रविवार, 11 दिसंबर 2016

नोट बंदी पर रामभुलावन ने कहा, हम कितने ढीठ किस्‍म के हो गए हैं साहब !


ज सुबह जब तीसरी बार घंटी बजी तो मेरी नजर सामने लगी दीवार घड़ी पर गई। मन में आया कि अब कौन आया होगा ? अखबार आ ही गए, घर सफाई के लिए बहन जी आई ही गईं, घर का कोई सदस्‍य बाहर सुबह-सुबह सैर सपाटे पर भी नहीं गया, फिर ये घंटी किसने बजाई होगी।

मैं अभी ये सोच ही रहा था कि एक बार फिर घंटी बज उठी, इस बार तो किचिन से श्रीमती जी की भी घंटी बजने के साथ तेज आवाज आई.... सुबह से कंप्‍यूटर पर बैठ जाते हो.... आग लगे ऐसी पत्रकारिता में न सुबह चैन न दिन आराम और न रात शांति। अच्‍छे आदमी से शादी हुई है, दरवाजा खोलने की जहमत भी नहीं उठा सकते हैं साहब !
इतना सुनकर मैं उठता उसके पहले धर्मपत्‍नी जी जाकर घर का मुख्‍य द्वार खोल चुकी थीं।.....

सामने रामभुलावन खड़ा था, जैसे ही उसने मेमसाहब के चेहरे को देखा, वो कुछ कहता, इसके पहले ही हमारी श्रीमती बोल उठी....आपके साहब तो अंदर कम्‍प्‍यूटर पर चिपके हैं।.......
उनका यह संवाद दरवाजे के रास्‍ते होकर मेरे कानों तक पहुंच चुका था, मैं तुरन्‍त उठकर बाहर आया और रामभुलावन को पास वाले सोफे पर बैठने का इशारा किया....

कहो, आज इतनी सुबह कैसे आना हो गया कहां से आ रहे हो ? सुबह की आवोहवा लेकर तो बिल्‍कुल नहीं आ रहे लगते हो, ये भारी भरकम झोला लिए हुए हो ? क्‍या है इसमें जो सुबह-सुबह टांगे फिर रहे हो ?

अब बोलने की बारी रामभुलावन की थी, उसने कहा, साहब निकला तो मैं सुबह दूध लेने था लेकिन जब घर से थोड़ी दूर ही चला तो मुझे इस थेले में से बाहर झांकती हुई भारतीय मुद्रा दिखी... मैं पास में गया.. अपने चारो ओर देखा तो कोई दिखाई नहीं दिया... फिर मैंने सोचा यदि नोट लक्ष्‍मी इसी तरह सड़क पर पड़ी रही और गलत हाथों में चली गई तो देश का बहुत नुकसान कर सकती है। जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोट बंदी का एलान किया है तभी से भ्रष्‍टाचारियों की हवाइयां उड़ी हुई हैं और इस समय ऐसे लोग काले नोट को सफेद करने में लगे हुए हैं। कहीं ऐसा न हो कि ये नोट टुकड़ों-टुकड़ों में गलत खातों में जमा करा दिए जाएं और उस धन का दुरउपयोग हो, इसलिए मैं यह बड़ा सा थेला उठाए भागता हुआ आपके पास आया हूँ, आप पत्रकार हैं, सरस्‍वती पुत्र हैं,आप इस बारे में सही मार्ग मुझे बताएंगे।

मैंने कहा, रामभुलावन इसमें घबराने की कोई बात नहीं, तुम सीधे जाकर पुलिस के पास ये राशि जमा करा दो।

रामभुलावन बोला, पुलिस वालों ने यदि मेरे पर ही उल्‍टा नाम लगा दिया कि ये नोट तुम्‍हारे ही हैं और तुम इन्‍हें ठिकाने लगाने में नाकामयाब रहे हो, इसलिए हमारे पास आए हो तो मैं साहब क्‍या जवाब दे पाता ?

