अंतरराष्ट्रीय लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
अंतरराष्ट्रीय लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

पाक की आतंकी मंशा फिर जाहिर


पाकिस्‍तान एक ओर पूरी दुनिया में यह कहकर अमेरिका, चीन तथा अन्‍य यूरोपीय देशों का साथ पाने के लिए प्रयत्‍नशील रहता है कि वह अपने यहां आतंकवादियों के खिलाफ युद्ध कर रहा है, लेकिन दूसरी ओर उसकी भारत के मामले में कश्‍मीर को लेकर जो नीति है, उससे एक बार नहीं बार-बार यही जाहिर होता आया है कि पाकिस्‍तान की मंशा आतंकवाद को सदैव पाले रखने की है। वह तमाम देशों से धन उगाही के लिए अपनी कोख में आतंक को पाले रखना चाहता है। आज पाकिस्तान ने जिस तरह आतंकी संगठन हिजबुल के मारे गए कमांडर बुरहान वानी और अन्य आतंकवादियों को स्वतंत्रता सेनानी बताया है उससे दुनिया के सामने पाक का चेहरा बेनकाब हो गया है।

आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक और जमात-उद-दावा संगठन के प्रमुख हाफिज सईद पाकि‍स्‍तान में खुलेआम घूमता है। अमेरिका ने सईद को आतंकी घोषित कर उसके सिर पर एक करोड़ डॉलर (करीब 67 करोड़ रुपये) का इनाम रखा है। उसके इस प्रकार बिना खौफ घूमने से भी यह साबित होता है कि पाकिस्‍तान आतंकवाद को लेकर दुनिया के सामने सि‍र्फ दिखावा करता है।

यह भी समझ के परे है कि ऐसी कौन सी कूटनीतिक विवशता है जिसके चलते अमेरिका बार-बार आतंक के सफाए के नाम पर उसे धन मुहैया कराता है, जबकि उसीके कई सांसद इस बात पर एतराज जता चुके हैं। इन सांसदों को भी लगता है‍ कि पाकिस्‍तान अमेरिका से मिलने वाले धन का उपयोग आतंक की समाप्‍ति के लिए नहीं बल्‍कि भारत विरोध और जम्‍मू-कश्‍मीर में आतंक को पालने के लिए करता है।

पाकिस्‍तान में इन दिनों बुरहान के मारे जाने के बाद से सरकारी और गैर-सरकारी स्‍तर पर स्‍यापा चल रहा है, तथा वह जिस तरह से आतंकवादियों को महिमामंडित करते हुए भारतीय सुरक्षा बलों पर कश्मीर में सरकारी आतंकवाद अंजाम देने का आरोप पाकिस्‍तान लगा रहा है, उसकी इस मंशा ने भी भारत के उन आरोपों को साबित कर दिया है, जिसमें भारत की ओर से कई बार यह बताया गया कि पाकिस्‍तान आतंकवाद को लगातार प्रश्रय देने तथा उसे बढ़ाने में लगा है तथा आजादी की आवाज भारत में नहीं सबसे ज्‍यादा उसी के यहां बुलंद है।

पाकिस्‍तान की नजर में जम्‍मू-कश्‍मीर में हिजबुल कमांडर वानी एवं अन्य आतंकवादियों द्वारा "आजादी की जंग " लड़ी जा रही थी, जिसमें कि वे शहीद हुए हैं। पाकिस्तान ओआईसी, पी-5 एवं ईयू के साथ ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भारतीय बलों द्वारा अत्याचार और मानवाधिकारों का उल्लंघन करने के बारे में बता रहा है। लेकिन वह खुद क्‍या कर रहा है, यह किसी को बताना नहीं चाहता, जबकि सच्‍चाई यह है कि पाकिस्‍तान में लगातार कई इलाकों में आजाद होने के नारे लग रहे हैं।

