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शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2021

विश्‍व में निवेशकों की पसंद का देश बना भारत

 

-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
 आर्थिक मोर्चे पर केंद्र की मोदी सरकार को विपक्ष द्वारा लगातार कटघरे में खड़ा करने का प्रयास होता रहा है। इसके उलट वास्तविकता यह है कि पिछले सात साल के दौरान जिस तेजी के साथ भारत ने अर्थ से जुड़े प्रत्येक क्षेत्र में विकास किया है, वह इससे पहले कभी किसी भी सरकार में देखने को नहीं मिला है। सरकार के सामने एक तरफ जनसंख्या बढ़ने के साथ बेरोजगार युवाओं की संख्या को रोजगार देने का दबाव था तो दूसरी ओर उन तमाम योजनाओं पर भरोसा था, जो भारत के वर्तमान और भविष्य को दुनिया की नजर में शक्ति सम्पन्न बनाने जा रही थीं। वस्तुत: यह उन आर्थिक क्षेत्र के लिए गए सही निर्णयों का ही परिणाम है कि वित्त वर्ष 2020-21 में कोविड महामारी के बावजूद भारत में 81.72 अरब डालर का विदेशी निवेश (एफडीआइ) आया।

 अंतरराष्ट्रीय सलाहकार कंपनी डेलाय की रिपोर्ट कहती है कि वैश्विक कंपनियां भारत में निवेश के लिए पहले से ज्यादा तैयार हैं। इसे मोदी के नेतृत्व का चमत्कार ही कहिए, जो अमेरिका एवं ब्रिटिश कंपनियां सिंगापुर एवं जापान की तुलना में भारत को अपने लिए सबसे मुफीद और आकर्षक बाजार के तौर पर देख रही हैं।

 देखा जाए तो केंद्र सरकार आर्थिक क्षेत्र में अनेक बिन्दुओं पर गहराई से एक साथ कार्य करती हुई नजर आ रही है, उसे जहां गरीब की पूरी चिंता है तो वहीं उन सभी के लिए भी उसके पास कुछ ना कुछ है जो नवाचारों के माध्यम से देश की अर्थव्यवस्था को तेज गति देने का सामर्थ्य रखते हैं। आज जेएएम (जनधन-आधार-मोबाइल) ट्रिनिटी भारत के लिए एक गेम चेंजर साबित हुई है, जो उन्हें भविष्य में वित्तीय समावेशन प्रारूप को आगे बढ़ाने में सक्षम बनाती है। यही कारण है कि वित्तीय रूप से बहिष्कृत लोगों को आगे लाकर, बचत करके और वास्तविक लाभार्थियों को सरकारी लाभ वितरित करके, नागरिकों को उनके बैंक लेनदेन पर एसएमएस अपडेट प्रदान करके जेएमएम ट्रिनिटी ने हमारी बैंकिंग प्रणाली को पूरी तरह से पारदर्शी बना दिया है।

 सरकार का कोविड-19 महामारी के बीच में जनधन द्वारा लाया गया वित्तीय समावेश महत्वपूर्ण रहा, इसके कारण ही कई लोगों और छोटे व्यवसायों को जमानत-मुक्त ऋण मिल सका और जिसने कि उनके पूरे जीवन को ही बदलकर रख दिया।

 इसी तरह से आधार लिंकेज ने देश को बहुत अधिक चोरी से बचाया है। इस माध्यम से सरकार वास्तविक लाभार्थियों तक पैसा पहुंचाने में सक्षम हुई है। बैंक खातों की आधार सीडिंग ने हमें तत्काल केवाईसी लाभ दिया। इस समय भारत में पीएमजेडीवाई के तहत 43.23 करोड़ लाभार्थियों के खाते हैं। ये खाताधारी स्वयं तो सक्षम बन ही रहे हैं, अन्यों को भी सक्षम करने के लिए प्रयासरत हैं। यह मोदी सरकार की सही नीतियों का ही परिणाम है जो आज दुनिया की कंपनियां 60 फीसद निवेश नवीकरणीय ऊर्जा, हेल्थ सेक्टर, वित्तीय सेवा और फाइनेंशियल टेक्नोलाजी जैसे क्षेत्रों करने आगे आ रही हैं । देश में डिफेंस, टेक्सटाइल, खाद्य प्रसंस्करण का क्षेत्र भी विदेशी कंपनियों को आकर्षित कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) का आकलन भी यही है, वह कह रहा है कि इस पूरे वित्त वर्ष में सबसे तेजी से उभरने वाली इकॉनमी भारत की रहेगी।

 यह एक तथ्य है कि देश के जीडीपी में कुल 10 गुना बढ़ोतरी हुई है और महंगाई दर छह फीसदी के आसपास स्थिर हो गई है। देश के विदेशी मुद्रा भंडार में 76 गुना की बढ़ोतरी हुई है। वस्तुत: हाल ही में आई लगभग सभी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट इस बात पर एकमत हैं कि भारत पांच लाख करोड़ डालर की इकोनामी बनने में सक्षम है और इसमें एफडीआइ की अहम भूमिका होगी। भारत की इकॉनमी को लेकर अमेरिका के उद्योगपतियों में चीन, ब्राजील, वियतनाम, मेक्सिको जैसे दूसरी समकक्ष इकॉनमी के मुकाबले ज्यादा प्रतिष्ठा है। अमेरिका एवं ब्रिटेन के कारोबारी भारत के संस्थानों की मजबूती व बेहद प्रशिक्षित श्रम शक्ति को ज्यादा पसंद कर रहे हैं। अधिकांश कारोबारियों का कहना यही है कि वे भारत में नया निवेश करेंगे और यहां पूर्व से चल रही अपनी कंपनियों में निवेश बढ़ाएंगे।

 आंकड़े बता रहे हैं कि वर्ष 2020-21 (54.18 अरब डॉलर) के पहले 10 महीने में एफडीआई इक्विटी प्रवाह 28 प्रतिशत बढ़ गया है। वित्त वर्ष 2020-21 के पहले 10 महीने में एफडीआई इक्विटी के जरिए निवेश करने वाले देशों में 30.28 फीसदी की हिस्सेदारी के साथ सिंगापुर सबसे अव्वल रहा। इसके बाद संयुक्त राज्य अमेरिका (24.28) और यूएई (7.31%) का स्थान है। इसके साथ ही जनवरी 2021 के दौरान कुल एफडीआई इक्विटी प्रवाह में 29.09 फीसदी की हिस्सेदारी के साथ जापान सबसे आगे रहा। इसके बाद सिंगापुर (25.46%) और उसके बाद यू.एस.ए. (12.06%) का स्थान है । आज दुनिया की कई कंपनियां भारत को वैश्विक मैन्यूफैक्चरिंग हब के तौर पर देख रही हैं। जापान की कंपनियां भारतीय बाजार को ध्यान में रखते हुए निवेश कर रही हैं। इनकी भावी योजना भारत को एक निर्यात हब के तौर पर इस्तेमाल करने की है। यही वह कारण भी है जोकि सरकार के कदमों से देश में एफडीआई का प्रवाह निरंतर बढ़ा है।

अप्रैल 2020 से जनवरी 2021 के बीच भारत में 72.12 अरब डॉलर का एफडीआई आया। यह वित्त वर्ष 2019-20 की तुलना (62.72 अरब डॉलर) में 15 फीसदी ज्यादा एफडीआई था। यह किसी भी वित्तीय वर्ष के पहले 10 महीने में आया सबसे अधिक एफडीआई रहा है। कोविड महामारी के बाद भारतीय इकॉनमी के प्रदर्शन एवं इसकी मजबूती को देख कर वैश्विक समुदाय प्रभावित है। अमेरिकी कंपनियों के सीइओ में भारत के भविष्य को लेकर बहुत भरोसा दिखा रहे हैं । इसी तरह का भरोसा दुनिया के कई देशों का इन दिनों भारत को लेकर बना है, जिसके बाद कहना होगा कि जो भारत को पांच लाख करोड़ डालर की इकॉनमी बनने में आठ लाख करोड़ डालर के सकल पूंजी निर्माण की जरूरत है और अगले छह से आठ वर्षों में 400 अरब डालर के एफडीआइ की आवश्यकता है, वह इस भरोसे के आधार पर भारत प्राप्त करने में सफल हो जाएगा। कुल मिलाकर प्रधानमंत्री मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल में आर्थिक नीतियों के माध्यम से स्पष्ट कर दिया है कि उनकी सरकार निवेश का महौल बनाने के लिए काफी कुछ कर रही है। पीएलआइ देना, बीमा समेत कई सेक्टर में एफडीआइ सीमा बढ़ाना, रेट्रो टैक्स व्यवस्था को खत्म करने जैसे फैसले इसी दिशा में हैं।

