये मत सोचो कि देश तुम्‍हें क्‍या देता हैसोचो ये कि तुम देश को क्‍या दे सकते हो और जब तक हम सब ये नहीं सोचते हमारा कुछ नहीं हो सकता । इसी के साथ इस फिल्‍म की पटकथा यह भी बताती है कि इंसान की सबसे पहली आवश्‍यकता उसकी पेट की आग का शांत होना और उसके बाद तन ढंकने के लिए कपड़े फिर आवास यानि की सिर पर छत का होना है। आज पुन: इस फिल्‍म की याद इसलिए हो आई क्‍योंकि केंद्र सरकार ने फैसला ही कुछ ऐसा लिया है। केंद्र सरकार ने आज किफायती आवास के लिए नई सावर्जनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) नीति की घोषणा की है। इसके अंतर्गत अब से निजी भूमि पर भी प्राइवेट बिल्‍डरों द्वारा निर्मित किए जाने वाले प्रत्‍येक मकान के लिए 2.50 लाख रुपये तक की केंद्रीय सहायता दी जाएगी। जिसके बाद कि अब उम्‍मीद की जा सकती है कि शहरी क्षेत्रों में सरकारी भूमि पर क्रियान्वित होने वाली किफायती आवास परियोजनाओं में निजी निवेश की संभावनाएं भी काफी हद तक बढ़ जाएंगी।

वास्‍तव में काले धन की गिरावट और सरकारी सिस्‍टम के समकक्ष खड़ी हो चुकी नई भ्रष्‍ट अर्थ व्‍यवस्‍था का ध्‍वस्‍त होता समयआज सीधे तौर पर बता रहा है कि अब वे दिन दूर नहीं जब भारत अपनी प्रगति की उड़ान भरने में दुनिया के किसी भी देश से पीछे रहेअर्थात समय के साथ वह तेजी से वैश्‍विक क्ष‍ितिज पर आगे बढ़ रहा है । वस्‍तुत: यह इसलिए भी कहा जा रहा है कि इन दिनों केंद्र एवं राज्‍य सरकारें देश की आम जनता को रोटी मुहैया कराने के बाद अपने देश की जनता को उसी के टैक्‍स के रूप में दिए पैसे से किसी दूसरे रूप में उसी तक अपनी सेवाएं निरंतर पहुंचा रही है । फर्क सिर्फ इतना है कि पूर्व की तुलना में विकास का सूचकांक यहां नया सेट किया गया है।

केंद्र सरकार द्वारा जनता तक पहुंचाई जानेवाली सुविधाओं में एक नई व्‍यवस्‍था यह जुड़ी है कि आवास और शहरी नीति के अंतर्गत किफायती आवास वर्ग में निवेश करने के वास्‍ते निजी क्षेत्र को आठ पीपीपी (सार्वजनिक-निजी भागीदारी) विकल्प दिए गए हैं। इस नीति का उद्देश्‍य सरकारडेवलपर्स और वित्तीय संस्थानों के समक्ष मौजूद जोखिमों को उन लोगों के हवाले कर देना हैजो उनका प्रबंधन बेहतर ढंग से कर सकते हैं। इसके अतिरिक्‍त जो सीधतौर पर समझ आता हैवह यह भी है कि इस नीति के अंतर्गत 2022 तक सभी के लिए आवास के लक्ष्‍य को हासिल करने के लिए अल्‍प प्रयुक्‍त एवं अप्रयुक्‍त निजी और सार्वजनिक भूमि का उपयोग भी किया जा सकेगा ।

निजी भूमि पर किफायती आवास में निजी निवेश से जुड़े दो पीपीपी मॉडलों में प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के ऋण संबंधी सब्सिडी घटक (सीएलएसएस) के तहत बतौर एकमुश्‍त भुगतान बैंक ऋणों पर ब्‍याज सब्सिडी के रूप में प्रति मकान लगभग 2.50 लाख रुपये की केन्‍द्रीय सहायता देना भी इसमें शामिल है। दूसरे विकल्‍प में अगर लाभार्थी बैंक से ऋण नहीं लेना चाहता है तो निजी भूमि पर बनने वाले प्रत्‍येक मकान पर डेढ़ लाख रुपये की केंद्रीय सहायता प्रदान की जाएगी। वस्‍तुत: सरकार ने यहां राज्यप्रमोटर निकायों और अन्य हितधारकों के साथ व्यापक विचार-विमर्श के बाद आठ पीपीपी विकल्प तैयार किए हैं जिनमें से छह विकल्‍प सरकारी भूमि का उपयोग करते हुए निजी निवेश के जरिए किफायती आवास को बढ़ावा देने से संबंधित हैं।

सरकारी भूमि के इस्तेमाल वाले छह मॉडलों में डीबीटी मॉडल को प्रमुखता से लिया गया है जोकि यह कहता है कि  प्राइवेट बिल्‍डर सरकारी भूमि पर आवास की डिजाइनिंग के साथ-साथ इसका निर्माण कर इन्‍हें सरकारी प्राधिकारियों को हस्‍तांतरित कर सकते हैं। निर्माण की सबसे कम लागत के आधार पर सरकारी भूमि आवंटित की जाएगी। तय पैमाने पर आधारित सहमति के अनुरूप परियोजना की प्रगति के आधार पर सरकारी प्राधिकारी द्वारा बिल्‍डरों को भुगतान किया जाएगा और खरीदार सरकार को भुगतान करेगा।

यहां जो दूसरा मॉडल लाया गया है वह है क्रॉस-सब्सिडी वाले आवास का मिश्रित विकासजिसके अनुसार प्राइवेट बिल्‍डरों को दिए गए प्‍लॉट पर निर्मित किए जाने वाले किफायती आवासों की संख्‍या के आधार पर सरकारी भूमि का आवंटन किया जाएगा। ऊंची कीमतों वाले भवनों अथवा वाणिज्यिक विकास से अर्जित होने वाले राजस्‍व से इस सेगमेंट के‍ लिए सब्सिडी दी जाएगी। इसी का एक पीपीपी विकल्प वार्षिकी आधारित रियायती आवास योजना हैजिसके अनुसार सरकार के स्थगित वार्षिकी भुगतान के सापेक्ष बिल्‍डर निवेश करेंगे। बिल्‍डरों को भूमि का आवंटन यहां आवास निर्माण की यूनिट लागत पर आधारित है।