वस्‍तुत: भारत के कश्‍मीर को लेकर दुनियाभर में रोने वाला, उसके खुद के यहां पाक अधिकृत कश्मीर में कश्मीरियों पर जुल्म ढाता है, ये आज सारी दुनिया जानती है। पाकिस्‍तान का सच ये है कि पंजाब प्रांत को छोड़कर उसके सभी सूबों में आजादी के लिए संघर्ष चल रहा है । सिंध प्रांत में नारे लग रहे हैं हम लेकर रहेंगे आजादी । यहां के लोगों ने यह नारा इसलिए बुलंद किया है, क्‍योंकि पाकिस्तान का 70 फीसदी टैक्स सिंध से आता है। सिंध में पाकिस्तान के प्राकृतिक गैस का 69 फीसदी उत्पादन होता है। पाकिस्तान के 75 फीसदी कच्चे तेल का उत्पादन सिंध करता है फिर भी सिंध पाकिस्तान के सबसे पिछड़े सूबों में से एक है।

आजादी का ये संघर्ष पाकिस्तान के सिंध से भी कहीं ज्यादा तीखा बलूचिस्तान में है। बलूचिस्तान में आए दिन पाकिस्तान विरोधी आंदोलन और आजादी की मांग को लेकर प्रदर्शन होते रहते हैं। ये बलूचिस्तान के वो लोग हैं जो किसी भी कीमत पर पाकिस्तान से अलग हो जाना चाहते हैं। ये पाकिस्तान को पाकिस्तान नहीं टेररिस्तान मानते हैं।

पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) के साथ उपनिवेश की तरह बर्ताव करता है। चीन के साथ मिलकर एक सोची समझी साजिश के तहत वो इस जन्नत को लूट रहा है। इससे यहां के लोगों में जबर्दस्त गुस्सा है, जिसे पाकिस्तान ताकत से दबाता है। हाल ही में यहां के लोगों के बर्बर दमन की तस्वीरें भी सामने आई हैं। वहीं इसका सिंध, बलूचिस्तान, पीओके के अलावा फाटा भी महत्‍वपूर्ण क्षेत्र हैं जहां भी पाकिस्तान के खिलाफ संघर्ष चल रहा है। पाकिस्तान के इस उत्तरी-पश्चिमी इलाके में पाकिस्तानी सेना, स्‍थानीय लोगों और तालिबान के बीच कई सालों से संघर्ष चल रहा है।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने जिस तरह इस हिजबुल मुजाहिदीन के कुख्यात आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद उसकी मौत पर शोक जताया है, उससे साफ झलकता है कि पाकिस्‍तान की मंशा सिर्फ आतंकवाद को प्रश्रय देने और भारत की शांति को लगातार भंग करते रहने की ही है। उसके हालिया उठाए गए कदम एक बार फिर आतंकवाद के प्रति प्रेम को ही जग जाहिर करते हैं। 

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

भारत की विकास दर को लेकर अमेरिका का व्यर्थ संदेह

 भारत के संदर्भ में दुनिया के कई देशों के बीच ऐसा पहली बार हो रहा है कि भारत तेजी से आर्थ‍िक ग्रोथ के साथ ढॉचागत प्रगति भी कर रहा है। इस समय भारत आर्थिक विकास दर साढ़े सात फीसद की तेज गति से बढ़ रही है जोकि विश्व के स्तर पर किसी भी देश की तुलना में सबसे ज्यादा है। लेकिन इस तेज कदम से आगे बढ़ते भारत की प्रगति जैसे भारत के कुछ पड़ौसी देशों को नहीं सुहाती, वैसे ही कल तक रक्षा, व्यापार और तमाम क्षेत्रों में बराबरी से सहयोग देने का वायदा करने वाले अमेरिका को भी अब रास नहीं आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तेज रफ्तार के पहले ही विश्व के कई देश मुरीद बन चुके हैं, यहां तक कि अमेरिका में भी भारतीय प्रधानमंत्री के प्रति श्रद्धा, प्रेम और विश्वास रखने वालों की संख्या कहीं ज्यादा है। इन वर्तमान उभरी परिस्थ‍ितियों को देखकर लगता है कि अमेरिका भी उन सभी पूर्व की गई भविष्यवाणियों से डरने लगा है, जो भारत को 21 वीं सदी में दुनिया का शक्तिसम्पन्न समृद्ध राष्ट्र बन जाने की घोषणा करती हैं। नहीं तो भला क्या कारण हो सकता है‍ कि अमेरिका जैसा दुनिया का सबसे ताकतवर देश भारत की विकास दर को जूठा बताने के प्रयत्न करे।