इस वर्ष 15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषण में इन्फ्रास्ट्रक्चर में 1.4 लाख करोड़ डालर के निवेश की बात कही थी, जोकि दुनिया भर में बहुत सकारात्मक तरीके से ली गई है। इन्वेस्टर या निवेशक चाहते भी यही हैं कि भारत का जितना बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर होगा उतना ही अधिक उनके लाभ में भी बढ़ोत्तरी होगी, साथ ही भारतीयों के जीवनस्तर में भी और अधिक सुधार आएगा। कहना होगा कि मोदी सरकार की तरफ से उठाए जा रहे आर्थिक क्षेत्र के कदम लम्बे समय तक भारतीय इकॉनमी की विकास दर को तेज बनाए रखने में मददगार साबित होंगे। भविष्य का भारत निश्चित ही एक मजबूत भारत बनकर हम सभी के सामने आनेवाला है, जिसके लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आर्थिक नीतियों को श्रेय दिया जाए तो कुछ गलत नहीं होगा।

शुक्रवार, 1 जून 2018

किसानों की मतलब परस्‍ती पर क्‍यों नहीं उन्‍हें धिक्‍कारना चाहिए ? डॉ. मयंक चतुर्वेदी

कभी देश में अन्‍न कम पैदा हुआ करता था तब देश के तत्‍कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्‍त्रीजी ने जय जवान के साथ जय किसान का नारा देते हुए हर भारतीय को एक दिन का उपवास सप्‍ताह में करने का आग्रह किया था। देश ने उसे माना और हर भारतीय गर्व से सीमा पर देश की सुरक्षा के लिए अपना जीवन उत्‍सर्ग कर देनेवाले सैनिक के समान ही उत्‍साह और सम्‍मान के साथ प्रत्‍येक किसान को देश का गौरव मानकर उसके कर्म को लेकर नमन करने लगे थे, उसके बाद अपने समय में प्रधानमंत्री रहे अटलबिहारी वाजपेयी ने इस जयजवान-जयकिसान के नारे में जय विज्ञान को भी जोड़कर किसानों के जीवन में विज्ञान के महत्‍व का प्रतिपादन किया था लेकिन आज जो किसान देशभर में कर रहे हैं, उसे देखकर लगता है कि किसानों की इस मतलब परस्‍ती पर क्‍यों नहीं उन्‍हें धिक्‍कारा जाय ? 

ऐसा इसलिए कहा जा रहा है कि जिस देश में सभी बच्‍चों को पीने के लिए आवश्‍यक पौष्‍ट‍िक आहार उपलब्‍ध नहीं, दूध सभी बच्‍चों के लिए सुलभ नहीं है, देश में अब भी 60 सालों तक राज करनेवाली कांग्रेस कुपोषण को दूर नहीं कर सकी और पिछले 4 साल की मोदी सरकार से वह अपेक्षा कर रही है कि 60 सालों का जहर वह 4 साल में उतार दे और सब कुछ हरा-हरा हो जाए?  आज दुर्भाग्‍यपूर्ण है कि उस कांग्रेस की पहल तथा उसकी विकृत नीयत में आकर के देश के आम किसानों को बरगलाकर वह सब किया जा रहा है जोकि यह देश कभी देखना नहीं चाहता है । 

सयुंक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन की 2017 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में कुपोषित लोगों की संख्या 19.07 करोड़ है। यह आंकड़ा दुनिया में सर्वाधिक है। देश में 15 से 49 वर्ष की 51.4 फीसदी महिलाओं में खून की कमी है। पांच वर्ष से कम उम्र के 38.4 फीसदी बच्चे अपनी आयु के मुताबिक कम लंबाई है। इक्कीस फीसदी का वजन अत्यधिक कम है। भोजन की कमी से हुई बीमारियों से देश में सालाना तीन हजार बच्चे दम तोड़ देते हैं। वैश्विक भूख सूचकांक में 118 देशों में भारत को 97वां स्थान मिला था। देश में बहुत से लोग भुखमरी के कगार पर रहते है। इसके बाद भी किसान आन्‍दोलन को लेकर देशभर से खबर यही आ रही हैं कि किसान कई हजार लीटर दूध सड़कों पर व्‍यर्थ बहा रहे हैं। दूध बहाने के इस कृत्‍य पर वे सभी तथाकथित महान आत्‍माएं चुप हैं जो शिवजी पर दूध चढ़ाने को पाखण्‍ड मानकर उसकी खिल्‍ली उड़ाती हैं किंतु यहां जो हो रहा है उसके लिए वह यह कहती नजर आती हैं कि यह तो किसानों की मांगें नहीं मानने पर उनका आक्रोश है। 

यह कैसा आक्रोश है? अपने देश वासियों को भूखा रख, उनके बच्‍चों के पेट का दूध सड़कों पर उढेलकर वह मोदी सरकार से मांग कर रहे हैं कि उनकी मांगे पूरी की जाएं? स्‍वामीनाथन की रिपोर्ट क्‍या हलुआ है जो चम्‍मच में भरा और गप कर गए? देश के हर बजट में किसान आज तक सबसे आगे रहता आया है, पहले कि सरकारें किसानों के हक को उन तक नहीं पहुंचाने में सफल रही होगी, ठीक है मान लिया । लेकिन अब की सरकार पर यह कैसे आरोप हैं? अगर इतना ही था तो किसानों की पिछली 60 सालों की कांग्रेस सरकारों के वक्‍त यह चुप्‍पी क्‍यों रही? आज राष्ट्रीय किसान महासंघ ने 130 संगठनों के साथ विरोध प्रदर्शन और हड़ताल का जो हंगामा देशभर के कई राज्‍यों में फैला रखा है, वह कहां तक जायज है? इस आन्‍दोलन की आड़ में आगरा में अपने वाहनों की फ्री आवाजाही कराने के लिए किसानों ने जिस तरह से टोल पर कब्जा किया और जमकर की तोड़फोड़ की, क्‍या उसे देखकर किसी को किसानों का सम्‍मान करना चाहिए?  

बर्नाला और संगरूर समेत पंजाब में कई जगह किसानों ने विरोध प्रदर्शन करते हुए सब्जियों और डेयरी प्रोडक्ट्स को बाहर सप्लाई करने से इनकार किया हुआ है? क्‍या यह उनका सीमा पर देशहित में एक जवान का अपने वतन के लिए सर्वस्‍व बलिदान कर देने की ललक की तरह लिया गया देशहित में किया फैसला है? पंजाब के फरीदकोट में किसानों का विरोध प्रदर्शन हो रहा है, यहां किसान सड़कों पर सब्जियां फेंक कर विरोध जता रहे हैं। इसी तरह से मंदसौर में भी देखा जा रहा है। भारतीय किसान यूनियन की किसानों से की गई अपील जिसमें कहा गया है कि हड़ताल के दौरान फल, फूल, सब्जी और अनाज को अपने घरों से बाहर न ले जाएं, और न ही वे शहरों से खरीदी करें और न गांवों में बिक्री करें, इसे आज कौन सही ठहरा सकता है?  

हम यह नहीं कहते कि लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार को किसानों की मांगों पर गौर नहीं करना चाहिए। उसे  स्वामीनाथन कमीशन द्वारा की गई अनुशंसाओं को लागू करने और कर्ज माफ करने समेत सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का भुगतान के वादे को पूरा करने की मांग को नहीं स्‍वीकारना चाहिए। लेकिन क्‍या इसी लोकतंत्र में उन्‍हें यह हक दिया जा सकता है कि वह सार्वजनिक सम्‍पत्‍त‍ि का आन्‍दोलन के नाम पर नुकसान करें? किसी की वैयक्‍तिक सम्‍पत्‍त‍ि में आग लगा दें? वास्‍तव में इस आन्‍दोलन के आगे बढ़ने के साथ जो सबसे बड़ा डर बना हुआ है वह यही है कि किसानों को राजनीतिक रोटियां सेंकनेवाले इतना न भड़का दें कि वे पिछले साल की तरह इस वर्ष फिर चलती बसों, सवारी वाहनों, पुलिस गाडि़यों और सार्वजनिक सम्‍पत्‍त‍ि को इस आन्‍दोलन के नाम की भीड़ के सहारे आग के हवाले करने में कामयाब हो जाएं? 

