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सोमवार, 6 नवंबर 2017

मध्‍यप्रदेश में सूक्ष्म, लघु, मध्यम उद्यमों का होनेवाला राज्य-स्तरीय सम्मेलन ?

डॉ. मयंक चतुर्वेदी

प्रदेश में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम का राज्य-स्तरीय सम्मेलन 17-18 नवम्बर को भोपाल में आयोजित होने जा रहा है। इसे लेकर यहां तक तो ठीक है कि जिस परंपरा का आरंभ पिछले वर्ष ही राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ से जुड़े संगठन लघु उद्योग भारती के प्रयासों से हुआ है, उसे आगे सतत बनाए रखने के लिए इस वर्ष भी इस तरह का यह आयोजन राज्‍य में हो रहा है। सम्मेलन में आकर्षक प्रदर्शनी में राज्य के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमी अपने उत्पादों को प्रदर्शित करने के साथ ही वृहद उद्योगों एवं सार्वजनिक क्षेत्रों के उपक्रम भी यहां अपने स्टॉल लगाएंगे। सरकार उम्‍मीद कर रही है कि यह प्रदर्शनी वृहद उद्योगों एवं एमएसएमई उद्योगों के लिए एक ऐसा प्लेटफार्म होगा, जहाँ दोनों तरह की इकाइयों को आपसी संवाद के अवसर मिलेंगे। इन इकाइयों के बीच व्यापार की व्यापक संभावनाएँ बढ़ेंगी। किंतु जिस तरह की चिंताएं लघु उद्योग के सामने जीएसटी की जटिलता और राज्‍य में अब तक सिंगल विंडो सिस्टम पूरी तरह खड़ा न होने से बनी हुई है, ऐसे में क्‍या यह संभव है कि सरकार अपने जिन उद्देश्‍यों को लेकर यह आयोजन कर रही है वह सफल हो सकेगा ?

यहां राज्‍य सरकार प्रदेश में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम का राज्य-स्तरीय सम्मेलन करने के पूर्व उद्यमी विकास योजना प्रशिक्षण का शुभारंभ भी करने जा रही है, जिसमें कि प्रदेश के ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्र के शिक्षित युवाओं को स्वयं का उद्यम लगाने और उद्यमी बनाने के लिए एक माह का प्रशिक्षण दिया जाना है। प्रशिक्षण के बाद प्रदेश में प्रचलित योजनाओं के माध्यम से ऋण दिलाकर उद्यम स्थापित कराए जाने है। किंतु इस पर प्रश्‍न यही है कि क्‍या इन नए खोले गए उद्यमों की आगे चलते रहने की भी कोई गारंटी होगी ?  यदि जीएसटी में सूक्ष्म, लघु, मध्यम उद्यमों को ध्‍यान में रखकर आवश्‍यक सुधार जीएसटी कांउन्‍सिलिंग द्वारा नहीं किए जाते हैं तो सच यही है कि प्रदेश में हो रहा यह सम्‍मेलन अपनी पूर्णता को प्राप्‍त करनेवाला बिल्‍कुल नहीं है।

लघु उद्योग भारती के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष जितेंद्र गुप्‍ता, राष्‍ट्रीय उपाध्‍यक्ष डॉ. अजय नारंग और राष्‍ट्रीय सह महामंत्री सुधीर दाते जोकि मध्‍यप्रदेश के ही उद्यमी हैं, बार-बार केंद्र से लेकर राज्‍य सरकार के समक्ष सूक्ष्म, लघु, मध्यम उद्यमियों की चिंताओं को रख चुके हैं और निरंतर रख भी रहे हैं, लेकिन कहना यही होगा कि जितनी सफलता उन्‍हें अब तक मिलजानी चाहिए थी वह उनसे अभी भी बहुत दूर है।


वस्‍तुत: मध्‍यप्रदेश में ऐसे हज़ारों छोटे कारखाने हैं जिनकी सालाना कमाई 20 लाख से कम है और वे जीएसटी से बाहर हैं लेकिन वर्तमान में इन उद्योगों को कोई भी काम इसलिए देना नहीं चाहता क्योंकि इनके पास जीएसटी नंबर नहीं है। यदि यह जीएसटी का नंबर लेते हैं तो वह सरकारी व्‍यवस्‍था के झंझट में पड़ते हैं। जीएसटी में लेखा प्रणाली की जटिलता, बड़े उद्योगों के समान कर दर एवं इन्सेंटिव का बंद होना, कम्प्यूटर की अनिवार्यता जीएसटी रिटर्न में विभिन्न सूचनाएं जैसे स्टॉक विवरण, वेट वैल्यू, दोनों, विभिन्न प्रकार की सप्लाई में सप्लायर संबंधी अनेकों सूचनाएं बड़ी कम्पनियों के बराबर मांगी गई है। छोटे उद्यमियों के लिए इसकी एचसीएन कोड के अनुसार कर दरें समझ से परे हैं। अब तक छोटी इकाईयों के उत्पाद पर सरकार इन्सेंटिव के जरिये सहायता प्रदान कर रही थी, किंतु एक जुलाई से सभी छूट बंद हो चुकी है। वस्‍तुत: यह ऐसी बड़ी चुनौतियां हैं जिनके कारण से प्रदेश के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों पर आज संकट के बादल छाए हुए हैं। इसलिए यह जरूरी हो गया है कि  जीएसटी काउंसिल स्वयं संज्ञान लेकर राहत प्रदान करे।

सरकार को यह समझना होगा कि लघु उद्यमी वन मैन आर्मी होता है। जैसे सरकार ने इनकम टैक्स में 6 प्रतिशत नेट प्रोफिट दिखाने पर लेखा संबंधी छूट दी हुई है। इसी प्रकार जीएसटी में भी 15 प्रतिशत ग्रोस प्रोफिट दिखाने वाले लघु उद्यमियों को वेट और वैल्यू दोनों की जगह केवल वैल्यू आधारित विवरणी प्रस्तुत करने की छूट दी जाए। इस संबंध में यहां सीधा कहना है कि मध्‍यप्रदेश के वित्‍तमंत्री जयंत मलैया जीएसटी कांउन्‍सिल के सदस्‍य हैं, क्‍या वह सूक्ष्म, लघु, मध्यम उद्यमों के हित में केंद्र स्‍तर पर आवश्‍यक परिवर्तन कराएंगे ? यदि हां तो निश्‍चित ही इसका लाभ मध्‍यप्रदेश सहित समुचे देश को होगा।

देखाजाए तो सरकार को चाहिए कि वह इंटर स्टेट विक्रय को सरल बनाए, व्‍यवस्‍था ऐसी हो कि कम्पोजिट व्यवसायी भी अन्तरराज्यीय विक्रय कर सके। छोटे निर्माताओं को आरसीएम में छूट जारी रखी जाए। अंग्रेजी के साथ राष्ट्रीय भाषा हिन्दी में भी विवरणी का ऑप्शन हो ताकि छोटे उद्यमी भी स्वयं विवरणी भर सके। अत: यह आवश्‍यक हो जाता है‍ कि मध्‍यप्रदेश में पहले एक खड़की योजना पर शीघ्र अमल हो, जिससे कि एक ही स्‍थान से सूक्ष्म, लघु, मध्यम उद्यमों में आनेवाले लोग सरलता और सहजता से अपने सभी शासकीय कार्यों की खानापूर्ति करवा सकें। दूसरा यह कि मध्‍यप्रदेश के वित्‍तमंत्री जयंत मलैया एवं स्‍वयं मुख्‍यमंत्री जीएसटी की जटिलताओं पर ध्‍यान देकर केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उदाहरण सहित इससे जुड़ी समस्‍याओं से अवगत कराएं। एक देश एक कर कोई बुरा नहीं, किंतु इसमें पर्याप्‍त सुधार की आज भी आवश्‍यकता है। वस्‍तुत: तभी आगे चलकर इस तरह के प्रदेश में होनेवाले कार्यक्रमों की सफलता है, नहीं तो यह भी अन्‍य कई आयोजनों की तरह ही सिर्फ एक पूर्ति आयोजन बनकर ही रह जाएगा ? जिसका कोई भले ही राजनीतिक उद्देश्‍य निकलता हो लेकिन सामाजिक समृद्धि‍ तो कतई नहीं होगा।

मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हाल ही में  अमेरिका प्रवास से लौटे हैं, वे वहां एकात्म मानववाद की प्रासंगिकता पर व्याख्यान के लिये वहां आमंत्रित किये गये थे । उनके अनुसार अब दुनिया में एकात्म मानववाद का विचार ही आशा का केन्द्र है। पं. दीनदयाल उपाध्‍याय का यह दर्शन वह भी जानते हैं कि पूंजीवाद का समर्थन नहीं करता और विकास में पीछे छूट चुके अंतिम व्‍यक्‍ति की चिंता की सीख देता है। आज सोचनीय यही है कि क्‍या मध्‍यप्रदेश में सूक्ष्म, लघु, मध्यम उद्यमों के स्‍तर पर यह सोच दिखाई दे रही है ?

शनिवार, 7 अक्टूबर 2017

गौ-उवाच, प्रश्‍न खड़े करती है, संवाद का मर्म बताती है : डॉ. मयंक चतुर्वेदी


    गौ-के बारे में हम सभी अपने बचपन से कुछ जानते-समझते आए हैंवहीं कुछ लोगों को ये सौभाग्‍य भी मिला है कि वे उसके साथ वक्‍त गुजारतेकुछ ने तो अब भी गौ-सेवा को अपना लक्ष्‍य बना रखा है। इसलिए गाय माता को लेकर सबकी अपनी-अपनी अनुभूतियां हैं। प्राचीन वैदिक वांग्‍मय में गोमाता का सन्दर्भ 1331 बार आया है। जिसमें कि ऋग्वेद में 723 बारयजुर्वेद में 87 बारसामवेद में 170 बार और अथर्ववेद में 331 बार गौ का किसी न किसी रूप में स्‍मरण किया गया है। ऋग्वेद में कहा गया है कि जिस स्थान पर गाय सुखपूर्वक निवास करती है वहां की रजत पवित्र हो जाती है ।  अथर्ववेद में रुद्रों की मातावसुओं की दुहिताआदित्यों की स्वसा और अमृत की नाभि-संज्ञा से गौ को विभूषित किया गया है ।  वेदों में गाय के लिए गोधेनु और अघ्न्या ये तीन शब्द सबसे अधिक हैं । वेदों को समझने के लिये छः वेदांग शास्त्रों में से एक निरुक्त शास्त्र में वैदिक शब्दों के अर्थों को विस्‍तार से बताया गया है जिसे निर्वचन कहते हैंयहां हन हिंसायाम्’ धातु से हनति,  हान आदि शब्द बनते हैं जिसका अर्थ हिंसा करना मारना है।  गौ के लिए यहां अघ्न्या कहा गया है अर्थात् जिसकी कभी भी हिंसा न की जाये।

इसी प्रकार शतपथ ब्राह्मण में (7/5/2/34) में कहा गया है-सहस्रो वा एष शतधार उत्स यदगौ: अर्थात भूमि पर टिकी हुई जितनी जीवन संबंधी कल्पनाएं हैं उनमें सबसे अधिक सुंदरसत्यसरसऔर उपयोगी यह गौ है।  इसमें भी गाय को अघ्न्या बताया गया है। वस्‍तुत: यह वेदों में गाय का महत्व है।  सभी ऋषियों ने एक स्‍वर में बोला है कि गाय की हत्या नहीं करनी चाहिए। इस धरती पर विचरण करने वाले जीव-जन्तुओं में संभवत: गाय ही एकमात्र ऐसी है जिसे देवतुल्य व पूज्य माना गया है।

वेदों से आगे पुराणों एवं श्रीमद्भगवत गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने कामधेनु की महत्ता बताई है। केवल हिन्दू धर्म में ही नहींअन्य मत-पंथों में भी इसकी महत्ता और पवित्रता को स्वीकार किया गया है। गोसेवा को पुण्य कर्म माना गया है। ऐसी पापनाशिनीसमस्त जगत का कल्याण चाहने वाली गाय की धार्मिकआध्यात्मिक,सांस्कृतिकआर्थिक एवं औषधीय महत्ता को समेटे हुए और वर्तमान में गाय से जुड़े जनमानस के बीच के अंतर्विरोध को रेखांकित करती हुए पुस्तक 'गौ-उवाचडॉ. देवेन्‍द्र दीपक की एक श्रेष्‍ठ कृति है। कुल 30 कविताओं के माध्‍यम से पुस्तक में गाय की महत्ता का विस्तार से विवेचन एवं समाज की कमियों को प्रमुखता से उठाया गया है।  

डॉ. देवेन्‍द्र दीपक की पुस्‍तक गौ-उवाच अपने आप में वर्तमान समाजिक और प्रशासनिक व्‍यवस्‍था के साथ उस समुची प्रणाली के प्रति प्रश्‍न खड़े करती है जोकि गाय के प्रति दिखावे की संवेदना तो दिखाती हैंकिंतु व्‍यवस्‍था सुधार के लिए अपने ईमानदार प्रयत्‍न करते दिखाई नहीं देती है।

प्रश्‍न यह है कि वर्तमान में गौ भारतीयों के लिए क्‍या रही है पशुदूध देनेवाला यंत्र या इससे बहुत व्‍यापक भिन्‍न......गौ- वैदिक काल में देव... उत्‍तर वैदिक काल में माता... मध्‍यकाल में पशु.... और आधुनिक काल में ?स्‍वयं एक भोजन...मांस का लूथड़ाजिसकी चर्बीसींग और नाखूनों की कीमत उसकी देह से अधि‍क है। वस्‍तुत: यह पुस्‍तक हम सभी के बीच आज सोचने के लिए एक समान भावधारा पैदा करती है और विमर्श के लिए जमीन। इस पुस्‍तक की पहली कविता ही बहुत कुछ स्‍पष्‍ट कर देती है :

पक्षपात तुम करते होमैं नहीं करती...छुआ-छूत तुम मानते हो...मैं नहीं मानती...मुझे बीच में खड़ा कर ..तुम लड़ते हो...लड़ने-लड़ाने की शैली...तुम्‍हारी हैमेरी नहीं। पुस्‍तक राजनीतिक स्‍तर पर कांग्रेस जैसी राष्‍ट्रीय पार्टी से यह सवाल भी करती है कि क्‍या सोचकर तुमने..दो बैलों की जोड़ी को अपना चुनाव चिह्न बनाया ?..और क्‍या हुआ तुमने उसे छोड़ दिया पुस्‍तक देश के गद्दीदारों से पूछती है कि आखिर मेरे अपनत्‍व में कमी क्‍या रह गईजो वफा की उम्‍मीद अब तक अधूरी है। गौ-उवाच में वफा कविता में डॉ. देवेन्‍द्र ने बड़ी ही साफगोई से यह पूछा हैवह जो विदेशी था चला गया..ये जो देशज हैं.. यही तो अदल-बदल कर तख्‍त पर बैठे रहे...आरे के दांतों के नीचे.. हमारी गर्दन ज्‍यों की त्‍यों....हमारी चीख सुने कौन ?... प्राणों की भीख सुने कौन ?... दिल्‍ली की पंचायत अंधीबहरी... एक तरफा... हम गायों से कौन करे वफा ?.....