कहते कि आप मेरे घर चलकर मेरी माली हालत का जायजा ले लो.......
नहीं साहब इतना आसान नहीं है, अब आप बताओ मैं क्‍या करूं ? मैंने सीधे शब्‍दों में कहा, चलो मैं तुम्‍हारे साथ चलकर ये रुपए पुलिस के पास जमा कराता हूँ, धन ज्‍यादा लग रहा है, करोड़ों में हैं, हम पुलिस में जमा करते वक्‍त उनसे आग्रह करेंगे कि ये धन राशि प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा करवा दें, जिससे कि जरूरत मंद को इससे कुछ मदद हो जाएगी।
रामभुलावन को मेरा यह सुझाव पसंद आया, उसके बाद मेरी हां में हां मिलाकर इत्‍मिनान से बैठ गया ।  अब तक अंदर से उसके लिए पानी के साथ चाय और बिस्‍कुट आ चुके थे । मैंने कहा, चाय पीते हुए बात करते हैं, रामभुलावन ने कहा, साहब आपसे कुछ पूछना है।
हां पूछो , साहब मुझे ये समझ नहीं आ रहा कि मैं कहां से अपनी बात शुरू करूं,
अरे कहीं से भी करो, अभी हम बात ही तो कर रहे हैं.........
हम कितने ढीठ किस्‍म के हो गए हैं साहब ! उसके मुंह से इतना सुनते ही मैंने कहा,  अरे ऐसा क्‍या हो गया जो तुम इस प्रकार बहुवचन का प्रयोग कर रहे हो, अपने साथ मुझे और मेरे साथ मेरे परिवार तथा इस हम में समुचे भारतीय लोगों को लेकर इतनी गंभीर व्‍यंग्‍य से भरी टिप्‍पणी कर रहे हो ?

रामभुलावन बोला, साहब बात ही कुछ ऐसी है। मैं पिछले कई दिनों से जिस दिन से हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह ऐलान किया है कि देश में अब पुनाने 500 और 1000 के नोट नहीं चलेंगे, लगातार एक बात पर ध्‍यान दे रहा हूं। लोग घण्‍टों बैंक के बाहर नोट बदलवाने के लिए लाइन में लग रहे हैं लेकिन कोई भी उनके कहे अनुसार 50 दिनों का सब्र नहीं रखना चाहता।
अब मुझे ही देख लो मैं अब तक नोट बंदी की घोषणा के बाद सिर्फ एक बार एटीएम मशीन पर गया और 2000 रुपए निकालकर लाया, मेरा काम बढ़ि‍या से चल रहा है। आप साहब, पत्रकार हो, आपके खर्चे ज्‍यादा होंगे तो आप कितनी बार गए एटीएम... 

मैंने कहा ... यार, रामभुलावन तुम्‍हारी तरह ही मेरा हाल है, अब तक एक बार ही एटीएम तक जाना हुआ... कुछ बिटिया के कुछ बेटे की गुल्‍लक से इतने रुपए तो निकल ही आए कि दोबारा एटीएम मशीन तक जाने की जरूरत ही महसूस नहीं हो रही है । भाई मोदी के कारण एक बात बहुत अच्‍छी हुई है, हम पुन: मितव्‍ययी हो चले हैं।

रामभुलावन बोला, साहब क्‍या बात कर रहे हो आप..................?
ऐसा बिल्‍कुल नहीं है, आप मितव्‍ययी हुए होंगे...और दूसरों को तो देखो...आदमी जी खोलकर बाजार में पैसा लुटा रहा है। सालभर में बिकने वाला सोना और कहीं कहीं इससे भी ज्‍यादा सोना एक ही रात में बिक गया साहब...आप क्‍या मितव्‍ययी होने की बात कर रहे हैं ?
साहब, मुझे तो अपने चारो ओर यही दिखाई दे रहा है कि प्रधानमंत्री जी ने यह नोट बंदी और बदली का क्‍या एलान किया लोगों की नोटों के प्रति भूख और बढ़ गई है। वो तो उनका बस नहीं चलता वरना वे नोट खाने और चवाने भी लगते।

नहीं ...नहीं...रामभुलावन ये गलत बात है.. आप किसी के बारे में बिना जाने ऐसा नहीं बोल सकते हो........
मेरी यह बातें सुनते ही वह फिर बोला, साहब आप ही बताओ...किस देश में ऐसा होता होगा कि लोग अपने काले धन को सफेद करने के लिए पहले कई हजार और लाखों के नहीं पूरे देश में करोड़ों रुपए के टिकिट बुक कराएं और उसके बाद उन्‍हें निरस्‍त करके अपने बंद हुए नोटों को हरा करा लें। कहने का मतलब भारतीय रेलवे से नगद में वापिस वह राशि प्राप्‍त कर ले जो बाजार के प्रचलन में हैं। इसके बाद सरकार को निर्णय लेना पड़े कि कोई एक साथ 10 हजार से कम और फिर लिए निर्णय में यह कि 5 हजार से कम राशि के ही टिकिट बुक किए जाएंगे। बताएं भाईसाहब, ऐसा किस देश में होता होगा ?

रामभुलावन बोल रहा था कल तक जिनके पास रुपए नहीं होते थे और जो हमेशा पैसे की कमी का रोना रोते थे, इसके लिए कई बार वे भगवान तक को नहीं छोड़ते थे ऐसे कई लोगों को मैं जानता हूं जिनके चेहरों की रंगत तो इस निर्णय के बाद से उड़ी है, लेकिन अचानक उनके बैंक खातों में नोटों की बरसात होने लगी है, यदि यह पैसा उनके पास था तो वे फिर गरीब कैसे हुए...... ? आपको नहीं लगता कि सरकार को इस खुलासे के बाद क्‍यों न गरीब की परिभाषा फिर से निर्धारित करनी चाहिए ?