फिर से मंदसौर गोलीकांड की तरह 6 लोग बेकार में मारे जाएं और सरकार को फिर जो हिंसा का शिकार हो उसके परिवार को सांत्‍वना देने के लिए नौकरी के साथ एक-एक करोड़ रुपए देने का एलान न कर देना पड़े? कुल मिलाकर  किसान अन्‍नदाता है, मां-पिता और गुरु के बाद नहीं बल्‍कि पहले वह पेट की भूख को शांत करनेवाला एक मसीहा है, उसके बाद भी यह आन्‍दोलन के नाम पर उसका विकृत स्‍वरूप कहीं न कहीं हमारे विश्‍वास को तोड़ रहा है, जो किसी भी सूरत मे देश की सेहत के लिए उचित नहीं माना जा सकता है।, अब विचार आगे आपको करना है?  

मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

भारत, जनसंख्‍या और दुष्‍परिणाम : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारत में जनसंख्या अभी 121 करोड़ पहुंच चुकी है और इसका निरंतर यहां तेजी से बढ़ने का क्रम जारी है। आगे यदि यह इसी तरह बढ़ती रही तो शीघ्र ही देश की जनसंख्‍या 150 करोड़ और फिर 200 करोड़ पर पहुंच जाएगी। खतरा आगे इसी बढ़ती जनसंख्‍या के आंकड़े से है। वस्‍तुत: जब किसी भी देश की जनसंख्‍या उसके आवश्‍यक संसाधनों की पूर्ति के समर्थन में हो तो वह उस देश के लिए लाभकारी होती है, किेंतु जब वही जनसंख्‍या मांग और पूर्ति से आगे होकर अपना विकराल रूप धारण करले तो वह उस देश के लिए मुख्‍य मानवसंसाधन का केंद्र न रहकर वहां के लिए अभिशाप बन जाती है।

वैसे देखाजाए तो भारत की वर्तमान ताकत उसका युवा मानव संसाधन का होना है। किंतु इसी के साथ जो सबसे बड़ा सवाल है, क्‍या हमारे पास अपनी बढ़ती युवा जनसंख्‍या के लिए पर्याप्‍त रोजगार और उनको एक विकासपरक जीवन दे सकने के लिए आवश्‍यक पर्यावरणीय संसाधन हैं? निश्‍च‍ित तौर पर इसका जवाब नहीं है। भारत के कई लाख युवा आज दुनिया के अनेक देशों में कार्य कर रहे हैं और वे वहां अपने जीवन की मूलभूत आवश्‍यकताओं को पूरा करने के साथ भारत में भी निरंतर विदेशी पूंजी का प्रवाह बनाए हुए हैं। जिससे कारण कहना होगा कि देश की अर्थव्‍यवस्‍था को उनसे पर्याप्‍त ताकत मिल रही है। 

वहीं दूसरी तरफ जो तस्‍वीर भारत में युवाओं की है उसके कारण जो स्‍थ‍ितियां निर्मित हो रही हैं, उसको यदि देखें तो यहां युवाओं की संख्या 24 करोड़ 30 लाख से ज़्यादा है, अपनी इतनी बड़ी जनसंख्‍या के लिए आज न तो केंद्र सरकार के पास पर्याप्‍त रोजगार है और न ही किसी राज्‍य सरकार के पास इन युवाओं की क्षमताओं का भरपूर उपयोग कर लेने की कोई ठोस योजना है। केंद्र सरकार का एक आंकड़ा बताता है कि देश की आबादी के लगभग 11 फीसदी अर्थात् 12 करोड़ लोगों को नौकरियों की तलाश है। इन बेरोजगारों में 25 फीसदी 20 से 24 आयुवर्ग के हैं, जबकि 25 से 29 वर्ष की उम्र वाले युवकों की तादाद 17 फीसदी है।  20 साल से ज्यादा उम्र के 14.30 करोड़ युवाओं को नौकरी की तलाश है। इसमें भी 12वीं तक पढ़े युवाओं की तादाद लगभग 2.70 करोड़ है, जिन्‍हें रोजगार की तलाश है। तकनीकी शिक्षा हासिल करने वाले 16 फीसदी युवा भी बेरोजागारों की कतार में हैं, यानी की तकनीकि दक्षता प्राप्‍त कर लेना भी रोजगार मिलने की गारंटी नहीं है। 

इन आंकड़ों से साफ है कि देश में युवाओं की तादाद के अनुपात में नौकरियां नहीं हैं। दूसरी ओर देश में यह दृष्‍य आम है कि नौकरियां पैदा करने के लिए केंद्र की मोदी सरकार के साथ ही सभी राज्‍य सरकारें अपने स्‍तर पर कौशल विकास और लघु उद्योगों को बढ़ावा दे रही हैं, लेकिन इसके बावजूद देश से बेरोजगारी की मुक्‍ति का कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आ रहा। इस अनियंत्रित हो रही जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए कड़े उपाय, नीति व कानून लागू करने की मांग करते हुए हाल में सुप्रीम कोर्ट में तीन जनहित याचिकाएं भी दाखिल हुई हैं। 

याचिकाओं में कहा गया है कि सरकार को एक ऐसी नीति बनाने का आदेश दिया जाए जिसमें दो बच्चों की नीति अपनाने वालों को प्रोत्साहन और नीति का उल्लंघन करने वालों को उचित दंड देने की व्यवस्था हो।
उच्‍चतम न्‍यायालय में याचिकाएं दाखिल करनेवालों ने जनसंख्या से देश की प्रगति, संसाधन और विकास पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को बताते हुए इसे नियंत्रित करने के लिए प्रभावी नीतिगत उपाय किये जाने की जरूरत बताई है। साथ में यह भी बताया है कि कैसे जनसंख्या वृद्धि का बेरोजगारी, गरीबी, अशिक्षा, खराब सेहत, अर्थव्यवस्था, पर्यावरण पर असर पड़ रहा है क्योंकि जनसंख्या के अनुपात में संसाधन सीमित हैं। 

यहां कहा गया है कि जनसंख्या वृद्धि पर रोक सिर्फ कड़े नीतिगत उपायों से ही संभव है। याचिकाओं में मांग की गई है कि कोर्ट सरकार को जनसंख्या नियंत्रण के लिए एक ऐसी नीति बनाने का आदेश दे जिसमें दो बच्चों की नीति अपनाने वाले परिवारों को प्रोत्साहन और उसका उल्लंघन करने वालों को उचित दंड की व्यवस्था हो याचिकाकर्ताओं के कुलमिलाकर करने का अर्थ यही है कि जनसंख्या विस्फोट से देश का सारा विकास गड़बड़ा गया है। इसे तुरंत ठीक किया जाए। इसके बावजूद प्रश्‍न यही है कि क्‍या यह जनसंख्‍या विस्‍फोट सरकार के या न्‍यायालय के हस्‍तक्षेप के बाद बने नियमों से रुक सकता है? कहना होगा नहीं । आज देश में जनसंख्‍या वृद्धि‍के जो महत्‍वपूर्ण कारण हैं, उनमें अशिक्षा तो है ही साथ में कुछ धार्मिक कारण भी जिम्‍मेदार हैं। 

इसके अतिरिक्‍त भारत की जनसंख्‍या बढ़ाने में विदेशी घुसपैठियों का भी बहुत बड़ा योगदान है।  देश में आज भी परिवार नियोजन के कार्यक्रमों को इस्लाम विरोधी बताया जाता है। ऐसा कहनेवालों का मत है कि महिलाएं बच्चा पैदा करने के लिए ही होती हैं। मुस्लिम परिवार गर्भ निरोधक का इस्तेमाल बंद करें और ज़्यादा से ज़्यादा बच्चे पैदा करें।

वस्‍तुत: इससे देश में पिछले दिनों में हुआ यह है कि एक हिन्दू महिला की तुलना में मुस्लिम महिला 1.1 अधिक बच्चों को जन्म देती है। केवल दिल्ली में ही मुसलमानों की जनसंख्या साढ़े दस गुना बढ़ी है।  हरियाणा में यह तीन गुना बढ़ी है। कोलकाता में मुसलमान 18 प्रतिशत की दर से बढ़ रहे हैं। असम के कुछ भागों में मुस्लिम संख्या 31.8 प्रतिशत के हिसाब से बढ़ रही है।

स्वतंत्रता से पूर्व मुस्लिम जन्म दर 10 प्रतिशत थी जो अब 25 प्रतिशत से अधिक हो गई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार शहरी क्षेत्र में हिन्दू जनसंख्या 26 प्रतिशत तो मुस्लिम जनसंख्या 36 प्रतिशत की दर से बढ़ी है जबकि उनकी मृत्यु दर हिन्दुओं की तुलना में कम है। एच.एफ.एच.एस. के आंकड़े बतलाते हैं कि हिन्दुओं की मृत्यु दर 9.6 प्रतिशत है तो मुस्लिम की 8.9 प्रतिशत।