यहां गाय देश के कर्णधारों से सीधे पूछ रही है कि वे मुझे हिंसक नजरों से घूरते हैंमेरे प्रति घोर अवमानना है भीतर उनके.... वे ताल ठोककर कहते हैं....हम कुछ भी खाएं...यह हमारी मर्जी....कोई कौन होता है हमें टोकने वाला करुण कातर मैं टुकुर टुकुर देखती हूंमेरे भारत का यह कैसा संविधान इनके सब हैं अधिकारमेरे हित में क्‍या है समाधान गौ-उवाच में पंडित और ख्‍वाजा के सांकेतिक प्रतिरूपों के माध्‍यम से खासतौर पर इस पुस्‍तक में डॉ. देवेन्‍द्र दीपक  अवश्‍य यह पूछते दिखे कि अपने बुढ़ापे के लिए तुम्‍हें चाहिए अच्‍छी खासी पेंशन...हमारे लिए बूचड़खाने का दरवाजा... क्‍यों भाई पंडितक्‍यों भाई ख्‍वाजा ?...वास्‍तव में गाय का आज सबसे बड़ा दर्द यही है कि उसके बूढ़े होने के बाद सबसे ज्‍यादा उसे चारा और पानी देनेवाले ही दर दर भटकने के लिए छोड़ देते हैं।

यह पुस्‍तक बड़ी ही बेवाकी से यह भी पूछने का साहस करती है कि वह जो खाता है मेरा मांस बड़ा सहिष्‍णु है,वह जो पीता है मेरा दूध वड़ा असहिष्‍णु है। मेरे भारत को ये क्‍या हो गया हैन्‍याय और औचित्‍य कहां खो गया है ?..... इतना ही नहीं तो आज समाज और सरकार दोनों स्‍तरों पर इन दिनों समाजिक समरसता की बातें बहुत हो रही हैंऐसे में यहां गौ देश के आम जन से पूछती हैं कि बीफ को जलसे जलूस में धमक के साथ खाना मेरे प्रेमी भक्‍तों को खुले आम चिढ़ाना...समाजिक समरसता के विरुद्ध यह एक नियोजित अभियान है।

डॉ. दीपक बड़ी चतुरायी से अपनी इस पुस्‍तक में गंगा-जमुनी तहजीब पर भी सवाल खड़े करते हैंइस संयुक्‍त संस्‍कृति पर गाय यहां आम जन से जनना चाह रही है कि राजनीतिकलासंस्‍कृति और शिक्षासब मंचों पर दशकों से गंगा जमुनी तहजीब तकिया कलाम की तरह चलन में है...अगर सच ऐसा है तो अच्‍छी बात है। एक बात हमें कहनी है...सदा के लिए यह बात तय हो जानी चाहिए.. हमें बतादी जानी चाहिए- गंगा जमुनी तहजीब में हम गायों को क्‍या जगह है ?.... और जो जगह हैउसकी क्‍या वजह है ?....

वास्‍तव में यह एक ऐसा प्रश्‍न है जहां हमारा संविधान भी मौन है..इसी बात को डॉ. दीपक अपनी हित नामक कविता में भावनात्‍मक स्‍हायी से शब्‍दों को उकेरते हैं और पूछते हैं कि मेरा मांस खानेवालों के सर्वाधिकार सुरक्षितमेरा दूध चाहनेवालों के हितकौन करे संरक्षित...संविधान में दिए अधिकार सब कुछसंविधान में दिए कर्तव्‍य कुछ भी नहीं।..... वस्‍तुत: पुस्‍तक गौ-उवाच की हर कविता सीधे ह्दय को छूती हैभावनाओं में सागर सा वेग पैदा करती है और हर बार हर कविता कहती है कि अपनी मर्यादाओं को लांघ जाओगाय जैसी अमृता को जीवन दान देने के लिए अपना सर्वस्‍व होम कर जाओ।....

अंत में इस पुस्‍तक की कविता वर्तमान शासन तंत्र के प्रति अपनी कृतज्ञता तो ज्ञापित करती ही है साथ में स्‍वयं में भय से लिपटी प्रसन्‍नता का बोध कराती हैकवि‍ कहता है कि भारत में सदियों के बादकुछ अनुकूलता आई गौ वंश के लिए।... एक सुखद अध्‍याय हमारी मुक्‍ति के खण्‍डित इतिहास में फिर जुड़ा.... प्रमाण उस कोटि जन को जो हमारी रक्षा के लिए हवन हो गया खुशी खुशी।.. हमें न्‍याय मिला हम प्रसन्‍न हैं लेकिन हमारी यह प्रसन्‍नता लिपटी है भय के काले रुमाल में.... कहीं ये चार दिन की चांदनी तो नहीं?... हमारा इतिहास साक्षी है हमारे वध पर प्रतिबंध लगते रहे… प्रतिबंध निरस्‍त होते रहे….. क्‍या पता इतिहास अपने को फिर दोहराए,,,

यहां इस पुस्‍तक की सबसे अच्‍छी बात यह है कि बेरोजगारी के कोहराम के बीच गौ इस पुस्‍तक में आह्वान कर रही है कि मैं गाय हूं एक माय हूं अवैध बूचड़खाने वालों बच्‍चों के पेट का सवाल है,,,, मैं कहती हूं,….. मेरे पास आओ दूध डेयरी के धंधे में लग जाओ,….आज तुम दिनभर देखते हो खून ही खून….. फि‍र तुम दिन भर देखोगे दूध ही दूध....

पुस्‍तक में भाषा शैलीशब्‍द विन्‍यास का बहुत ध्‍यान रखा गया हैसामान्‍य रोजमर्रा के बोलते शब्‍दों में डॉ. देवेन्‍द्र दीपक के माध्‍यम से गौ यहां अपनी भावनाओं को व्‍यक्‍त कर रही है। यह पुस्‍तक न केवल पढ़ने के बाद उसकी शब्‍द ऊर्जा को अपने अंदर में समेटने के लिए विवश करती हैंबल्कि यथार्थ जीवन में गौ सेवा के लिए प्रवृत्‍त भी करती है। सही पूछिए तो यही इस पुस्‍तक की सफलता है और डॉ. देवन्‍द्र दीपक की कलम की धन्‍यता भी.....

लेखक हिन्‍दुस्‍थान समाचार बहुभाषी न्‍यूज एजेंसी के मध्‍यप्रदेश ब्‍यूरो प्रमुख एवं फिल्‍म सेंसर बोर्ड एडवाइजरी कमेटी के सदस्‍य हैं।

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री का हिन्‍दी प्रेम और ज्‍वलंत प्रश्‍न ? डॉ. मयंक चतुर्वेदी


ध्‍यप्रेदश की राजधानी भोपाल में आज हिन्दी दिवस पर समन्वय भवन में अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित हिन्दी दिवस कार्यक्रम रखा गया, जिसमें कि राज्‍य के संस्‍कृति विभाग का भी योगदान रहा । मुझे याद है कि हर वर्ष जब भी हिन्‍दी दिवस आता है हमारे मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान महोदय  का भाषण अत्‍यधिक प्रवाहपूर्ण उत्‍तेजनात्‍मक और श्रोताओं को आत्‍ममुग्‍ध कर देनेवाला होता है। हम भी जब जब इस आयोजन में उपस्‍थ‍ित रहे, ऐसा कभी नहीं हुआ कि मुख्‍यमंत्री बोलें औ तालियां न बजें। किंतु इस सब के बाद भी कुछ ज्‍वलंत प्रश्‍न हिन्‍दी और हमारे मुख्‍यमंत्री के साथ जुड़े हैं। जिनके उत्‍तर नहीं व्‍यवस्‍था में सुधार के साथ वह सभी व्‍यवहार में लागू होना चाहिए जिनकी कि हमारे मुख्‍यमंत्री हिन्‍दी दिवस पर वायदे एवं चर्चाएं करते रहे हैं। 