केंद्र सरकार की ओर से आम जनता को सस्‍ते एवं शीघ्र समय में मकान उपलब्‍ध हो सके इस‍के लिए चौथे विकल्‍प के रूप में वार्षिकी सह-पूंजी अनुदान आधारित किफायती आवास को चुना हैजिसके अंतर्गत वार्षिकी भुगतान के अतिरिक्‍त बिल्‍डरों को एकमुश्‍त भुगतान के रूप में परियोजना लागत के एक हिस्‍से का भुगतान किया जा सकता है। वहीं प्रत्‍यक्ष संबंध स्‍वामित्‍व वाले आवास के अंतर्गत प्रमोटर सीधे खरीदार के साथ सौदा करेंगे और लागत राशि वसूलेंगे। दूसरी तरफ सार्वजनिक भूमि का आवंटन आवास निर्माण की यूनिट लागत पर आधारित है। सरकार ने जो अपना अंतिम पीपीपी विकल्प चुना है वह है प्रत्‍यक्ष संबंध किराये वाले आवास । वस्‍तुत: इससे सरकारी भूमि पर निर्मित आवासों से प्राप्‍त किराया आमदनी के जरिए बिल्‍डरों द्वारा लागत की वसूली किया जाना संभावित है।

यहां निष्‍कर्ष रूप से समझ सकते हैं कि सरकारी भूमि आधारित इन छह पीपीपी मॉडलों के अंतर्गत लाभार्थी प्रति मकान 1.00 लाख से लेकर 2.50 लाख रुपये तक की केन्‍द्रीय सहायता पा सकते हैं। वसतुत: देखाजाए तो आवास संबंधी इस निर्णय से देश के हर उस व्‍यक्‍ति को लाभ होगा जो अपना छोटा सा आशियाना चाहता है। इस निर्णय के बाद अब कहा जा सकता है कि सरकार ने आज अनेक तरह की रियायतों और प्रोत्‍साहनों के जरिए अनुकूल स्थितियां रियलस्‍टेट क्षेत्र में भी बना दी हैं।

यहां पुनश्‍च शशि कपूर को रोटीकपड़ा और मकान फिल्‍म के जरिए याद करते हुए कहना होगा कि वह जो कहता है,वह आज देशभर में जीएसटी जैसे कानून और उसके अनुपालन में आम जनता पर भी हूबहू लागू हो रहा है। इससे जनता जनार्दन को मिलनेवाले लाभ को जोड़कर भी देखा जा सकता है। देश में एक टैक्स-एक देश-एक मार्केट का सपना भले ही यर्थाथ हो रहा है लेकिन इसके विरोध में स्‍वर अभी भी तेज हैं। कारण लोगों के मन में कई तरह के कन्फ्यूजन का होना तथा टैक्स के सिस्टम में एकदम से आया बदलाव है।  परन्‍तु इसी के साथ सच यह भी है कि भारत सरकार के पास अब पहले जैसी धन की कोई कमी नहीं रही है। आमजन का पैसा उसके पास टैक्‍स के रूप में कई स्‍तरों पर तेजी के साथ पहुंच रहा हैयह अंतर पूर्व की तुलना में इतना अधिक है कि देश में चहुंओर होनेवाले द्रुत गति से विकास की सहज कल्‍पना की जा सकती हैइससे इस बात के लिए भी पूरी तरह से आशान्‍वित हुआ जा सकता है कि भविष्‍य में भारत का विकास बहुत तेजी से होगाजिसके लक्षण इस एक निर्णय से भी सीधेतौर पर दिखाई दे रहे हैंरोटी के बाद आवास देश के हर नागरिक की पहली जरूरत जो है।

गौ-उवाच, प्रश्‍न खड़े करती है, संवाद का मर्म बताती है : डॉ. मयंक चतुर्वेदी


    गौ-के बारे में हम सभी अपने बचपन से कुछ जानते-समझते आए हैंवहीं कुछ लोगों को ये सौभाग्‍य भी मिला है कि वे उसके साथ वक्‍त गुजारतेकुछ ने तो अब भी गौ-सेवा को अपना लक्ष्‍य बना रखा है। इसलिए गाय माता को लेकर सबकी अपनी-अपनी अनुभूतियां हैं। प्राचीन वैदिक वांग्‍मय में गोमाता का सन्दर्भ 1331 बार आया है। जिसमें कि ऋग्वेद में 723 बारयजुर्वेद में 87 बारसामवेद में 170 बार और अथर्ववेद में 331 बार गौ का किसी न किसी रूप में स्‍मरण किया गया है। ऋग्वेद में कहा गया है कि जिस स्थान पर गाय सुखपूर्वक निवास करती है वहां की रजत पवित्र हो जाती है ।  अथर्ववेद में रुद्रों की मातावसुओं की दुहिताआदित्यों की स्वसा और अमृत की नाभि-संज्ञा से गौ को विभूषित किया गया है ।  वेदों में गाय के लिए गोधेनु और अघ्न्या ये तीन शब्द सबसे अधिक हैं । वेदों को समझने के लिये छः वेदांग शास्त्रों में से एक निरुक्त शास्त्र में वैदिक शब्दों के अर्थों को विस्‍तार से बताया गया है जिसे निर्वचन कहते हैंयहां हन हिंसायाम्’ धातु से हनति,  हान आदि शब्द बनते हैं जिसका अर्थ हिंसा करना मारना है।  गौ के लिए यहां अघ्न्या कहा गया है अर्थात् जिसकी कभी भी हिंसा न की जाये।

इसी प्रकार शतपथ ब्राह्मण में (7/5/2/34) में कहा गया है-सहस्रो वा एष शतधार उत्स यदगौ: अर्थात भूमि पर टिकी हुई जितनी जीवन संबंधी कल्पनाएं हैं उनमें सबसे अधिक सुंदरसत्यसरसऔर उपयोगी यह गौ है।  इसमें भी गाय को अघ्न्या बताया गया है। वस्‍तुत: यह वेदों में गाय का महत्व है।  सभी ऋषियों ने एक स्‍वर में बोला है कि गाय की हत्या नहीं करनी चाहिए। इस धरती पर विचरण करने वाले जीव-जन्तुओं में संभवत: गाय ही एकमात्र ऐसी है जिसे देवतुल्य व पूज्य माना गया है।

वेदों से आगे पुराणों एवं श्रीमद्भगवत गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने कामधेनु की महत्ता बताई है। केवल हिन्दू धर्म में ही नहींअन्य मत-पंथों में भी इसकी महत्ता और पवित्रता को स्वीकार किया गया है। गोसेवा को पुण्य कर्म माना गया है। ऐसी पापनाशिनीसमस्त जगत का कल्याण चाहने वाली गाय की धार्मिकआध्यात्मिक,सांस्कृतिकआर्थिक एवं औषधीय महत्ता को समेटे हुए और वर्तमान में गाय से जुड़े जनमानस के बीच के अंतर्विरोध को रेखांकित करती हुए पुस्तक 'गौ-उवाचडॉ. देवेन्‍द्र दीपक की एक श्रेष्‍ठ कृति है। कुल 30 कविताओं के माध्‍यम से पुस्तक में गाय की महत्ता का विस्तार से विवेचन एवं समाज की कमियों को प्रमुखता से उठाया गया है।  