बात यहां केवल हिन्‍दू मुस्‍लिम या अन्‍य किसी धर्म की नहीं है। विषय यह है कि जनसंख्‍या पर कैसे नियंत्रण किया जा सके। केंद्र और राज्‍य सरकारें जनसंख्‍या नियंत्रण के लिए कई वर्षों से जनजागरण के प्रयास कर रही हैं। पहले हम दो हमारे तीन से होते हुए, हम दो हमारे दो पर आकर अब बच्‍चा एक ही अच्‍छा के स्‍लोगन पर सरकार का जनसंख्‍या नियंत्रण कैंपेन चल रहा है। सरकार इससे आगे, ‘नहीं चाहिए हम को बच्‍चा’ पर चाहकर भी नहीं जा सकती है।

वस्‍तुत: ऐसे में समाज को ही आगे आकर इस विकराल हो चुकी जनसंख्‍या को काबू में करना होगा। प्रकृति के संसाधन सीमित हैं उन्‍हें असीमित नहीं किया जा सकता जबकि बढ़ती जनसंख्‍या संसाधनों पर भारी बोझ है।
वास्‍तव में बच्‍चे भगवान की देन और अल्‍लाह की नेमत हैं, इस सोच से ऊपर जब भारतीय समुदाय उठेगा तभी भारत में जनसंख्‍या की बड़ती समस्‍या से समाधान की ओर बढ़ा जा सकता है।


रविवार, 30 जुलाई 2017

चीनी सामान को क्‍यों न अलविदा कह दिया जाए ? डॉ. मयंक चतुर्वेदी

से लालच की कौन सी पराकाष्‍ठा माना जाए ?  कुछ समझ नहीं आता । चीनी सामान के प्रति हमारी भक्‍ति किस स्‍तर तक है, इसका एक बड़ा उदाहरण जबलपुर में बनी बोफोर्स तोप के स्वदेशी संस्‍करण धनुष में सीधेतौर पर देखने को मिला है। जिसमें कि देश के साथ सुरक्षा के स्‍तर पर भी कर्तव्‍यनिष्‍ठ स्‍वदेशवासियों ने गंभीरता से विचार नहीं किया। लालच की यह पराकाष्‍ठा निश्‍चित ही अशोभनीय और देशद्रोह जैसा कर्म तो है ही, किंतु इसके साथ यह इस विचार के लिए भी प्रेरित करता है कि आखिर हम भारतीयों को हो क्‍या गया है ?  जिनके लिए जननी और जन्‍म भूमि स्‍वर्ग से भी महान रही है और है। (रावण के निधन के बाद श्रीराम लक्ष्मण से कहते हैं: अपि स्वर्णमयी लंका मे लक्ष्मण न रोचते, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी । वाल्मीकि व अध्यात्मरामायण में तो नहीं, किंतु अन्‍यत्र किसी अन्‍य रामायण में उल्‍लेखित)

भारतीय सीमाओं पर चीन हमें आँखे दिखा रहा है। भारत के 43 हजार 180 वर्ग किलोमीटर पर चीन ने अवैध कब्जा कर रखा है। इस भू-भाग में वर्ष 1962 के बाद से हमारी भूमि का 38 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चीन के कब्जे में है। इसके अतिरिक्त 2 मार्च 1963 को चीन तथा पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षरित तथाकथित  चीन-पाकिस्तान 'सीमा करार' के अंतर्गत पाकिस्तान ने पाक अधिकृत कश्मीर के 5180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अवैध रूप से चीन को दे दिया था ।

चीन किस तरह से हमें मूर्ख बनाता है, इसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि लोकसभा में प्रस्‍तुत दस्तावेजों में विदेश मंत्रालय ने स्‍वीकारा कि वर्ष 1996 में चीन के तत्कालीन राष्ट्रपति च्यांग चेमिन की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने एलएसी पर सैन्य क्षेत्र में विश्वास बहाली के कदम के बारे में समझौते पर हस्ताक्षर किए थे ।  जून 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की चीन यात्रा के दौरान दोनों पक्षों में से प्रत्येक ने इस बारे में विशेष प्रतिनिधि नियुक्त करने पर सहमति जताई थी ताकि सीमा मुद्दे के समाधान का ढांचा तैयार करने की संभावना तलाशी जा सके । उसके बाद इस विषय पर अब तक दोनों पक्षों की कई बैठकें हो चुकी है लेकिन चीन सीमा विवाद पर भारत के आगे होकर लाख सकारात्‍मक प्रयत्‍नों के बाद भी कोई प्रगति होने नहीं देना चाहता। वह तो कश्‍मीर से लेकर अरुणाचल तक जहां-जहां चीन के साथ भारतीय सीमाएं लगती हैं, कई किलोमीटर अंदर भारतीय क्षेत्र पर भी अपना कब्‍जा बता रहा है। उल्‍टे हमें ही कहता है कि फलां क्षेत्र पर भारत ने कब्‍जा जमा रखा है, उसे भारत शांति के साथ चीन को सौंप दे। यानि कि उल्‍टा चोर कोतवाल को डांटे (एक कहावत) यहां चरितार्थ हो रही है। दूसरी ओर व्‍यापार के नाम पर हम इतने लालची हैं कि थोड़े से मुनाफे के लिए चीन का बहुतायत माल खरीदकर उसकी आय में रात-दिन बढ़ोत्‍तरी करने में लगे हैं।

पिछले वर्ष एक आंकड़ा आया था, उसके अनुसार भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा बढ़कर 46.56 बिलियन डॉलर (3 लाख करोड़ रुपए) तक जा पहुंचा था। चीन का भारत में निर्यात वर्ष 2016 के वित्त वर्ष में 58.33 बिलियन डॉलर था। 2015 के मुकाबले निर्यात में 0.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। दूसरी तरफ भारत का चीन में निर्यात 12 प्रतिशत गिरकर 11.76 बिलियन डॉलर तक जा पहुंचा था। वर्ष 2017 साल के पहले 4 महीने में व्यापार घाटा 14.88 अरब डॉलर रहा। बीते साल कुल व्यापार घाटा लगभग 52 अरब डॉलर का रहा था, जबकि कुल द्विपक्षीय व्यापार 70 अरब डॉलर से कुछ अधिक का रहा।

वस्‍तुत: यहां इससे सीधेतौर पर समझा जा सकता है कि भारत को कितना अधिक व्यापार घाटा हुआ है और निरंतर हो रहा है। कुछ अर्थप्रधान लालची विद्वान यह कहकर इस विषय की गंभीरता को समझना नहीं चाहते कि चीन के कुल निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 2 प्रतिशत है। अगर चीनी माल का भारत में बहिष्कार हो भी जाता है तो उससे चीन की अर्थव्यवस्था पर इतना असर नहीं पड़ेगा जिसे दबाव बनाकर भारत अपनी बात मनवा सके। किंतु क्‍या यह पूरा सच है ? इसके पीछे के सच को भी जानना चाहिए। भारत में जो 2 प्रतिशत निर्यात की बात कही जाती है, वह पूरी तरह सच नहीं, क्‍योंकि जितना माल कानूनी स्‍तर पर 1 नम्‍बर में चीन से भारत आता है, उससे कई गुना अधिक चीनी माल भारत की सीमाओं में अवैध रूप से आता है । इसलिए भले ही चीनी माल के बहिष्कार का वहां की अर्थव्यवस्था पर तुरंत कोई असर न पड़े लेकिन इसका असर बाद में बहुत व्‍यापक स्‍तर पर दिखेगा, यह तय मानिए।