यह बात आज इसलिए चर्चा में आई है, क्यों कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय को लगता है कि भारत वास्तव में प्रगति नहीं कर रहा है, उसकी यह ग्रोथ बढ़ा-चढ़ाकर बताई गई है। रपट कितनी वास्तविक है, वह इसमें कही गई बातों से समझा जा सकता है। रिपोर्ट में भारतीय सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़ों पर संदेह जताते हुए कहा गया है कि नरेंद्र मोदी सरकार आर्थिक सुधारों के अपने वादों को पूरा करने की दिशा में धीमी रही है। अमेरिकी विदेश विभाग के आर्थिक एवं कारोबार ब्यूरो की ओर से तैयार यह रिपोर्ट यह भी बताती है कि दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में भारत की विकास दर सबसे तेज है। लेकिन निवेशकों के कमजोर पड़ते रुझान से संकेत मिलता है कि करीब 7.5 फीसद की यह वृद्धि दर वास्तविकता से अधिक बताए गई है।

रिपोर्ट के मुताबिक, कई प्रस्तावित आर्थिक सुधारों को संसद में पारित कराने के लिए सरकार को कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है। इस कारण राजग सरकार के समर्थन में आगे आए कई निवेशक पीछे हट रहे हैं। मोदी सरकार संसद में भूमि अधिग्रहण बिल पर पर्याप्त राजनीतिक समर्थन नहीं जुटा पाई है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के मामले में भी यही हाल है। जीएसटी संविधान संशोधन बिल संसद से पारित नहीं हो सका है। सरकार की ओर से इस को लेकर विपक्षी दलों के साथ अब भी विचार-विमर्श चल रहा है। यानि कि भारत में आर्थ‍िक दृष्ट‍ि से जो कुछ इन दिनों हो रहा है वह पूरी तरह सही नहीं है।


हालांकि यहां आगे इस बात का भी कहीं जिक्र है कि मोदी सरकार ने नौकरशाही और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) के क्षेत्र में बाधाओं को कम करने की दिशा में कई सही कदम उठाए हैं, जिनके कारण विदेशी धन का प्रवाह भारत की ओर तेजी से हुआ है। परन्तु जो मूल बात इस रपट की है वह यही है कि भारत की विकास दर सही नहीं, वह वास्तविकता से दूर बढ़ा चढ़ाकर बताई जा रही है। वस्तुत: यहां कहना होगा कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय ऐसी रपट प्रस्तुत कर दुनिया के सामने भारत के विषय में भ्रम फैलाने का कार्य कर रहा है, जिससे कि विश्वभर में तेजी से भारत के प्रति बन रहे उत्साहवर्धक और सकारात्मक माहौल को रोका जा सके।

वास्तव में अमेरिका द्वारा फैलाए जा रहे इस झूठ को इससे भी समझा जा सकता है कि पिछले दो वर्षों में आईं तमाम रपटें चाहे वे विश्व बैंक, एशि‍यन बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष, हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी, संयुक्त राष्ट्र या अन्य किसी की क्यों न हों, सभी ने एक स्वर में यह बात स्वीकारी है कि भारत आज विकसित, विकासशील और तीसरी दुनिया के देशों के बीच सबसे ज्यादा तेज गति से विकास कर रहा है। 

