शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

उच्‍चशिक्षा का नैतिक पतन

: डॉ. मयंक चतुर्वेदी 
ह एक सत्‍य तथ्‍य है कि सम्पूर्ण विश्व में शिक्षा किसी भी जीव को मानव बनाने की प्रक्रिया है। इसे वर्तमान तथा भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार रहने के लिए व्यवहारिक ज्ञान, आधुनिकतम तकनीकी दक्षता, भाषा, साहित्य, इतिहास सहित हर आवश्यक विषय की जानकारी प्रदान करने वाला सशक्त माध्यम माना जाता है। इतना ही नहीं तो हमारे लिए शिक्षा कोरा अक्षर ज्ञान नहीं बल्कि विद्या का वह रूप है जो सर्वप्रथम सुसंस्कृत बनाती है। जीवन में शिक्षा का क्‍या महत्‍व है, अब तक इस पर न जाने कितना कहा गया और लिखा गया है। प्राचीन ग्रंथ वेद, उपनिषद से लेकर स्‍वामी विवेकानन्‍द, महर्षि दयानन्‍द से लेकर आधुनिक समय तक भारत ही नहीं समुचे विश्‍व में एक ऐसी चिंतन एवं अध्‍ययन की श्रेष्‍ठ परंपरा रही है जो पीढ़ी दर पीढ़ी आनेवाली भावी संतति को ज्ञान का मार्ग दिखा रही है। किंतु दूसरी ओर इनके बीच से होकर डिग्री लेकर आधुनिक शिक्षा में ज्ञान के प्रसार को लेकर जब कुछ लोग आर्थ‍िक लाभ के लिए गलत कार्य करते हें तो न केवल उन लोगों का सिर झुकता है जो इस शिक्षक परंपरा के अनुगामी है बल्‍कि उनका भी सिर नीचा होता है जो ऐसे लोगों को कभी आगे बढ़ने की प्रेरणा देते औरसमय-समय पर उनकी कुशाग्र बौद्ध‍िक कौशल से प्रेरि‍त होकर या उन्‍हें आगे बढ़ाने की मंशा से सहयोग के लिए आगे आते हैं। 

वस्‍तुत: यह बहुत ही दुखद है कि उच्‍चशिक्षा के क्षेत्र में वर्तमान ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (एआईएसएचई) की वर्ष 2016-17 की रिपोर्ट यह बता रही है कि देश के विश्वविद्यालयों और कालेजों में 80 हजार ऐसे प्रोफेसर नौकरी कर रहे हैं, जो एक या दो स्‍थानों पर नहीं, बल्कि एक साथ ही चार जगह नौकरियां कर रहे हैं और इन सभी स्‍थानों से यह प्राध्‍यापकगण नियमित वेतन भी ले रहे हैं। 
एआईएसएचई रिपोर्ट से हुए इस खुलासे पर अब क्‍या कहा जाए ? जो प्राध्‍यापक अपने विद्यार्थियों को सत्‍य की राह पर चलने की प्रेरणा देता है, यदि वही लालच के लिए असत्‍य का स्‍वजीवन में आग्रही हो, तो फिर उसे कौन ज्ञान देगा? यह अच्‍छा ही है कि कम से कम देश में सभी कार्यों को आधार कार्ड से लिंक करना अनिवार्य किया गया और इस तरह का अपने आप में अनौखा भ्रष्‍टाचार सामने आ सका है। शायद, देश भर के विश्वविद्यालयों और कालेजों में पढ़ा रहे शिक्षकों के सत्यापन का प्रयास आधार के माध्‍यम से नहीं होता तो यह बात कभी सामने नहीं आती । अब जिसे आधार की हर जगह अनिवार्यता के लिए प्रधानमंत्री मोदी को दोष देना है, वह तो देगा ही, किंतु इससे जो इस तरह की बातें सामने उजागर हो रही हैं, वह कम से कम यह बताने के लिए पर्याप्‍त हैं कि भारतीयों के बीच भ्रष्‍टाचार किस हद तक अपनी जड़े गहरी कर चुका है। 