डॉ. देवेन्‍द्र दीपक की पुस्‍तक गौ-उवाच अपने आप में वर्तमान समाजिक और प्रशासनिक व्‍यवस्‍था के साथ उस समुची प्रणाली के प्रति प्रश्‍न खड़े करती है जोकि गाय के प्रति दिखावे की संवेदना तो दिखाती हैंकिंतु व्‍यवस्‍था सुधार के लिए अपने ईमानदार प्रयत्‍न करते दिखाई नहीं देती है।

प्रश्‍न यह है कि वर्तमान में गौ भारतीयों के लिए क्‍या रही है पशुदूध देनेवाला यंत्र या इससे बहुत व्‍यापक भिन्‍न......गौ- वैदिक काल में देव... उत्‍तर वैदिक काल में माता... मध्‍यकाल में पशु.... और आधुनिक काल में ?स्‍वयं एक भोजन...मांस का लूथड़ाजिसकी चर्बीसींग और नाखूनों की कीमत उसकी देह से अधि‍क है। वस्‍तुत: यह पुस्‍तक हम सभी के बीच आज सोचने के लिए एक समान भावधारा पैदा करती है और विमर्श के लिए जमीन। इस पुस्‍तक की पहली कविता ही बहुत कुछ स्‍पष्‍ट कर देती है :

पक्षपात तुम करते होमैं नहीं करती...छुआ-छूत तुम मानते हो...मैं नहीं मानती...मुझे बीच में खड़ा कर ..तुम लड़ते हो...लड़ने-लड़ाने की शैली...तुम्‍हारी हैमेरी नहीं। पुस्‍तक राजनीतिक स्‍तर पर कांग्रेस जैसी राष्‍ट्रीय पार्टी से यह सवाल भी करती है कि क्‍या सोचकर तुमने..दो बैलों की जोड़ी को अपना चुनाव चिह्न बनाया ?..और क्‍या हुआ तुमने उसे छोड़ दिया पुस्‍तक देश के गद्दीदारों से पूछती है कि आखिर मेरे अपनत्‍व में कमी क्‍या रह गईजो वफा की उम्‍मीद अब तक अधूरी है। गौ-उवाच में वफा कविता में डॉ. देवेन्‍द्र ने बड़ी ही साफगोई से यह पूछा हैवह जो विदेशी था चला गया..ये जो देशज हैं.. यही तो अदल-बदल कर तख्‍त पर बैठे रहे...आरे के दांतों के नीचे.. हमारी गर्दन ज्‍यों की त्‍यों....हमारी चीख सुने कौन ?... प्राणों की भीख सुने कौन ?... दिल्‍ली की पंचायत अंधीबहरी... एक तरफा... हम गायों से कौन करे वफा ?.....

यहां गाय देश के कर्णधारों से सीधे पूछ रही है कि वे मुझे हिंसक नजरों से घूरते हैंमेरे प्रति घोर अवमानना है भीतर उनके.... वे ताल ठोककर कहते हैं....हम कुछ भी खाएं...यह हमारी मर्जी....कोई कौन होता है हमें टोकने वाला करुण कातर मैं टुकुर टुकुर देखती हूंमेरे भारत का यह कैसा संविधान इनके सब हैं अधिकारमेरे हित में क्‍या है समाधान गौ-उवाच में पंडित और ख्‍वाजा के सांकेतिक प्रतिरूपों के माध्‍यम से खासतौर पर इस पुस्‍तक में डॉ. देवेन्‍द्र दीपक  अवश्‍य यह पूछते दिखे कि अपने बुढ़ापे के लिए तुम्‍हें चाहिए अच्‍छी खासी पेंशन...हमारे लिए बूचड़खाने का दरवाजा... क्‍यों भाई पंडितक्‍यों भाई ख्‍वाजा ?...वास्‍तव में गाय का आज सबसे बड़ा दर्द यही है कि उसके बूढ़े होने के बाद सबसे ज्‍यादा उसे चारा और पानी देनेवाले ही दर दर भटकने के लिए छोड़ देते हैं।

यह पुस्‍तक बड़ी ही बेवाकी से यह भी पूछने का साहस करती है कि वह जो खाता है मेरा मांस बड़ा सहिष्‍णु है,वह जो पीता है मेरा दूध वड़ा असहिष्‍णु है। मेरे भारत को ये क्‍या हो गया हैन्‍याय और औचित्‍य कहां खो गया है ?..... इतना ही नहीं तो आज समाज और सरकार दोनों स्‍तरों पर इन दिनों समाजिक समरसता की बातें बहुत हो रही हैंऐसे में यहां गौ देश के आम जन से पूछती हैं कि बीफ को जलसे जलूस में धमक के साथ खाना मेरे प्रेमी भक्‍तों को खुले आम चिढ़ाना...समाजिक समरसता के विरुद्ध यह एक नियोजित अभियान है।

डॉ. दीपक बड़ी चतुरायी से अपनी इस पुस्‍तक में गंगा-जमुनी तहजीब पर भी सवाल खड़े करते हैंइस संयुक्‍त संस्‍कृति पर गाय यहां आम जन से जनना चाह रही है कि राजनीतिकलासंस्‍कृति और शिक्षासब मंचों पर दशकों से गंगा जमुनी तहजीब तकिया कलाम की तरह चलन में है...अगर सच ऐसा है तो अच्‍छी बात है। एक बात हमें कहनी है...सदा के लिए यह बात तय हो जानी चाहिए.. हमें बतादी जानी चाहिए- गंगा जमुनी तहजीब में हम गायों को क्‍या जगह है ?.... और जो जगह हैउसकी क्‍या वजह है ?....

वास्‍तव में यह एक ऐसा प्रश्‍न है जहां हमारा संविधान भी मौन है..इसी बात को डॉ. दीपक अपनी हित नामक कविता में भावनात्‍मक स्‍हायी से शब्‍दों को उकेरते हैं और पूछते हैं कि मेरा मांस खानेवालों के सर्वाधिकार सुरक्षितमेरा दूध चाहनेवालों के हितकौन करे संरक्षित...संविधान में दिए अधिकार सब कुछसंविधान में दिए कर्तव्‍य कुछ भी नहीं।..... वस्‍तुत: पुस्‍तक गौ-उवाच की हर कविता सीधे ह्दय को छूती हैभावनाओं में सागर सा वेग पैदा करती है और हर बार हर कविता कहती है कि अपनी मर्यादाओं को लांघ जाओगाय जैसी अमृता को जीवन दान देने के लिए अपना सर्वस्‍व होम कर जाओ।....