आज जो उनका भाषण था उसमें उन्‍होंने कहा है कि हिन्दी अत्यंत समृद्ध भाषा है। इसके प्रति संकीर्णता ठीक नहीं है। हिन्दी छोड़कर अंग्रेजी बोलना मानसिक गुलामी है। हिन्दी बोलने, लिखने और पढ़ने में गर्व होना चाहिए। हिन्दी का मान-सम्मान बढ़ाने के लिये समाज को भी आगे आना होगा। वहीं  निजी विश्वविद्यालयों को हिन्दी विभाग स्थापित करने के लिये निर्देशित किया जाएगा। प्रत्येक दो वर्ष में राज्य-स्तरीय हिन्दी सम्मेलन आयोजित करने की घोषणा भी उन्‍होंने की है । उन्होंने कहा है कि सरकार किसी भी भाषा का विरोध नहीं करती, लेकिन हिन्दी की कीमत पर अंग्रेजी का उपयोग ठीक नहीं है। मुख्‍यमंत्री के अनुसार अगले साल से हिन्दी दिवस का आयोजन भव्य होगा और इसमें सभी विश्वविद्यालय शामिल होंगे।

श्री चौहान ने आज यह भी कहा कि बाजारों में दुकानों पर नाम और सूचना पट्टिकाएं हिन्दी में लगाना अनिवार्य करने के लिये वैधानिक उपाय किये जाएंगे। हिन्दी की शक्ति, सामर्थ्य और क्षमता से समाज की नई पीढ़ी को अवगत कराने के लिये समाज के सहयोग से निरंतर अभियान चलाना पढ़ेगा। इस कार्यक्रम में मुख्‍यमंत्री अपनी विदेश यात्राओं के संस्‍करण सुनाने से भी नहीं चूके और कहा कि हर जगह हिन्दी में ही भाषण दिया और संवाद किया। राष्ट्रभाषा का उपयोग करने से उनकी प्रतिष्ठा भी बढ़ी और सराहना भी मिली। 

इस सब बातों के बीच जो अहम चिंता मेरी है वह यही है कि वर्ष 2015 में भोपाल में हुए अंतरराष्‍ट्रीय हिन्‍दी सम्‍मेलन में मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह ने घोषणा की थी कि हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय को वैश्‍विक स्‍तर का बनाएंगे । किंतु दो वर्ष बीत गए । वह अंतरराष्‍ट्रीय तो छोड़िए आज राष्‍ट्रीय स्‍तर का भी नहीं बन सका है। संसाधनों की कमी, धन का अभाव, प्रशासन की बेरूखी जैसी तमाम बातें हैं जिसके कारण से वह आज आगे ही नहीं बढ़ पा रहा है। पहले यहां कुलपति प्रो. मोहनलाल छीपा थे जो सदैव संसाधनों की कमी से परेशान थे किंतु आज यहां कुलपति प्रो. रामदेव भारद्वाज हैं, जिनके पास भी सरकार द्वारा इतने धन की व्‍यवस्‍था नहीं की गई है कि वे इस विश्‍वविद्यालय को राष्‍ट्रीय स्‍तर का भी बनाने की सोच सके। 

मेरी एक चिंता यह भी है कि अंतर्राष्‍ट्रीय हिन्‍दी सम्‍मेलन में हिन्‍दी के विकास के लिए संकल्‍प पत्र लाया गया था, उसमें कुछ सैद्धान्‍तिक एवं व्‍यवहारिक बातें अमल के लिए दी गई थीं। क्‍या सरकार पिछले दो सालों में भी उन पर प्रशासनिक स्‍तर पर अमल कराने में सफल रही है ? नहीं रही । हमारे मुख्‍यमंत्री बहुत अच्‍छे हैं, वह सोचते भी बहुत श्रेष्‍ठ हैं किंतु क्‍या उनकी प्रशासनिक मशीनरी को उनकी इच्‍छाओं को शतप्रतिशत अमल में नहीं लाना चाहिए ? अंत में उनसे आग्रह इतनाभर है कि अटल बिहारी वाजपेयी हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय श्रद्धेय सुदर्शनजी का एक वृहद स्‍वप्‍न का यथार्थ रूप है । वे भी एक स्‍वयंसेवक हैं, विद्यार्थी परिषद में उन्‍होंने देशसेवा और रीति-नीति का पाठ पढ़ा है। अत: वे श्रद्धेय सुदर्शनजी के इस यथार्थ स्‍वरूप के आकार एवं उसकी भव्‍यता में कोई कसर न छोड़े , इसके बाद यहां से निकले विद्यार्थी हिन्‍दी का भला स्‍वयं ही कर लेंगे । आज के दिन ये उम्‍मीद तो की ही जा सकती है ।   

शनिवार, 9 सितंबर 2017

साक्षरता में आगे बढ़ता मध्यप्रदेश : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

देश में इन दिनों तेजी के साथ मध्यप्रदेश आगे बढ़ रहा है, यदि आज इस राज्‍य के बारे में यह कहा जाए तो कुछ गलत ना होगा। पिछले साढ़े तेरह सालों में जिस तरह से यहां भाजपा की सरकार आने के बाद से लगातार एक-एक जनहितैषी विषय पर ध्‍यान दिया गया है और स्‍वयं मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कभी मध्‍यप्रदेश निर्माण, कभी संकल्‍प दिवस तो कभी विकसित मध्‍यप्रदेश की चाह में तेजी के साथ आगे बढ़ते रहने के लिए आम जन को प्रेरित कर रखा है, उससे अब लगने लगा है कि इस राज्‍य का जनसंख्‍या के घनत्‍व एवं विशालकाय होने के बाद भी आनेवाले दिनों में विकसित होना तय है। सही योजना फिर उसका सही क्रियान्‍वय हो जाए तो सकारात्‍मक लाभ दिखाई देते ही हैं। वस्‍तुत: यही आज मध्‍यप्रदेश में दिखाई दे रहा है।

हम सभी जानते हैं कि शिक्षा विकास की रीढ़ है, किसी भी देश या प्रदेश का व्‍यक्‍ति जितना अधिक शिक्षित एवं साक्षर होगा, वह अपने कल्‍याण के साथ अपने देश एवं समाज के पूर्ण विकास में अपना उतना ही अधिक योगदान दे सकता है। देखाजाए तो मध्‍यप्रदेश भी तेजी के साथ इस दिशा में आगे बढ़ता दिख रहा है। आज यही कारण है कि उसे भी देश के अन्‍य राज्‍यों के बीच 51वें अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस पर शिक्षा के क्षेत्र में तीन राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। वर्ष 2016-17 में मध्यप्रदेश में 24 लाख 61 हजार से अधिक प्रौढ़ निरक्षरों को प्रशिक्षण के बाद साक्षरता परीक्षाओं में सफलता प्राप्त हुई है तो वहीं राज्‍य के 31 सांसद आदर्श ग्रामों में लगभग 24 हजार प्रौढ़ निरक्षर नवसाक्षर बनकर सामने आये हैं।

नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित कार्यक्रम में उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू एवं केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को जब वर्ष 2017 के लिए साक्षर भारत अवार्ड वितरित करने थे, तब मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग में साक्षर भारत योजना में सर्वश्रेष्ठ कार्य करने वाले राज्य, जिला और राज्य संसाधन केन्द्र के लिए मध्यप्रदेश को पुरस्कृत किया जाना वस्‍तुत: वर्तमान में यह बताता है कि राज्‍य की मशीनरी आमजन के जीवन में शिक्षा की अलख जगाने में विशेषकर बहुसंख्‍यक आदिवासी समाज के जीवन में आधुनिकतम शिक्षा को सफलतापूर्वक पहुँचाने में सफल हो रही है। इस दिशा में देश के उपराष्‍ट्रपति एम.वेंकैया नायडू सही कहते हैं कि साक्षरता लोगों को अधिकार संपन्‍न और जीवन को बेहतर बनाने के लिए महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाती है। साक्षरता के आभाव में विकास के कोई मायने नहीं। हमें अभी लंबा रास्‍ता तय करना है, क्‍योंकि अभी लगभग 35 करोड़ युवा और वयस्‍क लोग साक्षर दुनिया से बाहर हैं।

केंद्रीय स्‍तर पर यदि देखें तो देश में 1947 में साक्षरता दर 18 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 81 प्रतिशत हो गई है। अगले वर्ष सरकार स्‍कूल चलो अभियान कार्यक्रम शुरू करेगी। इस प्रयास के तहत शेष 19 प्रतिशत साक्षरता विहीन आबादी को इसके दायरे में लाकर शत-प्रतिशत साक्षरता प्राप्‍त करने का लक्ष्‍य तय किया है। यह लक्ष्‍य 100 प्रतिशत डिजिटल साक्षरता सहित 2022 तक पूरा कर लिया जाएगा, जैसा कि प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी का सपना है इस संदर्भ में मध्‍यप्रदेश के आंकड़े बताते हैं कि इसी वर्ष के प्रारंभ में ही प्रदेश में चल रही साक्षर भारत योजना के जरिये 15 वर्ष से अधिक आयु समूह के व्यक्तियों को कार्यात्मक साक्षरता प्रदान करने की दिशा में राज्‍य ने 80 प्रतिशत साक्षरता दर प्राप्त किये जाने के प्रयासों में बहुत हद तक सफलता प्राप्‍त कर ली है। इस योजना में अब तक 40 लाख से अधिक व्यक्तियों को साक्षर किया जा चुका है। इसके लिए साक्षरता कार्यक्रम के क्रियान्वयन के लिये ग्राम पंचायत स्तर पर करीब 26 हजार प्रेरक नियुक्त किये गए, तो वहीं प्रदेश में 17 हजार 350 प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र संचालित किये जा रहे हैं। इन केन्द्रों के माध्यम से साक्षरता कक्षाएँ नियमित रूप से लगाये जाने का ही यह परिणाम है कि ग्राम पंचायत में महिला साक्षरता दर का प्रतिशत लगातार बढ़ रहा है।

वस्‍तुत: इसी के साथ यह आशा भी मुखर हुई है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में मध्यप्रदेश देश का नम्बर-1 राज्य अवश्‍य बनेगा, क्‍योंकि यहां विकास के सभी क्षेत्रों पर समानरूप से ध्‍यान दिया जा रहा है। आंकड़े देखें तो पिछले चार वर्ष से प्रदेश की कृषि विकास दर देश में सबसे अधिक है। मध्यप्रदेश में सड़कों के क्षेत्र में इतिहास रच गया है। सिंचाई में तेजी से विकास हो रहा है। उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेने पर सरकार द्वारा फीस की व्यवस्था की जा रही है। गरीब को मकान देने के लिये सरकार कानून बनाने जा रही है। वर्ष 2022 तक कोई भी गरीब प्रदेश में बिना मकान के नहीं रहेगा।

कुल मिलाकर ऐसे नवाचारी प्रयोग इन दिनों राज्‍य सरकार बहुतायत में कर रही है, जो आमजन के कल्‍याण से सीधे जुड़े हुए हैं, वास्‍तव में इन्‍हें देखकर यही कहा जा सकता है कि राज्‍य का आनेवाला समय हर मामले में उत्‍कृष्‍ट है। किंतु इसके साथ कुछ बाते हैं जिन पर अभी भी सरकार को अपना ध्‍यान बनाए रखने की जरूरत होगी, साक्षरता की दृष्टि से इसे अवश्य ही देखना चाहिए वर्तमान में प्रदेश में अशिक्षा के मामले में सिंगरोली, एवं छतरपुर जिले शीर्ष पर हैं। यहां सबसे ज्यादा क्रमशः 98 हजार के लगभग निरक्षर हैं। बड़वानी में 88 हजार, देवास में 87 हजार, सागर में 82 हजार निरक्षर हैं। ऐसे ही कुछ कम-ज्‍यादा सभी जिलों की स्‍थ‍िति है, निरक्षरों की सुची में सबसे कम निरक्षर दतिया जिले में है। यहां महज 9 हजार 380 लोग ही निरक्षर है। अत: इन सभी को देश के विकास में अपना पूर्ण योगदान दिए जाने के लिए साक्षर बनाना अति आवश्‍यक है।

गुरुवार, 10 नवंबर 2016

लोक मंथन की प्राचीन परंपरा और राष्‍ट्र : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

मंथन भारत का आधारभूत तत्‍व है, इसलिए विमर्श के बिना भारत की कल्‍पना भी की जाएगी तो वह अधूरी प्रतीत होगी। यहां लोकतंत्र शासन व्‍यवस्‍था की सफलता का कारण भी यही है कि वेद, श्रुति, स्‍मृति, पुराण से लेकर संपूर्ण भारतीय वांग्‍मय, साहित्‍य संबंधित पुस्‍तकों और चहुंओर व्‍याप्‍त संस्‍कृति के विविध आयामों में लोक का सुख, लोक के दुख का नाश, सर्वे भवन्‍तु सुखिन: और जन हिताय-जन सुखाय की भावना ही सर्वत्र दृष्‍टि‍गत होती है।

इसे इस रूप में भी देखा जा सकता है कि सत्‍ता की प्राप्‍ति और स्‍वयं के सुख एवं भोग की कामना से दुनिया में आज तक अनेक युद्ध हुए हैं। राज्‍य विस्‍तार और अपने विचार को ही सत्‍य मानकर दूसरे पर उसे थोपने के लिए लगातार प्रयत्‍न किए जाते रहे और जो आज भी यथावत किए जा रहे हैं। परिणामस्‍वरूप जिसके कारण विश्‍व से युद्ध एवं विनाश की लीला समाप्‍त होने का नाम नहीं ले रही है। किंतु इस सब के बीच भारत ने कभी सुख की कामना से न कभी पहले किसी अन्‍य देश पर आक्रमण किया और न हीं 1947 बाद अस्‍तित्‍व में आए राज्‍यीय अवधारणाओं के नवीन भारत ने किसी देश पर अपना विचार थोपा। बल्कि जो संविधान ने अंगीकार किया, उसमें सभी के लिए समादर और पंथ निरपेक्ष की भावना समाहित की गई । यानि एक राज्‍य के रूप में भारत सभी विचारधाराओं का समान आदर करेगा, ऐसा नहीं होगा कि वह किसी विशेष का ही सहचर बन जाए। अपने आचरण से भारत ने यह बात सिद्ध भी की है। भारत बहुवचनीय अर्थों में अपने लोक से, जनता से, आवाम से, जन समूह से यही कामना करता है कि –