वस्‍तुत: चीन अपने व्‍यापारिक माल के जरिए ही 21वीं सदी में महाशक्ति के रूप में उभरना चाहता है,  इसलिए वह अपने इस स्‍पप्‍न को इन दिनों 'वन बेल्ट वन रोड' के जरिए साकार करने में लगा है । इसके जरिए चीन आर्थिक तरीके से दुनिया पर राज करने का प्लान बना रहा है। जिसका कि पिछले दिनों मोदी सरकार ने विरोध किया था। किंतु इस सब के उपरान्‍त भी सरकार को यह समझना ही होगा कि वह अपनी निर्भरता क्‍यों चीन के सामने बनाए रखना चाहती है। क्‍या जरूरत है, सरकार को उसके सामने व्‍यापारिक हितों के नाम पर खड़े होने की ? यह इसीलिए भी कहा जा रहा है, क्‍योंकि आज जिस मोदी सरकार ने चीन की 'वन बेल्ट वन रोड' नीति का विरोध किया है, उस मोदी सरकार के लिए बहुत अच्‍छा तब ओर होता जब वह चीन से पेट्रोल, डीजल का आयात करने से भी बचती। पहली बार ही सही किंतु इसी वर्ष मार्च 2017 तत्‍कालीन चालू वित्‍तवर्ष के नौ माह में चीन से 18,000 टन पेट्रोल और 39,000 टन डीजल का आयात किया गया। जिसे कि स्‍वयं पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में स्‍वीकार्य किया । हालांकि उन्‍होंने दुनिया के तीसरे सबसे बड़े उपभोक्ता देश भारत के खपत के बड़े अंतर को देखते हुए यह निर्णय लिए जाने की बात कही थी । किंतु इसी के साथ देश को यह भी जानना चाहिए कि भारत में पेट्रोल और डीजल का कुल उत्पादन घरेलू खपत से ज्यादा है । इसी समय के अंतराल में अप्रैल से दिसंबर 2016 अवधि में देश में 2.71 करोड़ टन पेट्रोल का उत्पादन किया गया, जबकि इस दौरान खपत 1.80 करोड़ टन रही। जहां तक डीजल की बात है इसका घरेलू उत्पादन 7.65 करोड़ टन और खपत 5.72 करोड़ टन रही थी ।

इस सब के बीच सच तो यह भी है कि हमारे पास चीन के अलावा भी तमाम विकल्‍प मौजूद हैं । जब आवश्‍यकता के अनुरूप भारत में पिछले चालू वित्त वर्ष अप्रैल से दिसंबर अवधि में कुल मिलाकर 8,20,000 टन डीजल का और 4,76,000 टन पेट्रोल का आयात किया गया।  इन नौ महीनों में सिंगापुर के मुकाबले यूएई ने सबसे अधिक 2,43,000 टन पेट्रोल की आपूर्ति की गई थी और डीजल में भी यूएई से सबसे अधिक 3,80,000 टन डीजल आयात किया गया था, जबकि सिंगापुर से 1,69,000 टन पेट्रोल आयात किया गया था। फिर चीन की ओर देखने का औचित्‍य क्‍या है ? यानि कि इतने अधिक विकल्‍प होने के बाद भी हमारा चीन की ओर देखना कहीं न कहीं हमारी राष्‍ट्रभक्‍ति पर भी प्रश्‍नचिह्न खड़े करता है।

वस्‍तुत: इस संदर्भ में राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ और उससे जुड़े कई संगठन जो बार-बार चीनी सामान के बहिष्कार की मांग दोहराते आए हैं, प्रयोग के तौर पर वे अपने स्‍तर पर चीनी माल के इस्‍तेमाल से भी बचने का भरसक प्रयत्‍न करते रहे हैं, और समय-समय पर अपने स्‍वयंसेवकों को चीनी सामान के बहिष्कार करने का संकल्प दिलाते हैं। उसे पूरे देश को समझना होगा। यह केवल स्‍वदेश प्रेम से ही नहीं जुड़ा है, यह इसलिए भी जरूरी है कि 500 अरब डालर के अनुमानित नकली और पायरेटेड वस्तुओं के वैश्विक आयात में 63 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ चीन शीर्ष पर है। हमारे मुल्क को चीन घटिया ही नहीं, कई जहरीले उत्पाद भी निर्यात कर रहा है। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओइसीडी) की रिपोर्ट से भी यह प्रमाणित हो चुका है।  ओइसीडी ने अपने अध्ययन में यह भी माना है कि हैंडबैग व परफ्यूम से लेकर मशीनों के कलपुर्जे तथा रसायनों तक, सब के नकली उत्पाद बन रहे हैं। यानि की जिस कंपनियों के विदेशी लेवल लगे होने पर भारतीय उपभोक्‍ता बड़े ही शान से माल खरीद रहे हैं, अधिकांश में वह उसे खरीदकर ठगे जा रहे हैं। क्‍यों कि उन्‍हें चीन बना रहा है और उनकी खरीदारी का भारत सबसे बड़ा बाजार है। वास्‍तव में चीन हमें दो तरह से ठग रहा है, हम सस्‍ते के चक्‍कर में भी ठगे जा रहे हैं और महंगी चीजों में चीन का बना नकली सामान लेकर भी धोखा खा रहे हैं।

चलो, देश इस धोखे को भी झेल लेगा, किंतु क्‍या इससे भी मुंह मोड़ा जा सकता है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत के बाजार में चीनी उत्पादों की सस्‍ती बाढ़ आने से इसका बुरा असर देसी उत्पादकों पर पड़ा है। कई छोटी इकाइयों पर चीनी उत्‍पादनों के कारण ताले लग चुके हैं। कई बड़ी इकाइयां अपने उत्पाद बनाने के लिए दूसरे विकल्पों को तलाश रही हैं जिससे कि चीनी माल से मुकाबला किया जा सके। इस अंतर्विरोध का जो सबसे दुखद पक्ष है वह यही है कि एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मेक इन इंडिया और मेड इन इंडिया पर जोर दे रहे हैं तो दूसरी ओर केंद्र व राज्‍यों के कई विभाग हैं जोकि अपनी पूर्ति चीन के सामान से करने में लगे हुए हैं। वस्‍तुत: आज भी भारतीय परियोजनाओं के लिए अस्सी फीसद ऊर्जा संयंत्रों के उपकरण चीन से मंगाए जा रहे हैं। यह एक अकेला मामला नहीं, ऐसे तमाम विभाग और परियोजनाएं गिनाई जा सकती हैं।

इस पर अंत में इतना ही कहना है कि चीनी समान के प्रति हमारी भक्‍ति जब तक नहीं टूटेगी और हम यह नहीं देख और समझ पाएंगे कि आखिर मेरे देश के हित में क्‍या है, तब तक भारत भक्‍ति के लाख प्रयत्‍न कर लिए जाएं, प्रधानमंत्री मोदी मेक इन इंडिया और मेड इन इंडिया के अभियान को सफल बनाने के लिए अपना संपूर्ण अस्‍तित्‍व झोंक दे। राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ जैसे तमाम संगठन अपना सर्वस्‍व समर्पण मातृभूमि के लिए कर दें लेकिन उनके यह प्रयत्‍न सफल नहीं होने वाले हैं। देश में बोफोर्स तोप के स्वदेशी संस्‍करण धनुष जैसी सुरक्षा के स्‍तर पर भी लालच की पराकाष्‍ठा देशद्रोह जैसा कर्म होता रहेगा । वस्‍तुत: देश के प्रत्‍येक नागरिक को इस विषय पर गंभीरता से एक बार अवश्‍य विचार करना चाहिए।

रविवार, 2 अक्टूबर 2016

सार्क सम्‍मेलन का रद्द होना

पाकिस्तान में नवंबर में प्रस्तावित सार्क (दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन) शिखर सम्मेलन आखिरकार स्थगित हो गया। उड़ी हमले के बाद पाकिस्तान को अलग-थलग करने के अभियान में यह भारत की पहली बड़ी सफलता मानी जा सकती है। भारत के मना करते ही इसके तीन अन्‍य सदस्‍य देशों अफगानिस्तानबांग्लादेश और भूटान ने भी इस 19वें सार्क शिखर सम्मेलन में भाग नहीं लेने का अपना फैसला सार्वजनिक कर दिया। इन देशों के भारत के पक्ष में आने से यह बात साफ हो गई कि आतंकवाद को लेकर पाकिस्‍तान कुछ भी कहेलेकिन सभी जानते हैं कि भारत के अंदर सबसे ज्‍यादा आतंकवाद को यदि कोई पोषि‍त करता है तो वह पाकिस्‍तान है इसलिए आतंक के विरोध में अकेला भारत क्‍यों खड़ा रहेसभी को इसका विरोध करना चाहिए।

आतंकवाद पर पाक को लेकर दूसरे देशों की प्रतिक्रिया क्‍या हैवह इससे भी समझी जा सकती है कि अफगानिस्तान ने कहाउस पर'थोपे गए आतंकवाद" के कारण राष्ट्रपति मोहम्मद अशरफ गनी सेना के सर्वोच्च कमांडर की भूमिका निभाने में व्यस्त रहेंगेइसलिए वे शिखर सम्मेलन में नहीं जाएंगे। बांग्लादेश ने कहा कि उसके 'आंतरिक मामलों में एक देश विशेष के बढ़ते दखल ने ऐसा माहौल बना दिया है कि स्थितियां इस्लामाबाद में 19वें सार्क शिखर सम्मेलन के आयोजन के अनुकूल नहीं रह गई हैं।" भूटान ने कहा कि इस क्षेत्र में आतंकवाद बढ़ने के कारण ऐसा वातावरण नहीं रह गया है कि पाकिस्तान में सार्क शिखर बैठक हो। इसी प्रकार श्रीलंका को भी देखा जा सकता हैजिसने की सीधेतौर पर तो पाकिस्‍तान में होने जा रहे इस सम्‍मेलन का विरोध नहीं किया थाकिंतु यह कहकर अपनी मंशा जरूर जाहिर कर दी थी कि भारत की अनुपस्थिति में शिखर सम्मेलन का आयोजन संभव नहीं होगा। वैसे भी सार्क बैठक का भारत की उपस्थिति के बिना कोई मतलब नहीं रह जाता है।