अंत में इस पुस्‍तक की कविता वर्तमान शासन तंत्र के प्रति अपनी कृतज्ञता तो ज्ञापित करती ही है साथ में स्‍वयं में भय से लिपटी प्रसन्‍नता का बोध कराती हैकवि‍ कहता है कि भारत में सदियों के बादकुछ अनुकूलता आई गौ वंश के लिए।... एक सुखद अध्‍याय हमारी मुक्‍ति के खण्‍डित इतिहास में फिर जुड़ा.... प्रमाण उस कोटि जन को जो हमारी रक्षा के लिए हवन हो गया खुशी खुशी।.. हमें न्‍याय मिला हम प्रसन्‍न हैं लेकिन हमारी यह प्रसन्‍नता लिपटी है भय के काले रुमाल में.... कहीं ये चार दिन की चांदनी तो नहीं?... हमारा इतिहास साक्षी है हमारे वध पर प्रतिबंध लगते रहे… प्रतिबंध निरस्‍त होते रहे….. क्‍या पता इतिहास अपने को फिर दोहराए,,,

यहां इस पुस्‍तक की सबसे अच्‍छी बात यह है कि बेरोजगारी के कोहराम के बीच गौ इस पुस्‍तक में आह्वान कर रही है कि मैं गाय हूं एक माय हूं अवैध बूचड़खाने वालों बच्‍चों के पेट का सवाल है,,,, मैं कहती हूं,….. मेरे पास आओ दूध डेयरी के धंधे में लग जाओ,….आज तुम दिनभर देखते हो खून ही खून….. फि‍र तुम दिन भर देखोगे दूध ही दूध....

पुस्‍तक में भाषा शैलीशब्‍द विन्‍यास का बहुत ध्‍यान रखा गया हैसामान्‍य रोजमर्रा के बोलते शब्‍दों में डॉ. देवेन्‍द्र दीपक के माध्‍यम से गौ यहां अपनी भावनाओं को व्‍यक्‍त कर रही है। यह पुस्‍तक न केवल पढ़ने के बाद उसकी शब्‍द ऊर्जा को अपने अंदर में समेटने के लिए विवश करती हैंबल्कि यथार्थ जीवन में गौ सेवा के लिए प्रवृत्‍त भी करती है। सही पूछिए तो यही इस पुस्‍तक की सफलता है और डॉ. देवन्‍द्र दीपक की कलम की धन्‍यता भी.....

लेखक हिन्‍दुस्‍थान समाचार बहुभाषी न्‍यूज एजेंसी के मध्‍यप्रदेश ब्‍यूरो प्रमुख एवं फिल्‍म सेंसर बोर्ड एडवाइजरी कमेटी के सदस्‍य हैं।

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

देश पर कम होता ऋण भार : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

ण को विकास के लिए जितना अधिक अपरिहार्य माना गया हैउतना ही लगातार इससे डूबे रहने को जनमानस में घोर विपत्‍ति‍कारक स्‍वीकार्य किया गया है। भारत पर आज दुनियाभर का कितना कर्ज हैयह जानकर जितनी अधिक चिंता होती हैवहीं इन दिनों इससे भी सतुष्‍टी का भा जाग्रत होता है कि कम से कम यह ऋणभार मोदी सरकार में कम होना तो शुरू हुआ। वित्त मंत्रालय की भारत पर विदेशी ऋण: स्थिति हालिया आई रिपोर्ट 2016-17’ बता रही है कि पुराने ऋण को समाप्‍त करने में केंद्र सरकार कितनी अधि‍क सक्रिय है। 

एक दृष्‍ट‍ि में देखाजाए तो मार्च 2017 के आखिर में भारत पर 471.9 अरब अमेरिकी डॉलर का विदेशी ऋण थायह मार्च 2016 के आखिर में आंके गए विदेशी ऋण की तुलना में 13.1 अरब अमेरिकी डॉलर (2.7 फीसदी) कम हुआ है। लगने को यह ऋण के कम होने का आंकड़ा एक दम से देखने पर अधि‍क नहीं लगता हैकिंतु इसके सांख्‍यीकि एवं व्‍यवहारिक पक्ष को देखाजाए तो देश के स्‍तर पर भारत के लिए अवश्‍य ही यह एक सुखभरी खबर है।  

भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग द्वारा तैयार की गई भारत पर विदेशी ऋण: स्थिति रिपोर्ट इस बात को विस्‍तार से बताती है कि आखिर में किस तरह संभावनाओं के प्रयोग एवं नवाचारों से भारत पर विदेशी ऋण की स्थिति में सतत सुधार आ रहा है। रिपोर्ट तुलनात्‍मक रूप से भारत पर विदेशी ऋण के रुझानसंरचना और ऋण भुगतान का विश्लेषण करने के साथ ही अन्य देशोंविशेषकर विकासशील देशों के सापेक्ष भारत पर विदेशी ऋण की एक तुलनात्मक तस्वीर सफलता के साथ प्रस्‍तुत करने में भी सफल रही है ।

वस्‍तुत: केंद्र में भाजपा सरकार आने के बाद से लगातार आर्थ‍िक मोर्चों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जो निर्णय लिए गएउसमें विशेषकर नोटबंदी जैसे मुद्दों को लेकर यही प्रयास होता रहा है कि किसी न किसी तरह सरकार को कटघरे में खड़ा किया जाए। विपक्ष ने इसके लिए कोई कसर भी नहीं छोड़ीकिंतु इसके बाद जो उसके सकारात्‍मक परिणाम अब सामने आ रहे हैं उससे लगने लगा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दूरदृष्‍टा हैंवे स्‍पष्‍ट जानते हैं कि हमें विकास के कौन से रास्‍ते पर चलकर देश को आगे ले जाना है और किस तरह से अपने ऊपर लगातार बढ़ते कर्ज को कम करने की दिशा में आगे बढ़ते रहना है। तभी तो मार्च 2017 के आखिर में भारत पर 471.9 अरब अमेरिकी डॉलर का विदेशी ऋण थायह मार्च 2016 के आखिर में आंके गए विदेशी ऋण की तुलना में 13.1 अरब अमेरिकी डॉलर (2.7 फीसदी) कम हो गया है।