“विविध पंथ, मत दर्शन अपने,

भेद नहीं वैशिष्‍ट्य हमारा, 

एक-एक को ह्दय लगाकर,

विराट शक्‍ति प्रगटाओ।

वस्‍तुत: चेतना का विस्‍तार ही भारत का लक्ष्‍य है, और इसके लिए भारत बार-बार विमर्श का आह्वाहन करता रहा है। इस बार ऐसा ही एक विमर्श विशद् रूप  में लोकमंथन के नाम से भोपाल में हो रहा है। विमर्श की परंपरा को आप ऋग्‍वेद काल से ही सतत देख सकते हैं। उस समय में हुए महर्षि पाणिनी, पतंजलि व महर्षि यास्क जैसे वेदों के विश्रुत विद्वानों ने अपनी ज्ञान साधना, प्रतिभा एवं पुरूषार्थ के बल पर अष्टाध्यायी, महाभाष्य एवं निरूक्त आदि अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों का प्रणयन किया। इनमें निरुक्त वैदिक साहित्य के शब्द-व्युत्पत्ति (etymology) का विवेचन करता है । निरुक्त में शब्दों के अर्थ निकालने के लिये छोटे-छोटे सूत्र दिये हुए हैं। इसके साथ ही इसमें कठिन एवं कम प्रयुक्त वैदिक शब्दों का संकलन (glossary) भी है।

ऋग्वेदभाष्य भूमिका में सायण ने कहा है ‘अर्थावबोधे निरपेक्षतया पदजातं यत्रोक्तं तन्निरुक्तम्’ अर्थात् अर्थ की जानकारी की दृष्टि से स्वतंत्ररूप से जहाँ पदों का संग्रह किया जाता है वही निरुक्त है। वैदिक शब्दों के दुरूह अर्थ को स्पष्ट करना ही निरुक्त का प्रयोजन है। पाणिनि शिक्षा में "निरुक्त श्रोत्रमुच्यते" इस वाक्य से निरुक्त को वेद का कान बतलाया है। संस्कृत के प्राचीन वैयाकरण (grammarian) यास्क को इसका जनक माना गया है। वे एक स्‍थान पर पत्‍नि की व्‍याख्‍या करते हुए लिखते हैं कि जो पति को पतन से बचाए वह पत्नि है। इसी प्रकार एक अन्‍य स्‍थान पर महर्षि यास्‍क तर्क के महत्‍व को शब्‍दों से प्रस्‍तुत करते हैं, जो विविध पक्षों का अवलम्‍बन करते हुए चेतना के विस्‍तार तक जाता है। यानि कि शब्‍दों के इस महत्‍व को भारतीय ऋषियों ने जानकर उसके निर्माण और उसके व्‍यवहार पर सदियों पूर्व ही जोर देना आरंभ कर दिया था। इस प्रकार शब्‍दवार संस्‍कृत और उससे निकली जितनी भी भारतीय भाषाएँ हैं, सभी को देखा जा सकता है, हर शब्‍द और वाक्‍य का अपना महत्‍व और गूढ़ अर्थ है।

लोक को भी हम इस संदर्भ में देख सकते हैं। यह लोक देश की जनता का प्रतिनिधित्‍व करता है, यह देश की चेतना का आधार है, यही लोक शब्‍द वह शब्‍द है जो हमें स्‍वयं से दूसरे के साथ परस्‍पर एकाकार करने में हमारी मदद करता है। इसलिए लोक से बना लोकमंथन, सही मायनों में  ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ (Nation First) की सघन भावना से ओतप्रोत विचारकों, अध्येताओं और शोधार्थियों के लिए आपसी संवाद का तानाबाना बुनने के लिए एक मंच के रूप में आज प्रकट हुआ है, जिसमें देश के वर्तमान मुद्दों पर विचार-विमर्श और मनन-चिन्तन किया जायेगा।

वेद का मंत्र भी यही कहता है कि सं गच्छध्वं सं वदध्वं, सं वो मनांसि जानताम् । देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते ।। - ऋग्. १०.१९१.२। अर्थात् (हे जना:) हे मनुष्यो, (सं गच्छध्वम्) मिलकर चलो । (सं वदध्वम्) मिलकर बोलो । (वः) तुम्हारे, (मनांसि) मन, (सं जानताम्) एक प्रकार के विचार करे । (यथा) जैसे, (पूर्वे) प्राचीन, (देवा:) देवो या विद्वानों ने, (संजानाना:) एकमत होकर, (भागम्) अपने - अपने भाग को, (उपासते) स्वीकार किया, इसी प्रकार तुम भी एकमत होकर अपना भाग स्वीकार करो ।

सीधे-सीधे इसे इस अर्थ से समझें कि (हे मनुष्यों) मिलकर चलो । मिलकर बोलो । तुम्हारे मन एक प्रकार के विचार करें । जिस प्रकार प्राचीन विद्वान एकमत होकर अपना-अपना भाग ग्रहण करते थे, (उसी प्रकार तुम भी एकमत होकर अपना भाग ग्रहण करो) । वास्‍तव में यही संगठन का और परस्पर संवाद का वह मंत्र है जिसके माध्‍यम से लोक अपने अस्‍तित्‍व को साक्षात प्रकट करता है। इसलिए भोपाल में होने जा रहे लोकमंथन आयोजन से यह विश्‍वास स्‍वत: ही दृढ़ होता है कि इसमें शामिल हो रहे बुद्धिजीवियों, चिन्तकों, मनीषियों, अध्येताओं के परस्पर विचार-विमर्श से भारत के साथ विश्व को नई दृष्टि मिलेगी। यह तीन दिवसीय विमर्श गहरी वैचारिकता की वजह से हमारे राष्ट्र के उन्नयन में सहायक सिद्ध होगा। समता, संवेदनात्मकता, प्रगति, सामाजिक न्याय, सौहार्द्र और सद्भाव की आकांक्षा राष्ट्रीयता के मूलमंत्र है। इसी भावना के साथ सामाजिक बदलाव और समाज का विकास इस राष्ट्रीय विमर्श का जो मूल उद्देश्य है, वह साकार रूप में आकर पूर्णत: सिद्ध होगा ।

लोकमंथन का उद्देश्य है राष्ट्रीय संकल्पना की स्थापना

राष्ट्र सर्वोपरि के विचार से ओतप्रोत विचारकों और कर्मशीलों का तीन दिवसीय राष्ट्रीय आयोजन लोकमंथन 12 से 14 नवम्बर तक विधानसभा परिसर, भोपाल में आयोजित हो रहा है। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में आयोजित इस आयोजन की विशेषता है कि इसमें राष्ट्र निर्माण में कला, संस्कृति, इतिहास, मीडिया और साहित्य की भूमिका पर विमर्श किया जाएगा।   

लोकमंथन का उद्देश्य है कि राष्ट्र निर्माण को लेकर अब तक बनी पश्चिम परस्त अवधारणा को दूर कर भारत के इतिहास, कला, विज्ञान, संस्कृति, भूगोल और मनोविज्ञान को यूरोपीय आस्थावाद से बाहर निकालकर राष्ट्रीयता की संकल्पना की स्थापना की जाए।  नवउदारवाद और वैश्वीकरण के मौजूदा दौर में राष्ट्रीयता का देशज या यूँ कहें कि शुद्ध भारतीय पाठ तैयार करने की योजना है।लोकमंथन में मीडिया, कला, संस्कृति, इतिहास, साहित्य और अन्य क्षेत्रों से जुड़े स्वतंत्र विचारक और चिंतक शामिल होने वाले हैं। 