अमेरिकी विदेश मंत्रालय की यह रिपोर्ट क्या हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी के पिछले वर्ष ही किए गए उस अध्ययन को झुठला सकती है, जिसके निष्कर्ष बताते हैं कि भारत के जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) की वृद्धि दर दुनिया के प्रमुख देशों में सबसे ज्यादा रहेगी और भारतीय अर्थव्यवस्था अगले आठ साल तक सालाना औसतन 7.9 प्रतिशत की रफ्तार से दौड़ते हुए चीन को पीछे छोड़ देगी। यदि हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (सीआइडी) की जमीनी स्तर पर तैयार की गई रिपोर्ट सही है तो निश्चिततौर पर कहना होगा कि अमेरिका आज जो बात भारत की ग्रोथ को लेकर कह रहा है, वह भ्रम फैलाने के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। इसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र की गत वर्ष की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत की मौजूदा आर्थिक वृद्धि दर की जो रफ्तार है उस हिसाब से भारत चीन को पीछे छोड़ देगा। यहां यह भी बताया गया था कि 2016 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि 7.7 प्रतिशत रहेगी।

वस्तुत: भारत के विकास के कुछ संकेत इससे भी समझे जा सकते हैं कि जब से काले धन पर अंकुश लगाने के प्रयास भारत सरकार की ओर से शुरू किए गए, तब से लेकर अब तक लगातार स्वि‍स बैंक हो या अन्य किसी देश के बैंक उनमें भारतीयों की काली कमाई का प्रतिशत लगातार घट रहा है। देश के व्यापारी या अन्य प्रतिष्ठि‍त जनता जनार्दन के बीच श्रेष्ठी जन, जो भी हैं, बहुत तेजी से इस बात को स्वीकार करने लगे हैं कि एक नंबर में रुपया रखना ही बेहतर है। विदेश में धन जमा करने से अच्छा है कि अपने ही देश में उसे व्यापार के नए आयामों में व्यय किया जाए, जिससे कि उसका अधि‍क से अधि‍क सद्उपयोग होने के साथ लोगों को भी रोजगार मिले। वस्तुत: वर्तमान ग्रोथ जो दिख रही है, वह इस सोच के कारण भी है, ऐसा भी कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा।

इसके अलावा भी तमाम अन्य कारणों में विशेष महत्व का मोदी सरकार के लिए गए पिछले दो सालों के निर्णय हैं, जोकि सभी क्षेत्रों में समान रूप से लिए गए, इस विकास के जिम्मेदार ठहराए जा सकते हैं। देश में लगातार हो रहे ढ़ाचागत सुधार, स्टार्टअप और पूंजीगत सुधार भी बड़ा कारण हैं कि पिछले वित्त वर्ष 2015-16 की चौथी तिमाही में भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट 7.9 फीसद रही। पूरे वित्त वर्ष 2015-16 में आर्थिक विकास दर 7.6 फीसद रही थी। जो कि ग्लोबल आधिकारिक अनुमान के मुताबिक ही है। इसके पूर्व वर्ष को भी देखें तो भारतीय विकास दर इस संदर्भ में की गई वैश्विक घोषणाओं के अनुसार ही रही थी, 2014-15 में देश की जीडीपी 7.2 फीसद थी।

सोमवार, 4 मई 2015

केंद्र क्यों नहीं कर रहा महंगाई रोकने के विकल्पों की तलाश?

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव में उछाल का रुझान है। जब से बाजार में तेल कीमतों में वृद्धि होना शुरू हुआ है, तभी से लगातार भारत में भी अंतरराष्ट्रीय मार्केट के भरोसे छोड़े जा चुके तेल दामों में कुछ समय के अंतराल के बाद वृद्धि की जा रही है। यहां समझ में यह बात नहीं आ रही कि जो सरकार सबका साथ और सबका विकास के नारे तथा एक बार मोदी सरकार के वायदे के साथ सत्ता में आई है, वह उन मूलभूत बातों को क्यों नहीं गंभीरता से ले रही, जिससे कि भारत में कुछ समय काबू में रहने के बाद तेजी से बढ़ रही महंगाई पर अंकुश लगाया जा सकता।