वास्‍तव में यह विदेशी ऋण में कमी दीर्घकालिक ऋण विशेषकर एनआरआई जमाराशि और वाणिज्यिक उधारियों में गिरावट की वजह से संभव हो पायी है।भारत पर विदेशी ऋण: स्थिति रिपोर्ट के आंकड़े यह भी बता रहे हैं कि मार्च 2017 के आखिर में दीर्घकालिक विदेशी ऋण 383.9 अरब अमेरिकी डॉलर का थाजो कि मार्च 2016 के आखिर में आंके गए आंकड़े की तुलना में 4.4 फीसदी की गिरावट को दर्शाता है। मार्च 2017 के आखिर में कुल विदेशी ऋण का 81.4 प्रतिशत दीर्घकालिक विदेशी ऋण थाजो मार्च 2016 के अंत में 82.8 प्रतिशत । इसी प्रकार देश पर मार्च 2017 के आखिर में अल्‍पकालिक विदेशी ऋण 5.5 प्रतिशत बढ़कर 88.0 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया। यह मुख्य रूप से व्यापार संबंधी क्रेडिट (ऋण) में वृद्धि के कारण हुआजो 98.3 प्रतिशत हिस्‍सेदारी के साथ अल्पकालिक ऋण का एक प्रमुख घटक है।

इस तरह यदि भारत पर विदेशी ऋण रिपोर्ट को ओर गंभीरता से देखें तो विदेशी मुद्रा भंडार कवर एवं ऋण के अनुपात के 74.3 प्रतिशत से बढ़कर 78.4 प्रतिशत हो जाने और विदेशी ऋण-जीडीपी अनुपात के 23.2 प्रतिशत से गिरकर 20.2 प्रतिशत पर आ जाने से भारत पर विदेशी ऋण इस वक्‍त बहुत ही नियंत्रित दायरे में गया है और वर्ष 2015-16 की तुलना में वर्ष 2016-17 में विदेशी ऋण की स्थिति में तेजी से सुधार हुआ है

यह स्‍थ‍िति विश्व बैंक की "अंतर्राष्ट्रीय ऋण सांख्यिकी 2017"के ऋण आंकड़ों के संदर्भ में भी आगे आश्‍वस्‍त करती है कि हमारे देश भारत की गणना वर्तमान में विश्‍व के कम असुरक्षित’ देशों में की जा रही है। आज मोदी सरकार में भारत के विदेशी ऋण संकेतक अन्य ऋणी या ऋणग्रस्त विकासशील देशों की तुलना में बहुत ही अच्‍छी स्‍थ‍िति में हैं। भारत पर विदेशी ऋण और सकल राष्ट्रीय आय (जीएनआई) का अनुपात 23.4 प्रतिशत हैजो पांचवें न्‍यूनतम पायदान को दर्शाता है। इसी तरह विदेशी ऋण के लिए विदेशी मुद्रा भंडार द्वारा उपलब्ध कराए गए कवर के लिहाज से भी भारत इनदिनों बहुत ही श्रेष्‍ठ और उच्‍चावस्‍था में दिखाई दे रहा है।  अब इसके बाद भी आर्थ‍िक विषयों को लेकर जिन्‍हें केंद्र सरकार की आलोचना ही करना हैउनके लिए कुछ नहीं कहा जा सकता है।

रविवार, 17 सितंबर 2017

पेट्रोल दामों पर सरकार की नीयत : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

देखते ही देखते मोदी सरकार में पेट्रोल के दाम 3 साल में सर्वाधिक हो गए,  इस दौरान क्रूड 45 फीसदी सस्ता रहाकिंतु भारतीय उपभोक्‍ताओं से पेट्रोल की कीमत कम होने के स्‍थान पर बढ़ोत्‍तरी के साथ ली गई। यह जो कीमतों का विरोधाभास हैजिसमें की एक ओर अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कीमते कम हो रही हैं और देश में उपभोक्‍ता से कम कीमत के स्‍थान पर प्रति लीटर पूर्व की अपेक्षा अधिक राशि रोजमर्रा के हिसाब से सुनिश्‍च‍ित कर वसूली जा रही है उससे लगता यही है कि 16 जून से पेट्रोल के दाम घटाना-बढ़ाने का जो निर्णय केंद्र सरकार ने देशभर में यह कहकर लागू किया था कि रोज पेट्रोल के दाम तय करने से आम जनता को लाभ होगा कहीं यह जनता के साथ तो सीधा छलावा नहीं है?

मनमोहन सरकार में जबकि ऐसा नहीं थापिछली सरकार ने प्रतिदिन के हिसाब से कभी पेट्रो कीमतें निर्धारित नहीं कीजिसके कारण जनता की जेब पर सीधा इसका नकारात्‍मक असर कम-ज्‍यादा प्रतिदिन कभी नहीं पड़ता था। हालांकि वह भी लगातार अधिक कीमते रखकर पेट्रोल पर मुनाफा कमाती थी। उस समय वैश्‍विक स्‍तर पर अधिक कीमते होने पर देश में पेट्रो दाम अधिक होते ही थे किंतु कम होने के बाद भी लम्‍बे समय तक अधि‍क बने रहते थे,जिसका की समय समय पर देशभर में विरोध भी हुआ थालेकिन सोचनीय यह है कि आज के हालातों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी की सरकार में इसे कितना सही ठहराया जा सकता है जिस पर की सबसे ज्‍यादा जोर वर्तमान केंद्र सरकार का पारदर्श‍िता पर ही है। वस्‍तुत: इसकी गंभीरता को देखें तो वर्तमान में इस निर्णय से लाभ के स्‍थान पर आमजन की जेब मनमोहन सरकार के वक्‍त से अधिक खाली हो रही है।

मुम्‍बई देश की आर्थ‍िक राजधानी कहलाती हैयहां 11 सितम्‍बर को पेट्रोल की कीमत 79.41 रुपए थीजबकि देश की राजधानी दिल्ली में 70.30 रुपए लीटरइसी तारतम्‍य में दो दिन बाद 13 सितम्‍बर की स्‍थ‍िति में मध्‍यप्रदेश की राजधानी भोपाल में प्रति एक लीटर पेट्रोल की कीमत देखें तो 79.52 रुपए पॉवर एवं 76.77 रुपए सादा पेट्रोल के दाम थेडीजल 65.17 रुपए के दाम पर था। जिसके लिए कहा जा सकता है कि यह कीमत भाजपा सरकार के केंद्र में आने के बाद पि‍छले तीन साल में सबसे अधिक है। वस्‍तुत: जब से पेट्रोल के दाम रोज तय किए जा रहे हैंतब से दाम 7% से ज्यादा बढ़ चुके हैं। यहां देश की आमजनता का अपनी चुनी हुई सरकार से पूछना यही कि ऐसी स्‍थ‍िति में पेट्रोल की खुदरा कीमतें तीन साल से उच्च स्तर क्‍यों रखी गई हैं, जबकि कच्चे तेल का भारतीय बास्केट 45% से ज्यादा सस्ता हुआ है।