लोक मंथन के दो हिस्से रहेंगे- मंच और रंगमंच। मंच से विभिन्न विषयों पर विचारक विमर्श करेंगे। उसी दौरान रंगमंच के जरिए कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन कर राष्ट्रीय भावना को प्रकट करेंगे। कार्यक्रम का उद्घाटन 12 नवम्बर को सुबह 10 बजे रहेगा, इसके बाद तीन दिन तक विभिन्न विषयों पर गहन विमर्श किया जाएगा। आगे लोकमंथन को वार्षिक कार्यक्रम का स्वरूप भी दिया जाएगा। उक्‍त सभी बातें लोकमंथन आयोजन समिति के महासचिव जे. नंदकुमार द्वारा बताई गई हैं। 

अकेला कश्मीर भारत के लिए खतरनाक : उन्होंने बताया कि अलग-अलग पहचान महत्वपूर्ण हैं, उनका स्वागत होना चाहिए। लेकिन, भारत के बाहर उनकी कल्पना ठीक नहीं। कश्मीर हो या केरल, सबकी स्वतंत्र पहचान का सम्मान है, क्योंकि इनके बिना भारत पूर्ण नहीं है। लेकिन, भारत के बाहर जाकर अकेला कश्मीर खतरनाक है। लोकमंथन में सभी प्रकार की अस्मिता के प्रश्नों पर गंभीरता से मंथन किया जायेगा।

देश तोड़ने का प्रयास कर रही है 'ब्रेकिंग इंडिया ब्रिगेड' : लोक मंथन आयोजन समिति के महासचिव जे. नंदकुमार का कहना यह भी है कि आजकल कुछ लोग देश को तोड़ने के सूत्र खोज रहे हैं। इस 'ब्रेकिंग इंडिया ब्रिगेड'का एजेंडा है कि कैसे देश को नुकसान पहुँचाया जाए। इसके लिए वह हर संभव प्रयास कर रहे हैं। लेकिन,उनका सफल होना असंभव है। क्योंकि, देश के सामान्य व्यक्ति के जीवन में भी राष्ट्रीयता प्रकट होती है। सामान्य लोग देश को एकसूत्र में बाँधकर रखे हुए हैं। उन सामान्य लोगों के जीवन में कैसे राष्ट्र प्रकट होता है, इसी पर लोक मंथन में विमर्श होगा।

'औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति' लोकमंथन का केंद्रीय विषय है। इसलिए यह अपने तरह का पहला आयोजन है। लोकमंथन में शामिल होने आ रहे देश-दुनिया से प्रख्यात विचारक और रचनाधर्मियों के परस्पर विचार-विमर्श से भारत के साथ विश्व को नई दृष्टि मिलेगी। यह तीन दिवसीय विमर्श गहरी वैचारिकता की वजह से हमारे राष्ट्र के उन्नयन में सहायक सिद्ध होगा। समता, संवेदनात्मकता, प्रगति, सामाजिक न्याय, सौहार्द्र और सद्भाव की आकांक्षा राष्ट्रीयता के मूलमंत्र है। इसी भावना के साथ सामाजिक बदलाव और समाज का विकास इस राष्ट्रीय विमर्श का मूल उद्देश्य है।
            
लोकमंथन का आयोजन मध्यप्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग, भारत भवन और सामाजिक वैचारिक संस्था प्रज्ञा प्रवाह के संयुक्त आयोजन में किया जा रहा है। लोकमंथन में शामिल होने के लिए देशभर से लगभग 800 प्रतिभागी आ रहे हैं। मध्यप्रदेश की राजधानी में तीन दिन 'लघु भारत' के दर्शन होंगे। ऑनलाइन पंजीयन के जरिए लोकमंथन में शामिल होने वाले प्रतिभागियों में अधिकतर 40 वर्ष से कम आयु के युवा हैं। वहीं, विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ के तौर पर 130 से अधिक विद्वान भी इसमें शामिल हो रहे हैं। यह सभी जानकारियां लोकमंथन आयोजन समिति के महासचिव जे. नंदकुमार, भारत नीति प्रतिष्ठान के मानद निदेशक प्रो. राकेश सिन्हा और आयोजन समिति के संयोजक दीपक शर्मा केद्वारा मीडिया के सम्‍मुख बताई गई हैं।
       

रविवार, 10 जुलाई 2016

शिवराज जी, मध्यप्रदेश पुलिस में बढ़ते गुण्डाराज को रोकिए

मध्यप्रदेश पुलिस की छवि वैसे तो सहयोगात्मक है, यदि अन्य राज्यों की पुलिस के साथ मध्यप्रदेश पुलिस की तुलना की जाए तो भी राज्य की पुलिस का ओहदा खासकर जनता जनार्दन को दिए जाने वाले अपने सहयोग के मामले में अव्वल ही प्रतीत होता है। किंतु जिस तरह से पिछले कुछ महीनों से यहां पुलिस और जनता के बीच घटनाएँ घट रही हैं, उनको देख और सुनकर लगता है कि अब यह बीते दिनों की बात होने वाली है। देश में जैसे उत्तरप्रदेश, बिहार राज्यों की पुलिस अपने कार्यों को लेकर बदनाम है, वैसे ही प्रदेश में घट रहीं हालिया घटनाओं से मध्यप्रदेश पुलिस पर भी उसी प्रकार बदनामी के आरोप लग रहे हैं।  इसे और क्या कहा जाए कि राजधानी जहां स्वयं मुख्यमंत्री, गृहमंत्री से लेकर तमाम अफसरशाही निवास करती है, वहाँ इस तरह की घटनाएं हों। पुलिस देर रात अपने घर जा रहे पत्रकारों का नाम सिमी जैसे आतंकी संगठन के साथ जोडकऱ उनके साथ दुरव्यवहार करे।

पत्रकार विजय प्रभात शुक्ला और कृष्णमोहन तिवारी को पुलिस द्वारा पूरी रात थाने में ले जाकर पीटा गया, उनसे कहा गया कि तुम दोनों सिमी के आतंकी हो, एटीएम उखाडऩे आए थे। करीब ढ़ाई घंटे तीन पुलिसकर्मियों ने दोनों को लात-घूंसों और डंडों से इतना मारा कि पीडि़तों को जेपी अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। यह भी अच्छा हुआ कि घटना की ऑडियो रिकॉडिंग मौजूद है, क्योंकि जब यह घटना हो रही थी, तभी किसी तरह कृष्णमोहन तिवारी ने अपने मोबाइल की रिकॉडिंग चालू कर ली थी। जिसमें साफ सुनाई दे रहा है कि पुलिसकर्मियों ने किस तरह बर्बरता की है। नहीं तो हो सकता है कि पुलिस कर्मचारी अपने साथियों को बचाने के लिए पत्रकारों पर मड़े आरोपों को सही ठहराने के लिए जुट जाती।

अब भले ही बात जब मीडिया तक पहुँची तो उन पुलिस कर्मियों पर कार्रवाही की गई है, लेकिन प्रश्र यह है कि ऐसी परिस्थितियाँ बनी ही क्यों? क्या पुलिसवालों को यह समझ में नहीं आता कि कौन गुण्डा है और कौन शरीफ ? जब वे अपना परिचय पत्र दिखा रहे थे तो क्यों नहीं भरोसा किया गया। चलो, मान लेते हैं कि परिचय पत्र झूठे हो सकते हैं, तो क्या उनके ऑफिस के फोन नम्बर पर या उनके सम्पादक का नाम और मोबाइल नंबर लेकर इन पुलिसवालों को नहीं पूछना चाहिए था कि हकीकत क्या है? ये सही में तो सही नहीं बोल रहे। लेकिन पुलिस की ओर से ऐसा कुछ नहीं किया गया। क्यों कि शराब में जो धुत थे ये पुलिस कर्मी।