निश्चित तौर पर आज इसे कोई नहीं नकार सकता कि देश के विकास में तेल का महत्व कहीं से भी कमतर है, किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि देश की कुल पेट्रोलियम मांग पूरा करने के लिए लगभग 70 से 75 प्रतिशत तेल आयात करना पड़ता है, जिस पर बड़ी तादाद में बहुमूल्य विदेशी मुद्रा खर्च होती है। इस वजह से स्थिति कई बार इतनी भयावह हो जाती है कि कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में जब भी उछाल आता है, देश की अर्थव्यवस्था डगमगाने लगती है। लगता है कि हम भले ही अंग्रेजों से मुक्त हो गए हों, किंतु एक अलग तरह से तेल-दासता के युग में जी रहे हैं।

पेट्रोल कीमतों में सिर्फ अप्रैल में इसके भाव तकरीबन 25 फीसदी तक बढ़े हैं। वैश्विक बाजार में पेट्रोलियम की कीमत 59.90 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंची, जिसे हम पिछले पांच महीनों में सबसे ऊंचा स्तर कह सकते है। इसका स्वाभाविक प्रभाव घरेलू बाजार पर हुआ है। फिर पिछले कुछ दिनों से मुद्रा विनिमय बाजार में डॉलर दबाव में है।

चूंकि कच्चे तेल का ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय कारोबार डॉलर में होता है, अत: डॉलर के सस्ता होने का सीधा मतलब पेट्रोलियम के दाम में इजाफा होना है। इसी समय ज्यादा तो नहीं, फिर भी डॉलर की तुलना में रुपया कमजोर पड़ा है। रुपए की कीमत गिरने से हर आयात महंगा हो जाता है। यानी पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत पुराने स्तर पर रहे, तब भी उन्हें देश में मंगाना महंगा हो जाता है। यह बातें ऐसा नहीं है कि सरकार नहीं जानती, किंतु हालात यह है कि पिछली कांग्रेस सरकारों की तरह भाजपा खासकर स्वदेशी पर बल देने वाले दल की सरकार ने भी देश की जनता को भगवान के भरोसे छोड़ दिया है, यही वस्तुत: आश्चर्य का विषय है।

अभी यमन संकट कितने दिनों और चलेगा, इसकी कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। ऐसे में निकट भविष्य में कच्चे तेल के भाव में बड़ी गिरावट की आशा नहीं है। हालांकि, यह सही है कि पिछले वर्ष अगस्त से लेकर इस साल फरवरी के बीच पेट्रोल के दाम में दस बार कटौती हुई। इस दौरान इसकी कीमत 17.11 रुपए प्रति लीटर घटी, जबकि पिछले अक्टूबर से इस वर्ष फरवरी तक डीजल के दाम में छह कटौतियां हुईं और यह 12.96 रुपए प्रति लीटर सस्ता हुआ। परन्तु इसका कारण भी सभी को विदित है। पेट्रोलियम का अंतरराष्ट्रीय बाजार बुरी तरह लुढक़ने से मई में कच्चा तेल 105 डॉलर प्रति बैरल था, जो एक समय 50 डॉलर से भी नीचे चला गया था। इससे उपभोक्ताओं और सरकारी खजाने दोनों को आंशिक लाभ हुआ, किंतु आज स्थिति हाथ से निकल रही है। अंतरराष्ट्रीय कीमतों के कारण सरकार भी अपने को असहाय मानती है, पर वह जो कुछ कर सकती है, वह भी नहीं कर रही है।

फिलहाल, पेट्रोलियम की मूल्यवृद्धि के दिन लौटते नजर आ रहे हैं, जिससे आम महंगाई बढऩे लगी है। खासकर डीजल महंगा होने का असर मारक होता है। आशंका है कि ताजा बढ़ोतरी से माल ढुलाई भाड़े में वृद्धि होगी और वहीं सार्वजनिक परिवहन पर भी इसका बोझ पडऩा तय माना जाए। इसके परिणामस्वरूप अभी से सब्जी, फल और दालें इत्यादि महंगी होना शुरू हो गया है, लेकिन सरकार के पास विकल्प होते हुए भी कोई हल नहीं है।