आज जिस तरह से अंतर्राष्‍ट्रीय मंच पर पाकिस्‍तान और सार्क शिखर बैठक को लेकर संदेश गया हैउससे यह बात भी स्‍पष्‍ट हो गई है कि वर्तमान दौर में पाकिस्तान की हकीकत न केवल आतंकवाद को प्रश्रय देने के मामले में सार्वजनिक हो चुकी हैबल्कि दक्षिण एशियाई क्षेत्र में वह अकेला पड़ चुका है। भारत के नागरिकों के कलेजे को भी कुछ ठंडक महसूस हुई है कि चलोपाकिस्‍तान पर दवाब बनाने का सिलसिला तो हमारी सरकार की ओर से शुरू हुआ। सोशल मीडिया से लेकर सभी जगह देश सरकार के पक्ष में प्रतिक्रियाएं आना आरंभ हो गई है। देश के लोगों को लगता है कि सरकार ने यह निर्णय लेकर पाक प्रायोजित आतंकियों के उड़ी हमले का यह सही उत्‍तर दिया है।

सरकार की ओर से देखें तो लगता है कि यह पाकिस्‍तान को घेरने की भारत शुरूआत कर रहा हैइसके बाद भारत आगे एक के बाद एक ऐसे कई ठोस कदम उठा सकता है। पाकिस्‍तान ने सपने भी नहीं सोचा होगा कि भारत उड़ी हमले का इतना आक्रामक जवाब देगा। वह उसकी चौतरफा घेराबंदी करेगा। दूसरी ओर 15-16 अक्टूबर गोवा में होने वाले बिमस्टेक (बे आफ बंगाल इनिसिएटिव फार मल्टी-सेक्टरल टेक्निकल एंड इकोनोमिक कोआपरेशन) सम्मेलन में अधिकांश सार्क देश हिस्सा ले रहे हैंजिसमें कि पाकिस्तान नहीं है। बिम्सटेक के सात सदस्य- भारतबांग्लादेशश्रीलंकाथाईलैंडम्यांमाभूटान और नेपाल विश्व की कुल जनसंख्या में 20 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखते हैं। यह जनसंख्या लगभग डेढ़ अरब है और इन सदस्य देशों का सकल घरेलू उत्पाद 2,500 अरब से अधिक है।सम्‍मेलन में सार्क देश आपस में क्षेत्रीय सहयोग को मज़बूत करने का अपना संकल्‍प दोहराएंगे साथ में कई मसलों पर चर्चा होने के बाद स्‍थायी सहमती भी बनेगी। पाकिस्‍तान बिमस्‍टेक का सदस्‍य नहीं हैइसलिये इसका सबसे अधिक लाभ यहां सार्क देशों के आपस में मिलने पर भारत को होगा।

हाल ही में 56 साल पुरानी सिंधु जल संधि की समीक्षा भी हुई हैइससे भी पाकिस्‍तान डरा हुआ हैउसे लगता है कि कहीं भारत पानी न रोक देयदि ऐसा हो गया तो आधे से ज्‍यादा पाकिस्‍तान में सूखे के हालात पैदा हो जाएंगे। इसके साथ ही भारत ने पाकिस्तान को एकतरफा दिए गए सबसे पसंदीदा देश (एमएफएन) के दर्जे की समीक्षा करने का फैसला लिया है। यह दर्जा विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों के अनुरूप है। किंतु इससे जुड़ा एक सत्‍य यह भी है कि भारत ने काफी समय पहले पड़ोसी मुल्‍क होने के नाते अपना ये दायित्व निभायाजबकि पाकिस्तान ने आज तक भारतीय उत्पादों को अपने देश में इसका लाभ नहीं दिया। इससे भी पाकिस्‍तान की भारत के प्रति मंशा जाहिर होती है। हालांकि द्विपक्षीय व्यापार में मुनाफे की स्थिति में भारत हैफिर भी पाकिस्तान पर शिकंजा कसने के लिए जरूरी है कि भारत उससे एमएफएन का दर्जा छीन ले।

कुल मिलाकर कहना होगा कि भारत सरकार का यह कदम स्‍वागत योग्‍य हैक्‍योंकि कार्य और समझौते अपनी जगह हैलेकिन देश की संप्रभुता अपनी जगह। पाकिस्‍तान जैसा मुल्‍क जो भारत से ही पैदा हुआ और आज भारत को ही आंख दिखाए तो बेहतर है ऐसे देश से जितनी अधिक दूरी बनाई जाए उतना अच्‍छा है। जब तक पाकिस्‍तान अपनी सोच में परिवर्तन नहीं करता और भारत के प्रति अपना रवैया नहीं बदलताभारत को यही चाहिए कि वह इसी प्रकार कूटनीतिक स्‍तर पर और जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाही करते हुए उसे अपना ठोस और स्‍थायी जवाब देता रहे।
: डॉ. मयंक चतुर्वेदी

उड़ी आतंकी हमले के बाद के नए खुलासे

ड़ी में आतंकवादियों ने आकर जिस तरह भारतीय सेना मुख्‍यालय पर हमला किया और हमारे 18 जवानों को मौत के घाट उतार दिया उससे यह बात तो साफ हो ही गई है कि भारत के अंदर बैठे देशद्रोहियों की कोई कमी नहीं, जो पाकिस्‍तान प्रायोजित आतंकवाद को लगातार प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष सहयोग दे रहे हैं। पाकिस्‍तान लगातार सीजफायर का उल्‍लंघन कर रहा है। उसकी कोशिश यही है कि वह उड़ी और नौगाम सेक्‍टर से और आतंकवादियों के जत्थे किसी तरह भारत की सीमा में घुसाने में कामयाब हो जाए ।

वास्‍तव में नियंत्रण रेखा के पहाड़ों पर बर्फ गिरने के पहले पाकिस्‍तान आतंकवादियों को भारतीय सीमा में घुसाने के लिए कितना उतावला हैवह इस बात से भी समझा जा सकता है कि जिस स्‍थान से वह पहले आतंकवादियों को अंदर भेजकर हमला कराने के कामयाब रहाउसके बाद उसी स्‍थान से फिर उसने आतंकवादियों के एक बड़े जत्‍थे को धकेलने का प्रयास किया था। यह जानते हुए कि भारतीय सीमा सुरक्षा बल के जवान मुस्‍तैद होंगे। इतना ही नहीं पाकिस्‍तानी सेना आतंकवादियों को कवर फायरिंग का सपोर्ट भी मुहैया करा रही हैजिससे कि किसी तरह आतंकी भारत में घुसने में कामयाब हो जाएं। इससे सीधेतौर पर पाकिस्‍तान की आतंकवाद को प्रश्रय देने की नापाक मंशा तो जाहिर होती ही हैसाथ में यह भी पता चला है कि भारत को बाहर से उतना खतरा नहींजितना कि उसे  घर के अंदर छिपे उन तमाम देशद्रोहियों से हैजो खाते तो भारत की है लेकिन गुणगान से लेकर चाकरी उन मुल्‍कों की करते हैं जो हिन्‍दुस्‍तान को सदैव अशांत देखने की इच्‍छा रखते हैं।  

वस्‍तुत: आज उड़ी हमले के बाद जो सबसे बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है वह यही है कि बिना स्‍थानीय लोगों की मदद के इतना बड़ा आतंकी हमला सफल कैसे सफल हो सकता है इस हमले के बाद जो बातें निकलकर सामने आ रही हैंउनमें से एक यह बात भी है कि उड़ी हमला होने से पूर्व पिछले 4-5 दिनों से स्‍थानीय लोगों द्वारा 8 से 10 लोगों को फौजी वर्दी में भारी असला,बारूद लिए घूमते देखा गया था। इसमें सबसे खास ओर गौर करने वाली बात यह भी है कि हथियारों से लैस इन आतंकवादियों के साथ स्‍थानीय लोग भी दिखाई दिए थे। यहीं से स्‍थानीय लोगों के इस आतंकी हमले में शामिल होने का शक शुरू होता है।