सोचने वाली बात यह है कि जब टीव्ही में पुलिस के प्रयासों का अपराधियों को पकडऩे से संबंधित फिल्मांकन दिखाया जाता है, तब उसे देखकर यही लगता है कि पुलिस जनता की सही मायनों में हमदर्द है। पीडि़त के लिए पुलिस वाले भी किसी चिकित्सक की तरह भगवान से कम नहीं हैं। अपने अथक प्रयत्नों से पीडि़त पक्ष को इंसाफ  दिलाते ही हैं, किंतु इस तरह की घटनाएँ वास्तव में आम जनता के विश्वास को तोडऩे का कार्य करती हैं। जनता कम से कम पुलिस से तो यह उम्मीद कतई नहीं करती कि रक्षक ही उसके लिए भक्षक बन जाएं।

प्रदेश पर यदि पिछले कुछ माह और साल पर नजर डाली जाए तो यह बखूबी स्पष्ट हो जाता है कि पुलिस कर्मियो और  आम जनता के बीच इस तरह के मामलों में बढ़ोत्तरी हुई है। पिछले माह इंदौर में पुलिस ने आरएसएस की शाखा में जाने वाले दो बच्चों की बुरी तरह पिटाई कर दी थी। बाद में इससे गुस्साए संघ कार्यकर्ताओं ने हीरा नगर थाने का घेराव कर दिया था। पुलिसवालों पर आरोप था कि शाखा में शामिल होने वाले बच्चे मुकुल व आकाश को थाने पर पदस्थ दो पुलिसकर्मियों ने रोककर पीटा।


ऐसा ही एक मामला गोहद पुलिस से जुड़ा है, जहां मंत्री को खुद हस्तक्षेप करना पड़ा था। यहां वार्ड 3 घनश्याम पुरा में एक पिता ने पुलिस पर बेटे के साथ मारपीट करने का आरोप लगाते हुए राज्यमंत्री लालसिंह आर्य से शिकायत की थी।  पीडि़त परिवार राज्यमंत्री श्री आर्य से शिकायत करने पहुंचा तो श्री आर्य ने अपनी गाड़ी में घायल युवक को बिठाकर तुरंत अस्पताल में एडमिट कराया। पिता ने बताया था कि उनका बेटा घर के बाहर नीम के पेड़ के नीचे बैठा था तभी पुलिस ने उसके साथ बेरहमी के साथ मारपीट कर दी, बिना यह जाने कि उसने कोई अपराध किया भी है या नहीं।

भोपाल में घटी यह घटना भी लोगों के जहन से अभी नहीं निकली है, जिसमें कि गोविंदपुरा इलाके में नशे में धुत एक पुलिसकर्मी ने एक अंधे बुजुर्ग को बेरहमी से पीटा था। कसूर बस इतना था कि उसका धक्का पुलिसकर्मी को लग गया था। पुलिस वाले ने बुजुर्ग को जमीन पर पटककर लात-घूसों और छड़ी से बुरी तरह मारा था।  बुजुर्ग को पिटता देख आसपास के लोग जमा हो गए और एंबुलेंस को सूचना दी। एंबुलेंस घायल को जेपी अस्पताल ले गई थी। इसके बाद भी थाना पुलिस ने मामला दबाने के लिए बुजुर्ग पर दबाव तक बनाया।

वर्ष 2014 में ऐसा ही मीडिया कर्मी से जुड़ा मामला भोपाल में सामने आया था जिसमें कि  टीटी नगर पुलिस थाने में कवरेज के दौरान एक मीडियाकर्मी से पुलिसकर्मियों ने मारपीट शुरू कर दी थी। घटना के वक्त एक महिला सुनवाई नहीं होने से परेशान होकर आत्मदाह का प्रयास कर रही थी और इसी दौरान मीडियाकर्मी अजय वर्मा वहां कवरेज कर रहे थे। अजय को पुलिस कर्मी घसीटते हुए थाने के अंदर ले गए, जहां उनसे मारपीट की गई। इसके कारण अजय की हालत इतनी बिगड़ी कि जेपी अस्पताल में उन्हें आईसीयू तक में भर्ती किया गया। इसी वर्ष शिवपुरी में पुलिस की बर्बरता सामने आई जब महिला की जमकर पिटाई कर दी गई। मामला यह था कि प्रदेश के करेरा कस्बे के पास खैराकोटिया गांव की महिलाएं सडक़ जामकर एक व्यक्ति की हत्या का मामला दर्ज कराने के लिए प्रदर्शन कर रही थीं। तभी एक पुलिस अधिकारी ने अपना आपा खो दिया और एक महिला की जमकर पिटाई कर डाली। यह पूरा वाकया कैमरे पर कैद हो गया। जिसे बाद में पूरे प्रदेश ने देखा।

इस साल की एक घटना का यहां जिक्र करना और उचित होगा। इंदौर में पुलिस का ऐसा बर्बर चेहरा उजागर हुआ, जिस पर सामान्यत: कोई भरोसा नहीं करता लेकिन इन पुलिसवालों की करतूत घर में लगे सीसीटीवी में कैद हो गयी थी। घर के अंदर लगे सीसीटीवी में दो पुलिस वाले घर में घुसकर एक युवक को बेरहमी से पीटते दिखाई दिए। घटना अन्नपूर्णा थाना इलाके के वैशाली नगर की है। जहां दोपहर में विनोद दूबे अपने परिचित के घर मातम में शामिल होने पहुंचे थे। वह कार पार्क कर उनके मकान में घुस ही रहे थे कि तभी राजेन्द्र नगर थाने में पदस्थ आरक्षक संजीव यादव और यशवंत गहलोत वहां पहुंचे। दोनों ने विनोद के साथ गाली गलौच करते हुए मारपीट शुरू कर दी। दोनों सिपाहियों ने उस पर इस तरह से हमला किया जैसे वह कोई बड़ा अपराधी हो या किसी संगीन जुर्म को अंजाम देकर फरार हो गया हो। देर रात पुलिस ने थाने से उसे मुचलके पर छोड़ा। इसमें जानना चाहिए कि विनोद का कसूर क्या था?

विनोद ने बताया कि वैशाली नगर जाते हुए रास्ते में उसकी कार से एक बाइक को हल्की सी कट लग गई थी, लेकिन न तो बाइक का कुछ नुकसान हुआ था और न किसी को चोट लगी थी। इसी बात पर बिनोद को बेरहमी से पीटा गया। हालांकि हकीकत सामने आने के बाद दोनों पुलिसवालों को सस्पेंड कर दिया गया। लेकिन प्रश्न यही है कि ऐसी स्थितियाँ बनती हीं क्यों हैं? पुलिस क्यों आम नागरिकों को अपने निशाने पर लेती है।

इसका मतलब यह नहीं कि पुलिस को उसकी तहकीकात से कोई रोकना चाहता है। पुलिस अपना काम करे, जरूर करे, अपनी ओर से संदेह होने पर जांच-पड़ताल में कोई कसर न छोड़े, किंतु अपनी तहकीकात करते समय यह भी देख ले कि जिसे वह सजा देने जा रही है या संदेह जता रही है,  सही मायनों में वह अपराधी है भी कि नहीं।

मुख्यमंत्रीजी, समय रहते पुलिस की इस कार्यप्रणाली को सुधारिए, कहीं ऐसा न हो कि बिहार में नीतीश सरकार के जंगलराज की तरह मध्यप्रदेश में भी कुछ दिनों में असामाजिकता, विशेषकर पुलिस महकमें में हावी हो जाए, और इस प्रकार निर्दोशों के साथ किया जाने वाला पुलीसिया आचरण आपके लोकप्रशासन पर प्रश्र चिह्न खड़ा करता रहे।