हां, पिछले साल सितम्बर तक जरूर कुछ सरकारी प्रयासों, कुछ भारतीय रिजर्व बैंक की सख्ती और कुछ संयोग का नतीजा रहा था कि महंगाई दर काबू में रही। सितम्बर में थोक भाव मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति दर पांच साल के सबसे निचले स्तर (2.38 प्रतिशत) पर आ गई थी। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित मुद्रास्फीति की दर 6.46 फीसदी पर पर आकर सिमट गई थी। उस वक्त महंगाई दर के आंकड़े आने पर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसका श्रेय केंद्र के कदमों को दिया था। यह बात आंशिक रूप से सच भी है। एनडीए सरकार ने खुले बाजार में बिक्री के लिए अपने भंडार से चावल और गेहूं की ज्यादा खेप जारी की, उपज के खरीद मूल्य को नियंत्रित रखा और राज्यों को प्रोत्साहित किया कि वे फसलों के समर्थन या खरीद मूल्य में ज्यादा बढ़ोतरी न करें। जिसका प्रभाव खाद्य पदार्थों के भावों पर पड़ा था।

खाद्य पदार्थों की महंगाई दर 7.67 प्रतिशत पर आ गई, जबकि यह और पहले यह 12 फीसद तक जा पहुंची थी। लेकिन इस साल क्या हुआ, महंगाई यमन संकट के तेज होने के साथ ही धीरे-धीरे बढऩे लगी है। वित्त मंत्री ने संसद में जो बजट रखा, उसमें बहुत कुछ ऐसा है, जिसकी सर्वत्र आलोचना हुई है। भले ही फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा इसे अच्छे दिनों की आशा के अनुरूप बताने वाला दर्शाने का प्रयास किया गया हो, किंतु सच यही लगता है कि कुछ महंगाई खुद सरकार ने अपने हाथों स्वीकार कर रखी है, जिसे देखते हुए कहा जा सकता है कि जिस तरह के आरोप पिछली सरकारों पर लगते रहे हैं, उससे अब मोदी सरकार भी बचने वाली नहीं है।

वस्तुत: आज देश के सामने तमाम ऐसे विकल्प मौजूद हैं, जिनका उपयोग करते हुए ना केवल देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत किया सकता है, बल्कि लम्बे समय तक महंगाई को भी काबू में रखा जाना संभव है। यहां यह बात याद आती है कि जब कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार में नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री डॉ. फारुक अब्दुल्ला ने लोकसभा में बताया था कि केंद्र सरकार पेट्रोल और डीजल के वैकल्पिक ईंधन के विकास पर काम कर रही है। अब्दुल्ला ने सतपाल महाराज के सवाल के लिखित जवाब में यह जानकारी देते हुए बताया था कि पेट्रोल और डीजल की आपूर्ति को पूरा करने की दृष्टि से बायो ईंधनों विशेष रूप से बायो इथेनॉल और बायो डीजल तथा हाइड्रोजन का उपयोग करने की संभावना का पता लगाने के लिए पहल की गई है। जिसमें कि दिसंबर 2009 में घोषित राष्ट्रीय बायो ईंधन नीति में वर्ष 2017 तक पेट्रोल के साथ बायो इथेनॉल और डीजल के साथ बायो डीजल के 20 फीसदी मिश्रण के लक्ष्य का प्रस्ताव किया गया है।
लेकिन, देखने में आज यह आ रहा है कि इस सरकार की ओर से इस प्रकार की कोई पहल की बात नहीं की जा रही, जो कि हमारी विदेशी तेल पर निर्भरता को कम कर सके। सरकार को देखना चाहिए कि प्राकृतिक संसाधनों के रूप में धनी हमारे देश में कई ऐसे विकल्प मौजूद हैं, जिन्हें अपनाकर तेल के आयात को सार्थक रूप से कम किया जा सकता है, इनमें सबसे प्रमुख और सबसे ज्यादा संभावना वाला विकल्प इथेनॉल है।