दूसरी बात यह भी है कि पाकिस्‍तान से आए आतंकवादियों ने सेना के मुख्‍यालय पर उसी समय धावा बोला जिस वक्‍त चेंज ऑफ कमांड हो रहा थायानि की आतंकवादियों को पहले से सेना की आंतरिक गतिविधियों के बारे में जानकारी थीस्‍थानीय लोगों की आतंकवादियों को सहयोग देने की जानकारी तब ओर स्‍पष्‍ट हो गई जब यहां के तीन चरवाहोंजिन्‍हें स्‍थानीय भाषा में बक्‍करवाल भी बोला जाता है से सेना ने कड़ी पूछताछ की। इस पूछताछ के बाद उन्‍होंने जो बताया उससे जब मारे गए आतंकियों के हुलिए से इनके बताए हुलिए को मैच किया गया तो पता चला कि दो आतंकवादी ठीक वैसे ही कठ-काठी और हाव-भाव वाले थे जैसा कि चरवाहों ने उनके बारे में बताया था।

इन खुलासों के बाद जो अन्‍य जानकारियों निकलकर आई हैंउनमें हैइन फिदायीनों के पास से तमाम नक्‍शों का बरामद होना,जोकि इस आर्मी मुख्‍यालय की एक-एक आंतरिक गतिविधियों को केंद्र में रखकर बनाए गए थे। अब भला यह कैसे संभव है कि आतंकियों को पहले से सभी कुछ पता हो कि कहां से हमला करना है और कहां से हम भारतीय सेना की कई टुकड़ि‍यों को चकमा देकर भागने में कामयाब हो सकते हैं आतंकियों के पास से बरामद यह सभी नक्‍शों में लगे लाल निशान यही बता रहे हैं कि स्‍थानीय लोगों की गतिविधि जो इस सैन्‍य मुख्‍यालय के पासरोजमर्रा के जीवनक्रम में आए दिन होती थीसिर्फ उन्‍हीं लोगों को इस आर्मी मुख्‍यालय के बारे में सही जनकारी हो सकती है। इस बात को गहराई से इसलिए भी कहा जा सकता है क्‍यों कि उनके अलावा किसी बाहरी को यह किसी भी सूरत में नहीं पता हो सकता था कि आखिर यहां की सभी दिशाएं किस तरफ किस ओर के जाती हैं।

वस्‍तुत: सेना कैंपों या मुख्‍यालय में अभी तक हुए जितने भी हमले हैंयदि उन पर भी गंभीरता से गौर करलें तो आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि इतनी पुख्‍ता जानकारी के नक्‍शे कभी बरामद हुए हों। दूसरी ओर शुरूआती जांच से यह भी पता चला है कि पाकिस्‍तान की ओर से  आतंकवादी भारत की सीमा में कम से कम एक दिन और इससे भी कुछ दिन पहले ही घुसने में कामयाब गए थे। साथ ही इन आतंकियों के पास से जो ग्रेनेडसंचार तंत्रखाने के पैकेट और दवाईयां बरामद हुई हैंउन पर लगी मोहरें साफ बता रही हैं कि यह सभी कुछ पाकिस्‍तान में तैयार किए गए हैं। आतंकवादियों के पास से दो डेमेज रेडियो सेट मिले हैं। यह बरामद किए गए सेटेलाइट फोन जापान हैं, जिन्‍हें चलाने के लिए काफी प्रशिक्षित होना जरूरी है। इन सभी से साफ पता चलता है कि उड़ी हमले में सीधेतौर पर पाकिस्तान की सेना का हाथ है। उड़ी हमले के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित को तलब किया था ।

आज वास्‍तव में देखाजाए तो हर बार की तरह जिस बात का प्रत्‍येक भारतवासी को डर सता रहा हैवह यही है‍ कि कहीं पाकिस्‍तानी उच्‍चायुक्‍त से की गई भारत की नाराजगीभरी बातचीत सिर्फ कागजों तक सिमटकर न रह जाएक्‍यों कि जब-जब पहले भी पाकिस्‍तान ने इस प्रकार की कोई नापाक हरकत की हैज्‍यादातर मामलों में भारत सिर्फ अपनी नाराजगी जताने और पड़ौसी मुल्‍क पाकिस्‍तान के साथ दुनिया के तमाम देशों को आतंकवाद के सबूत सौंपने की कागजी खानापूर्ति करता ही दिखाई दिया है । बार-बार पाकिस्‍तान हमारा नुकसान भी कर जाता है और हम उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाते हैं।

– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

डीएवीपी की विज्ञापन नीति ?

विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) की विज्ञापन नीति में पहले भारत सरकार की ओर से देश की तीन बड़ी संवाद समितियों को वरीयता दी गई थीसाथ में सभी समाचार पत्र-पत्रिकाओं से कहा गया था कि इन तीन में से किसी एक की सेवाएं लेना अनिवार्य है। जैसे ही यह निर्देश डीएवीपी की वेबसाइट पर आएदेशभर में जैसे तमाम अखबारों ने विरोध करना शुरू कर दिया। यह विरोध बहुत हद तक इस बात के लिए भी था कि क्‍यों समाचार पत्रों के लिए सरकार की इस विज्ञापन एजेंसी ने अंक आधारित नियम निर्धारित किए हैं। इन नियमों के अनुसार प्रसार संख्‍या के लिए एबीसी या आरएनआई प्रमाण पत्र होने पर 25 अंकसमाचार एजेंसी की सेवा पर 15 अंकभविष्‍य निधि कार्यालय में सभी कर्मचारियों का पंजीयन होने पर 20 अंकप्रेस कॉन्‍सिल की वार्ष‍िक सदस्‍यता लेने के बाद 10 अंकस्‍वयं की प्रेस होने पर 10 अंक और समाचार पत्रों के पृष्‍ठों की संख्‍या के आधार पर अधिकतम 20 से लेकर निम्‍नतम 12 अंक तक दिए जाएंगे।

इस नई विज्ञापन नीति के आने के बाद से जैसे ज्‍यादातर अखबारों को जो अब तक स्‍वयं नियमों की अनदेखी करते आ रहे थे,लगा कि सरकार ने उन पर सेंसरशिप लागू कर दी है। इन छोटे-मध्यम श्रेणी के अधिकतम अखबारों के साथ कुछ एजेंसियों को भी पेट में दर्द हुआ, जिन्‍हें अपने लिए इस नीति में लाभ नहीं दिख रहा था। बाकायदा विरोध-प्रदर्शन का दौर शुरू हो गया । एक क्षेत्रीय समाचार एजेंसी ने तो इसमें सभी हदें पार कर दीं । वह अपने खर्चे पर छोटे-मंझोले अखबार मालिकों को दिल्‍ली ले गई और अपनी ओर से कई दिनों तक विरोध प्रदर्शन करवाया।

यहां प्रश्‍न यह है कि सरकार को इस नीति को लाने की जरूरत क्‍यों आन पड़ी क्‍या सरकार को यह नहीं पता था कि अखबारों से उसकी सीधेतौर पर ठन जाएगी । यह तय था कि जिस मोदी सरकार के बारे में कल तक ये अखबार गुणगान करने में पीछे नहीं थेदेश में इस नई विज्ञापन नीति के लागू होते ही समाचार पत्र सीधे सरकार के विरोध में खड़े हो सकते हैं। वास्‍तव में यदि इन सभी का उत्‍तर कुछ  होगा तो वह हां में ही होगा। क्‍योंकि सरकारसरकार होती हैउसके संसाधन अपार हैं और उसे ज्ञान देने वालों की भी कोई कमी नहीं होतीइसके बाद यह जानकर कि आने वाले दिनों में नई विज्ञापन नीति के लागू होते ही सबसे पहले सरकार का विरोध होगायह नीति डीएवीपी ने लागू की।

देखा जाए तो जिन लोगों को ये नहीं समझ आ रहा है कि क्‍यों सरकार ने आ बैल मुझे मार वाली कहावत को अपनी इस नीति के कारण चरितार्थ किया, तो उन्‍हें ये समझ लेना चाहिए कि सरकार इस रास्‍ते पर चलकर देश के उन तमाम कर्मचारियों का भला करना चाहती थीजो किसी न किसी अखबार के दफ्तर में वर्षों से काम तो कर रहे हैं लेकिन उनका पीएफ नहीं कटता। जीवन के उत्‍तरार्ध में जीवन यापन के लिए कहीं कोई भविष्‍य नि‍धि सुरक्षित नहीं है। वस्‍तुत: सरकार इस नियम के माध्‍यम से देश के ऐसे कई लाख कर्मचारियों का भविष्‍य सुरक्षित करना चाह रही थी। इसी प्रकार समाचार एजेंसियों की अनिवार्यता को लेकर कहा जा सकता है। 