अब भले ही इस खुलासे के बाद मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इसे गंभीरता से ले और ऐसे शिक्षकों की पहचान करके उनके खिलाफ जल्द कड़ी कार्रवाई करने के निर्देश दे। मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर कहें कि जनता का पैसा है, इसे इस तरीके से लूटने नहीं दिया जाएगा। ऐसे लोगों पर कार्रवाई होगी। किंतु साथ में यह प्रश्‍न भी है कि अभी मौजूदा समय में देशभर के विश्वविद्यालयों और कालेजों में करीब 15 लाख शिक्षक कार्यरत हैं। इनमें करीब 12.50 लाख शिक्षक ऐसे हैं, जो अब तक आधार से जुड़ चुके हैं। यानी करीब 85 फीसद प्राध्यापकों का सत्यापन हो चुका है। आगे अभी बाकी शिक्षकों को भी आधार से लिंक करने की तैयारी चल रही है, पर जब सभी शिक्षकों का इस तरह से आधार लिंक हो जाएगा तो संभावना यही है कि जो संख्‍या भ्रष्‍ट शिक्षकों की अभी 80 हजार निकलकर आई है, वह और अधिक हो जाए? कुलमिलाकर देश की उच्‍चशिक्षा खतरे में है, यह भी कहा जा सकता है। 

इस पर भी कुछ बातें अवश्‍य हैं, जिन पर अवश्‍य देश के शिक्षा नीतिज्ञों को विचार करना चाहिए। प्राचीन भारत की शिक्षा व्‍यवस्‍था का अध्‍ययन करने पर यह साफ पता चलता है कि जो गुरू अपने शिष्‍यों को ज्ञान देता था, उसकी वृत्‍त‍ि संग्रहरण की नहीं होती थी। किंतु वर्तमान परिवेश में शिक्षक की सोच में जो उपनिषयों की शिक्षा तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम्, अर्थात् त्याग भाव से भोग करे नर , लोभ नहीं मन में लावे का लोप हुआ है, तभी से सर्पूण समाज में गिरावट का दौर निरंतर है । धन किसका? आज यह वह प्रश्‍न है जिस पर शायद हम सभी को खासकर शिक्षकों को अवश्‍य ही गंभीरता से विचार करने की आवश्‍यकता है। 

शिक्षा में जब तक देशप्रेम, संस्कृति और नैतिक मूल्यों का स्थान सुनिश्चित नहीं किया जाता है और जापान एवं जर्मनी की तरह से प्रत्‍येक भारतीय बच्चे में ‘सबसे पहले देश’ के संस्कार प्रबल हों, इसकी व्‍यवस्‍था नहीं खड़ी की जाएगी, हो सकता है कि आगे भी इस तरह के भ्रष्‍टाचार के लिए अन्‍य कोई रास्‍ता खोज लिया जाएगा। इसके साथ यह भी सुझाव है कि स्नातक स्तर तक साहित्य का पठन-पाठन अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए। एकता को बढ़ावा देने के लिए साहित्य का भारतीय भाषाओं में अनुवाद कर उन्हें प्रकाशित करने का उपक्रम समुचे देश में चले। वस्‍तुत: जब तक देश में संवेदना के स्‍तर पर विद्यार्थ‍ियों को जगाने का प्रयत्‍न नहीं होगा, भौतिकता की दग्‍ध अग्‍नि हर किसी को अपने तापमात्र से जलाने में सक्षम रहेगी, कल का विद्यार्थी आज का शिक्षक और अन्‍य कोई समाज का विशेष वर्ग, नागरिक बनेगा, वह अपने जीवन में वही करेगा, जिसका कि उसे बचपन से अभ्‍यास है, अब यह हमें सोचना होगा कि हम अपना कैसा समाज बनाना चाहते हैं, भ्रष्‍टाचार युक्‍त या भ्रष्‍टाचार मुक्‍त, सदाचरण युक्‍त ? 


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