इथेनॉल एक तरह का अल्कोहल है, जिसे पेट्रोल में मिलाकर मोटर वाहनों में ईंधन की तरह उपयोग में लाया जा सकता है। इथेनॉल का उत्पादन मुख्य रूप से गन्ने से किया जाता है, जिसकी हमारे देश में प्रचुरता है। इथेनॉल को गन्ने के अलावा शर्करा वाली अन्य फसलों से भी तैयार किया जा सकता है जिससे कृषि और पर्यावरण दोनों को लाभ होगा। भारत सरकार ने 2002 में गजट अधिसूचना जारी करके देश के नौ राज्यों और चार केन्द्र शासित क्षेत्रों में एक जनवरी 2003 से पांच प्रतिशत इथेनॉल मिला कर पेट्रोल बेचने की मंजूरी दे दी थी। इसे धीरे-धीरे बढ़ाते हुए पूरे देश में दस प्रतिशत के स्तर तक ले जाना था, लेकिन अनेक नीतिगत और आर्थिक समस्याओं के कारण यह लक्ष्य अब तक पूरा नहीं हो पाया है।

इसकी संभावनाओं के बावजूद भारत अभी तक इथेनॉल उपयोग में कई छोटे देशों से पीछे है। जबकि ब्राजील में लगभग 40 प्रतिशत कारें सौ प्रतिशत इथेनॉल पर दौड़ रही हैं और बाकी मोटर वाहन 24 प्रतिशत इथेनॉल मिला पेट्रोल इस्तेमाल करते हैं। स्वीडन जैसे छोटे देश ने अपने यहां 1980 से ही इथेनॉल इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था, जिसके बलबूते उसने कच्चे तेल के आयात में लगभग 35 प्रतिशत की कटौती कर ली है। कनाडा भी आज इथेनॉल के इस्तेमाल पर सब्सिडी भी प्रदान कर रहा है।

इथेनॉल जैसा ही एक अन्य कारगर विकल्प बायोडीजल है। कुछ पौधों के बीजों में ऐसा तेल पाया जाता है जिसे भोजन के उपयोग में तो नहीं लाया जा सकता परन्तु इसे मोटर वाहनों में ईंधन की तरह सफलता से इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे पेट्रो-डीजल में आसानी से मिलाया जाना संभव है या डीजल इंजन में अकेले भी प्रयोग में लाया जा सकता है। देश के रतनजोत या जोजोबा, करंज, नागचंपा और रबर जैसे अनेक पौधों में बायोडीजल की संभावना मौजूद है। यह पौधे जंगली और बंजर भूमि पर आसानी से उगते हैं और इसे किसी विशेष देखभाल की जरूरत भी नहीं पड़ती। कुछ वर्ष पूर्व योजना आयोग ने जोजोबा की खेती और बायोडीजल के उत्पादन के लिए एक व्यापक योजना तैयार की थी जिसमें बायोडीजल की खरीद का प्रावधान था और किसानों को आर्थिक सहायता देने की सुविधा भी थी,परन्तु यह महत्वाकांक्षी योजना अब तक अपने लागू होने की बाट जोह रही है।

पेट्रोलियम के विकल्पों में प्राकृतिक गैस या सीएनजी जाना-पहचाना नाम है, जिसकी लोकप्रियता और उपयोग लगातार बढ़ता जा रहा है। देश में प्राकृतिक गैस भंडारों की कोई कमी नहीं है। फिलहाल वर्तमान उत्पादन स्तर पर इतनी गैस मौजूद है कि वह देश की लगभग 30 वर्ष तक मांग पूरा कर सकती है। सीएनजी का उपयोग देश के लिए पर्यावरण के नजरिये से तो लाभकारी है ही, उपभोक्ता के नजरिये से भी कम कीमत के कारण आकर्षक है।


भारत सरकार ने हाइड्रोजन ऊर्जा के विकास और उपयोग को बढ़ावा देने के लिए समयबद्ध योजना तैयार की है जिस पर पूरी ईमानदारी के साथ आज अमल की जरूरत है। पेट्रोलियम के सभी विकल्पों पर मिशन के तौर पर आगे बढऩा होगा, साथ ही कार्बन उत्सर्जन को कम करना भी हमारा एक लक्ष्य होना चाहिए, तभी तेल-दासता से मुक्ति के द्वार खुलेंगे। इसके लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है, जिसकी फिलहाल हमारे देश में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद भी कमी दिखाई दे रही है।