इस संबंध में आंकड़े सीधे तौर पर कह रहे हैं कि पेट्रोलियम मंत्रालय ने अपनी जो दर संबंधी नीति बनाई है उसमें बहुत कमी है। अगस्त 2014 में क्रूड का भाव 6,291.91 रु. प्रति बैरल थाजिसके कारण से उस समय 1 अगस्त 2014 को मुंबई में पेट्रोल की कीमत 80.60 रुपए और 15 अगस्त 2014 को दिल्ली में 70.33 रुपए तक पहुँच गई थीकिंतु क्‍या वर्तमान में ऐसा हैजिसका उत्‍तर है नहीं। आज क्रूड का भाव 3,424.94 रु. है। जिसके की यह एक बैरल 159 लीटर के बराबर होता है। इसी के साथ ही भारतीय बास्केट में दुबई और ओमान के'सावर ग्रेडकी 73% हिस्सेदारी भी मौजूद है। शुरूआती स्‍तर पर देखें तो अप्रैल से 15 जून तक हर पखवाड़े पेट्रोल की कीमत घट-बढ़ रही थी। लेकिन दो जुलाई के बाद से इसके दाम लगातार बढ़ते रहे हैं।

माना कि सरकार को तेल कंपनियों को अपना खर्च निकालना है। केंद्र के साथ हर राज्‍य सरकार को इससे अपना मुनाफा कमाना हैपरन्‍तु उसका कोई सि‍स्‍टम तो होगा मुनाफा कितना और कैसे कमाया जाए पेट्रोल देश के हर आदमी की आज आवश्‍यक जरूरत बन चुका है। वह उसकी कहीं न कहीं मजबूरी भी है। इसलिए ऐसा नहीं होना चाहिए कि वह पेट्रोल के दामों में बेतहाशा वृद्ध‍ि को लेकर सरकार द्वारा स्‍वयं को ठगा हुआ महसूस करे। आम उपभोक्‍ता की जेब से इस तरह से उसकी मजबूरी का फायदा उठाकर ज्‍यादा से ज्‍यादा रुपए विविधकर एवं खर्चे के नाम से पेट्रोल के माथे डालकर निकालने को कोई उचित नहीं ठहरा सकता है। स्‍वयं सरकार के अंदर भी लोग इस तरह से पेट्रोल दामों का आज घटना-बढ़ना सही नहीं मान रहे हैं।

इसी के साथ देश को यह भी जानना चाहिए कि भारत में पेट्रोल और डीजल का कुल उत्पादन घरेलू खपत से ज्यादा है । पिछले वर्ष अप्रैल से दिसंबर की अवधि में देश में 2.71 करोड़ टन पेट्रोल का उत्पादन किया गयाजबकि इस दौरान खपत 1.80 करोड़ टन रही। जहां तक डीजल की बात है इसका घरेलू उत्पादन 7.65 करोड़ टन और खपत 5.72 करोड़ टन रही थी । इस सब के बीच सच यह भी है कि आवश्‍यकता के अनुरूप भारत में पिछले चालू वित्त वर्ष अप्रैल से दिसंबर अवधि में कुल मिलाकर 8,20,000 टन डीजल का और 4,76,000 टन पेट्रोल का आयात किया गया।  इन नौ महीनों में सिंगापुर के मुकाबले यूएई ने सबसे अधिक 2,43,000 टन पेट्रोल की आपूर्ति की गई थी और डीजल में भी यूएई से सबसे अधिक 3,80,000 टन डीजल आयात किया गया थाजबकि सिंगापुर से 1,69,000 टन पेट्रोल आयात किया गया था।

अत: सरकार को वस्‍तुस्‍थ‍िति को देखते हुए करना यह चाहिए कि वह देश में अधिक से अधिक ऊर्जा के वैकल्‍पिक स्‍त्रोतों को बढ़ाएपेट्रोल के स्‍थान सस्‍ता ईंधन इथनॉल को भारत में भी अब बढ़ावा दिया जाना चाहिए । इसे जब वैज्ञानिकों ने पेट्रोल के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया है और आज कई यूरोपीय देशों में जब इथनॉल का उपयोग भी सफलतापूर्वक शुरू कर दिया है तो भारत को फिर क्‍यों इसके उपयोग से अछूता रहना चाहिए। इसके अलावा बायोफ्यूलसौर ऊर्जा और हाईड्रोजन ईधन के भी कुछ विकल्प हमारे पास मौजूद हैं। यहपर्यावरण को जीवाश्म ईधन की तुलना में नुकसान भी कम पहुंचाते हैं

वस्‍तुत: केंद्र सरकार यदि जीवाश्‍म ईंधन की तुलना में इन्‍हें बढ़ावा देगी तो देश का बहुत सा धन भी खाड़ी एवं अन्‍य देशों को जाने से बचेगा और देश में नए रोजगार का भी बहुतायत में श्रृजन होगा। इसके अलावा पेट्रोल की कीमतें भी बहुत कम हो जाएगीइतना ही नहीं तो इन दिनों जो बढ़ती पेट्रोल कीमतों के कारण से सरकार की नीयत पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं,उनका शमन भी अपने आप हो जाएगा। इसलिए यह जरूरी हो गया है कि पेट्रोलियम मंत्री धमेंद्र प्रधान अब इस विषय पर गंभीरतापूर्वक ध्‍यान दें।

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री का हिन्‍दी प्रेम और ज्‍वलंत प्रश्‍न ? डॉ. मयंक चतुर्वेदी


ध्‍यप्रेदश की राजधानी भोपाल में आज हिन्दी दिवस पर समन्वय भवन में अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित हिन्दी दिवस कार्यक्रम रखा गया, जिसमें कि राज्‍य के संस्‍कृति विभाग का भी योगदान रहा । मुझे याद है कि हर वर्ष जब भी हिन्‍दी दिवस आता है हमारे मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान महोदय  का भाषण अत्‍यधिक प्रवाहपूर्ण उत्‍तेजनात्‍मक और श्रोताओं को आत्‍ममुग्‍ध कर देनेवाला होता है। हम भी जब जब इस आयोजन में उपस्‍थ‍ित रहे, ऐसा कभी नहीं हुआ कि मुख्‍यमंत्री बोलें औ तालियां न बजें। किंतु इस सब के बाद भी कुछ ज्‍वलंत प्रश्‍न हिन्‍दी और हमारे मुख्‍यमंत्री के साथ जुड़े हैं। जिनके उत्‍तर नहीं व्‍यवस्‍था में सुधार के साथ वह सभी व्‍यवहार में लागू होना चाहिए जिनकी कि हमारे मुख्‍यमंत्री हिन्‍दी दिवस पर वायदे एवं चर्चाएं करते रहे हैं। 