अक्‍सर देखा गया है कि वेब मीडिया के आ जाने के बाद से कई अखबार अपने समाचार पत्र में खबरों की पूर्ति इनसे सीधे कर लेते हैं। इन खबरों के निर्माण में जो श्रमसमय और धन उस संस्‍था का लगा हैउसका पारिश्रमिक चुकाए बगैर समाचारों का उपयोग जैसे इन दिनों रिवाज सा बन गया था। एक तरफ दूसरे के कंटेंट को बिना उसकी अनुमति के उपयोग करना अपराध माना जाता है तो दूसरी ओर मीडिया जगत में ऐसा होना आम बात हो गई थी। वास्‍तव में एजेंसी के माध्‍यम से सरकार की कोशिश यही थी कि सभी अखबार नियमानुसार समाचार प्राप्‍त करें और उन खबरों के एवज में कुछ न कुछ भुगतान करें, जैसा कि दुनिया के तमाम देशों में होता है । लेकिन इसका देशभर के कई अखबारों ने विरोध किया । 

आश्‍चर्य की बात उसमें यह है कि यह विरोध एक समाचार एजेंसी पर आकर टिक गया था। यहां कोई भी पीटीआई या यूएनआई का विरोध नहीं कर रहा था, विरोध करने वालों के पेट में दर्द था तो वह हिन्‍दुस्‍थान समाचार को लेकर था। इस एजेंसी को लेकर यही बातें आम थी कि यह एक विशेष विचारधारा की एजेंसी है। यहां समाचार नहीं विचारधारा मिलेगी और इन्‍हीं के लोगों की सरकार है इसलिए उन्‍होंने इस एजेंसी को डीएवीपी में मान्‍यता दी है। यानि की पैसा भी देना पड़ेगा और समाचार भी नहीं मिलेंगेलेकिन क्‍या यह पूरा सत्‍य था जो हिन्‍दुस्‍थान समाचार की कार्यप्रणाली से पहले से परिचित रहे हैं वे जानते हैं कि इस संवाद समिति का सत्‍य क्‍या है। एक क्षेत्रीय न्‍यूज एजेंसी से जुड़े समाचार पत्र एवं अन्‍य लोग जैसा कि कई लोगों से चर्चा के दौरान पता चला कि नाम लेकर हिन्‍दुस्‍थान समाचार का खुला विरोध कर रहे थे। कम से कम उन्‍हें पहले इसके इतिहास की जानकारी कर लेनी चाहिए थी । हिन्‍दुस्‍थान समाचार 1948 से देश में कार्यरत है। पीटीआई को जब देश के प्रथम गृहमंत्री सरदार पटेल ने विधिवत शुरू किया थाउसके पहले ही यह संवाद समिति मुंबई से अपना कार्य अंग्रेजी के साथ भारतीय भाषाओं में आरंभ कर चुकी थी। 

यह आज भी देश में सबसे ज्‍यादा भारतीय भाषाओं में समाचार देने वाली बहुभाषी न्‍यूज एजेंसी है। इस एजेंसी के खाते में कई उपलब्‍धियां दर्ज हैं। यह हिन्‍दी और भारतीय भाषाओं में सबसे पहले दूरमुद्रक टेलीप्रिंटर निर्माण कराने वाली संवाद समिति है। चीन का आक्रमण हो या अन्‍य विदेशी घुसपैठ से लेकर देश की ग्रामीण जन से जुड़ी बातें यदि किसी एजेंसी ने सबसे ज्‍यादा और पहले देश के आमजन से जुड़ी सूचनाएं सार्वजनिक की हैं तो यही वह एजेंसी है। आज भी इस संवाद समिति का अपना संवाददाताओं का एक अखिल भारतीय और व्‍यापक नेटवर्क है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरू से लेकर श्रीमती इंदिरा गांधी के समय तक हिंदुस्‍थान समाचार को केंद्र व राज्‍य सरकारों द्वारा लगातार न्‍यूज एजेंसी के रूप मान्‍यता दी जाती रही है। यहां तक कि कई कांग्रेसी एवं अन्‍य विचारधाराओं वाले नेता समय-समय पर इससे जुड़े रहे। मध्‍यप्रदेश कांग्रेस के अध्‍यक्ष अरुण यादव के पिता स्‍व. सुभाष यादव भी कभी हिंदुस्‍थान समाचार बहुभाषी सहकारी संवाद समिति  के अध्‍यक्ष रह चुके हैं। संवाददाताओं के स्‍तर पर भी देखें तो किसी पत्रकार की अपनी विचारधारा कुछ भी रही होयदि उसमें पत्रकारिता के गुण हैं और वह मीडिया के स्‍वधर्म को जानता हैतो बिना यह जाने कि वह किस विचारधारा से संबद्ध हैहिंदुस्‍थान समाचार ने उसे अपने यहां बतौर संवाददाता से लेकर केंद्र प्रमुख एवं अन्‍य महत्‍वपूर्ण जिम्‍मेदारियां सौंपने में संकोच या भेदभाव नहीं किया।

डीएवीपी ने हिन्‍दुस्‍थान समाचार को केवल इसलिए ही अपनी सूची में नहीं डाल लिया होगा कि इसकी विशेष विचारधारा से नजदीकियां होने की चर्चाएं आम हैं। सभी को यह समझना ही चाहिए कि समाचार में कैसा विचार क्‍यों कि एक समाचार तो समाचार ही होता हैऔर देशदुनिया के समाचार देना प्रत्‍येक संवाद समिति का रोजमर्रा का कार्य है।  वास्‍तव में विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय ने पीटीआईयूएनआई के साथ हिन्‍दुस्‍थान समाचार को इसलिए अपनी सूची में लिया क्‍योंकि यह एजेंसी प्रिंट के लिए दी जाने वाली समाचार सामग्री में सबसे ज्‍यादा क्षेत्रीय खबरों को नियमित प्रसारित करती है और वह भी कई भाषाओं में । यह भी सरकार के समय-समय पर निर्धारित किए गए नियमों का पालन करती हैमजीठिया वेतन आयोग की अनुशंसाओं के अनुसार अपने कर्मचारियों को वेतन देती है और नियमित कर्मचारियों का पीएफ काटने से लेकर अन्‍य निर्धारित मापदंडों को पूरा करती है। ऐसे में क्‍या उन तमाम समाचार एजेंसियों को अपने गिरेबान में नहीं झांकना चाहिए जो अपने कर्मचारियों के हित में न तो किसी वेज बोर्ड की अनुशंसाओं को लागू करती हैं और न ही सभी को कर्मचारी भविष्‍य नि‍धि का लाभ देती हैं।

देखा जाए तो विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) को आज अखबारों की तरह ही यह तय कर देना चाहिए कि न्‍यूज एजेंसी के लिए हमारे यहां सूची में पंजीकृत होने के लिए क्‍या नियम होने चाहिएजिनकी कि पूर्ति की जाना अपरिहार्य रहे। डीएवीपी ने अभी हाल ही में इस मामले को लेकर ‘ मुद्रित माध्‍यमों के लिए भारत शासन की विज्ञापन नीति-2016 में संशोधनकिया है, उसमें उसने लिखा है कि समाचार पत्र पीआईबी एवं प्रेस कॉन्‍सिल ऑफ इंडिया से मान्‍यता प्राप्‍त किसी भी न्‍यूज एजेंसी के ग्राहक बन सकते हैं। यहां सीधा प्रश्‍न विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) से आज क्‍यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि आपने यह जो नया निर्देश निकाला हैविरोध इसका नहीं, लेकिन क्‍या उन्‍होंने उन तमाम संवाद एजेंसियों का निरीक्षण करा लिया है जो अब इस निर्देश के नाम पर अखबारों को अपनी सदस्‍यता देंगे। क्‍या यह तमाम एजेंसियां समय-समय पर पत्रकारों के हित में बनाए गए भारत सरकार नियमों और आयोगों के निर्देशों का पालन कर रही हैं। इन्‍होंने अपने यहां क्‍या मजीठिया बेज बोर्ड के नियमों का अक्षरक्ष: पालन किया है। यदि पीटीआई और यूएनआई के साथ हिन्‍दुस्‍थान समाचार केंद्र सरकार के सभी नियमों का पालन करती है तो क्‍यों नहीं अन्‍य संवाद समितियों को भी उन नियमों को स्‍वीकार करना चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं कर रहीं तो उन्‍हें किस आधार पर विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी)  अपनी सूची में शामिल करने के लिए तैयार हो गया  

- डॉ. मयंक चतुर्वेदी