साहब, मैं जो कह रहा हूँ न कि हम कितने ढीठ किस्‍म के हो गए हैं, वह ऐसे ही नहीं कह रहा, उसके पीछे ओर भी कई कारण है। रामभुलावन आगे बोला..मसलन लोगों ने लाइन में लगने को ही धंधा बना डाला, सरकार ने बैंक से नोट बदलने की सुविधा एटीएम का उपयोग करने वालों की तुलना में जो लोग इस का उपयोग नहीं करते हैं, उनको ध्‍यान में रखकर की थी लेकिन हुआ क्‍या ..... लोग चंद रुपयों के लालच में लाइन में लगकर काले को सफेद करने के फेर में पड़ गए। जिसके बाद मजबूरी में सरकार को 4 हजार 500 की नगद राशि परिवर्तन किए जाने के निर्णय को वापिस लेकर उसे 2 हजार रुपए करना पड़ा।
साहब, अब आपसे क्‍या कहूं, देश के लोग जब नहीं मान रहे थे तब सरकार को मजबूरन स्‍याही बाजार में लाना पड़ी। जिससे कि बार-बार बैंक में नगदी बदलवाने आ रहे लोगों को किसी तरह रोका जा सके। अब आप ही बताएं हम ढीठ नहीं तो क्‍या हैं 
साहब, जो बुजुर्ग हैं, उन्‍हें हम लाइन में लगने,  राशि बदलवाने बैंक भेज रहे हैं और दूसरी ओर देश का अधिकांश युवा कहीं घरों में क्रिकेट देख रहा है तो कहीं अन्‍य कुछ ओर कर रहा है लेकिन वह इस एक अच्‍छे फैसले के समर्थन में अपने घर के बुजुर्ग को लाइन में न लगने भेजकर खुद लाइन से दूर भाग रहा है,आप ही बताएं साहब इसे हम क्‍या कहें ?
रामभुलावन ने कहा, साहब जी, भारतीय मुद्रा राष्‍ट्र की संपत्‍त‍ि है, इसका सम्‍मान हर हाल में होना चाहिए, ठीक है किसी के पास बेमानी का धन होगा, तो इसका मतलब ये तो नहीं कि वह उसे जलाए, गंगा में बहा दे, अन्‍य नदी नालों में, कचरे के डेर पर फैंक दे। वह सरकार को जुर्माना दे और सम्‍मान के साथ बैंक में अपनी राशि जमा करे। उसकी जगह वह जो कर रहा है, इसलिए मैंने कहा कि हम कितने ढीठ किस्‍म के हो गए हैं।

वह बोला कि सरकार ऐलान करती है कि निजि अस्‍पतालों, दवा दुकानों पर अभी पुराने नोट स्‍वीकार्य किए जाएंगे, लेकिन वास्‍तव में साहब इसके उलट हो रहा है। ज्‍यादातर चिकित्‍सालयों एवं मेडीकल स्‍टोर पुराने रुपए नहीं ले रहे, उन्‍हें बाजार में आ रहे नए नोट ही चाहिए। यानि सरकार ने जो कहा, उसे सुनना ही नहीं, मानना ही नहीं........
बाजार में पहले जो छोटी राशि के नोट बहुतायत में चलते थे और सरकार के नोट बंदी के बाद से जो राशि बैंकों से निकाली गई है यदि वह भी सही ढंग से बाजार में दिखाई दे तो साहब, मुझे नहीं लगता कि लोग किसी बैंक या एटीएम मशीन के सामने लम्‍बी लाइनों में लगने को मजबूर होते लेकिन यह क्‍या, छोटे नोट बाजार में बहुत आ रहे हैं पर पता ही नहीं चल रहा कि कहां गायब हो जा रहे हैं....अब ऐसे लोगों को साहब आप ही बताएं ढीठ नहीं तो क्‍या कहा जाए ?

इतना सब सुनने के बाद अब चाय की चुस्‍कियों के बीच लगातार चुप रहने की बारी मेरी थी...........मैं फिर एक बार सोच रहा था कि बताओ, यह रामभुलावन आया तो नेपाल से है, किसी फार्म को भरते वक्‍त अपनी पहचान भी नेपाली लिखता है, लेकिन यह हम भारतीयों से ज्‍यादा किसनी समझदारी की बात कर रहा है। अधिक पढ़ा लिखा नहीं होने के बाद भी वह जानता है कि सिस्‍टम को सहयोग देने में सबका भला है और एक हम हैं कि कमियां देखने, दिखाने व निकालने से मुक्‍त ही नहीं हो पा रहे हैं..... ? 

व्‍यंग्‍य लेखक : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

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