आज जो उनका भाषण था उसमें उन्‍होंने कहा है कि हिन्दी अत्यंत समृद्ध भाषा है। इसके प्रति संकीर्णता ठीक नहीं है। हिन्दी छोड़कर अंग्रेजी बोलना मानसिक गुलामी है। हिन्दी बोलने, लिखने और पढ़ने में गर्व होना चाहिए। हिन्दी का मान-सम्मान बढ़ाने के लिये समाज को भी आगे आना होगा। वहीं  निजी विश्वविद्यालयों को हिन्दी विभाग स्थापित करने के लिये निर्देशित किया जाएगा। प्रत्येक दो वर्ष में राज्य-स्तरीय हिन्दी सम्मेलन आयोजित करने की घोषणा भी उन्‍होंने की है । उन्होंने कहा है कि सरकार किसी भी भाषा का विरोध नहीं करती, लेकिन हिन्दी की कीमत पर अंग्रेजी का उपयोग ठीक नहीं है। मुख्‍यमंत्री के अनुसार अगले साल से हिन्दी दिवस का आयोजन भव्य होगा और इसमें सभी विश्वविद्यालय शामिल होंगे।

श्री चौहान ने आज यह भी कहा कि बाजारों में दुकानों पर नाम और सूचना पट्टिकाएं हिन्दी में लगाना अनिवार्य करने के लिये वैधानिक उपाय किये जाएंगे। हिन्दी की शक्ति, सामर्थ्य और क्षमता से समाज की नई पीढ़ी को अवगत कराने के लिये समाज के सहयोग से निरंतर अभियान चलाना पढ़ेगा। इस कार्यक्रम में मुख्‍यमंत्री अपनी विदेश यात्राओं के संस्‍करण सुनाने से भी नहीं चूके और कहा कि हर जगह हिन्दी में ही भाषण दिया और संवाद किया। राष्ट्रभाषा का उपयोग करने से उनकी प्रतिष्ठा भी बढ़ी और सराहना भी मिली। 

इस सब बातों के बीच जो अहम चिंता मेरी है वह यही है कि वर्ष 2015 में भोपाल में हुए अंतरराष्‍ट्रीय हिन्‍दी सम्‍मेलन में मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह ने घोषणा की थी कि हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय को वैश्‍विक स्‍तर का बनाएंगे । किंतु दो वर्ष बीत गए । वह अंतरराष्‍ट्रीय तो छोड़िए आज राष्‍ट्रीय स्‍तर का भी नहीं बन सका है। संसाधनों की कमी, धन का अभाव, प्रशासन की बेरूखी जैसी तमाम बातें हैं जिसके कारण से वह आज आगे ही नहीं बढ़ पा रहा है। पहले यहां कुलपति प्रो. मोहनलाल छीपा थे जो सदैव संसाधनों की कमी से परेशान थे किंतु आज यहां कुलपति प्रो. रामदेव भारद्वाज हैं, जिनके पास भी सरकार द्वारा इतने धन की व्‍यवस्‍था नहीं की गई है कि वे इस विश्‍वविद्यालय को राष्‍ट्रीय स्‍तर का भी बनाने की सोच सके। 

मेरी एक चिंता यह भी है कि अंतर्राष्‍ट्रीय हिन्‍दी सम्‍मेलन में हिन्‍दी के विकास के लिए संकल्‍प पत्र लाया गया था, उसमें कुछ सैद्धान्‍तिक एवं व्‍यवहारिक बातें अमल के लिए दी गई थीं। क्‍या सरकार पिछले दो सालों में भी उन पर प्रशासनिक स्‍तर पर अमल कराने में सफल रही है ? नहीं रही । हमारे मुख्‍यमंत्री बहुत अच्‍छे हैं, वह सोचते भी बहुत श्रेष्‍ठ हैं किंतु क्‍या उनकी प्रशासनिक मशीनरी को उनकी इच्‍छाओं को शतप्रतिशत अमल में नहीं लाना चाहिए ? अंत में उनसे आग्रह इतनाभर है कि अटल बिहारी वाजपेयी हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय श्रद्धेय सुदर्शनजी का एक वृहद स्‍वप्‍न का यथार्थ रूप है । वे भी एक स्‍वयंसेवक हैं, विद्यार्थी परिषद में उन्‍होंने देशसेवा और रीति-नीति का पाठ पढ़ा है। अत: वे श्रद्धेय सुदर्शनजी के इस यथार्थ स्‍वरूप के आकार एवं उसकी भव्‍यता में कोई कसर न छोड़े , इसके बाद यहां से निकले विद्यार्थी हिन्‍दी का भला स्‍वयं ही कर लेंगे । आज के दिन ये उम्‍मीद तो की ही जा सकती है ।   

रविवार, 10 सितंबर 2017

जेएनयू में एबीवीपी नहीं हारी है : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

हां छात्र संघ चुनाव के आए परिणामों को देखें तो एकदम से ऐसा लगेगा कि जेएनयू के चुनावों में वामदल समर्थक छात्रों ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्र प्रत्‍याशियों को हरा दिया। जीत का जश्‍न आज उनके नाम है जो देश में विरोध की राजनीति करते आए हैं और जिनका विश्‍वास सिर्फ आन्‍दोलन एवं तोड़फोड़ के साथ दूसरों को गरियाने में है। लेकिन क्‍या वाकई में अभाविप यहां की यहां हार हुई है परिणाम आने के बाद से चले लगातार के मंथन से निष्‍कर्ष यही है कि कुछ कुत्‍ते भी मिलकर एक हाथी को पटक लेने हैं या जो एक कहावत ओर है कि शेर को भी संगठि‍त ताकत के सामने अपने शिकार से हाथ धोते एवं पलायन करते हुए देखा जाता है। वस्‍तुत: ये दो बातें जोकि जंगल की सत्‍ता पर सटीक बैठती हैं वे आज जेएनयू जैसे अध्‍ययन केंद्र पर सही बैठ रही हैं। यहां आज एबीवीपी नहीं हारी हैसच पूछिए तो जीतकर भी वे वामसंगठन हार गए हैं जिन्‍हें छात्र सत्‍ता पर काबिज होने के लिए एक दूसरे के धुर विरोधी होने के बाद भी एक साथ आना पड़ाजिससे कि भगवा रंग के अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के झंडे को चुनाव में जीत के बाद गर्व से जेएनयू केंपस में फहराने से रोका जा सके।

इस बार जिन्‍होंने भी यहां छात्र संघ चुनावों से पहले हुए अभाविप एवं संयुक्‍त वाम मोर्चा गठबंधन (आईसाएसएफआई और डीएसएफ) के अध्‍यक्षों का भाषण गंभीरता पूर्वक सुना हैयदि तटस्‍थता के साथ विचार किया जाए तो जो किसी विचार के साथ नहीं सिर्फ भारत की प्रगति और राष्‍ट्रीय उत्‍थान से प्‍यार करते हैंवे अधिकतर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की ओर से अध्‍यक्ष की उम्‍मीदवार बनाई गई निधि त्रिपाठी के समर्थन में ही नजर आए हैं।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के इन चुनावों में अभाविप के वाम छात्र दलों के ऊपर भय का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वैसे इसी परिसर में ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन (आईसा)स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) और डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स फेडरेशन (डीएसएफ) के छात्र-छात्राओं को कई बार आपस में लड़ते देखा गया है। ये वाम संगठन पं. बंगाल से लेकर दक्षिण के राज्‍यों में किस तरह से आपस में एक दूसरे की जूतमपैजार करते हैंयह बात भी आज किसी से छिपी नहीं हैं। किंतु यहां दिल्‍ली में अखिल भारतीय विद्यार्थी परि‍षद को रोकने के नाम पर सभी एक मत हो गये । इसके बाद भी यदि अभाविप की ओर से छात्र प्रत्‍याशियों को प्राप्‍त मतों की गणना की जाए तो वे दूसरे स्‍थान पर है।

इन सब ने एबीवीपी को हराने के कैसे गठबंध करके चुनाव लड़ा जरा यह भी देखलीजिए, चुनाव परिणाम में ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन (आईसा) की गीता कुमारी को अध्यक्ष पद पर खड़ा किया गया । सिमोन जोया खान (आइसा) को उपाध्यक्ष के लिए इस चुनाव मैदान में उतारा गया। स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) के दुग्गीराला श्रीकृष्ण को महासचिव और शुभांशु सिंह डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स फेडरेशन (डीएसएफ) से संयुक्त सचिव पद पर इस छात्र संघ चुनाव में अपना प्रत्‍याशी बनाया गया। यानि की तीनों ही संगठन यह पहले ही जान गए थे कि अगर अलग-अलग चुनाव लड़े तो विद्यार्थी परिषद से पटखनी खाना तय है।

वस्‍तुत: कहना यही है कि आज उनके पास जो दो एवं एक-एक उम्‍मीदवारों की अलग-अलग संगठन के छात्र नेता की जीत मिली है वे इसमें से एक सीट भी लाने में सफल नहीं होते यदि अपने बूते स्‍वतंत्र अस्‍तित्‍व के साथ यहां चुनाव मैदान में उतरे होते। अध्‍यक्ष पद पर लड़े गए यहां के आए चुनाव परिणामों को इस संदर्भ में देखा जा सकता हैजिसमें कि संयुक्‍त वाम मोर्चे के बाद गीता कुमारी ने 1506 वोट हासिल किए जबकि अकेले के दम पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की उम्मीदवार निधि त्रिपाठी 1042 वोट प्राप्‍त करने में सफल रहीं। यानि की तीन संगठनों की यहां ताकत मिलाजुलाकर देढ़ हजार मत हैजबकि विद्यार्थी परिषद के अकेले एक अध्‍यक्ष की ताकत एक हजार से अधिक है। इसी प्रकार का आंकलन अन्‍य तीनों पदों पर हुए यहां के छात्र संघ चुनाव का रहा है।

वास्‍तव में इससे पता चल रहा है कि जेएनयू से अब शीघ्र ही वाम विचारधारा काजो कहते हैं कि चाहे जो मजबूरी हो मांग हमारी पूरी होजो अ‍भाविप की तरह ज्ञानशीलएकता में कतई विश्‍वास नहीं करते हैंजो सि‍र्फ विरोध के लिए विरोध और प्रश्‍न खड़े करने में ही भरोसा करते हैंउन सभी का किला शीघ्र ही ढहने वाला है। जो भारत को एक राष्‍ट्र नहीं कई राष्‍ट्रों का समूह मानते हैंजो भारत की विविधता में एकता नहीं देखते हैंउसे कई राष्‍ट्र कहते आए हैं और देश के भोले-भाले लोगों को कभी नक्‍सलवाद के नाम पर तो कभी मजदूर यूनियनों की हक की लड़ाई के नाम पर बरगलाते आए हैंअब उनका सच देश की जनता ठीक से जानने लगी है।

आनेवाले दिनों में आशा की जा सकती है कि जो प्रभाव ये वामदल इस वक्‍त संयुक्‍त गठबंधन के माध्‍यम से छोड़ने में सफल रहे हैं वे आगे बहुत दिनों तक इसे कायम नहीं रख पाएंगे। भविष्‍य में उनका यह प्रभाव संयुक्‍त होने के बाद भी अवश्‍य ही समाप्‍त होगा।  इसीलिए ये कहना गलत नहीं है कि जेएनयू के चुनावों में अभाविप आज हारी नहीं यहां के छात्रों के बीच दिल से और भाव स्‍तर पर जीत हासिल करने में पूरी तरह से सफल रही है।

विद्यार्थी प्ररिषद के सभी छात्र संघ प्रत्‍याशियों को बहुत-बहुत शुभकामनाएं हैंजिन्‍होंने हारकर भी आज यह बता दिया कि यहां के कई हजार छात्रों के दिल में उनके लिए सम्‍मान बरकरार हैयह सम्‍मान उनका तो है हीनिश्‍चि‍त तौर पर राष्‍ट्रवादी विचारधारा का भी हैजो यह कहती है कि तेरा वैभव अमर रहे माँहम दिन चार रहें ना रहें जो यह भी कहती है कि परम वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रम समर्था भावत्वा शिषाते भृशम।।राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानकर सम्पूर्ण जीवन माँ भारती की उपासना करें और हमारी यह विजयशालिनी संघठित कार्यशक्ति हमारे धर्म का सरंक्षण कर इस राष्ट्र को वैभव के उच्चतम शिखर पर पहुँचाने में समर्थ हो सके।