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शनिवार, 4 नवंबर 2017

आर्थ‍िक मोर्चे पर प्रधानमंत्री

: डॉ. मयंक चतुर्वेदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय अर्थव्यवस्था में सुस्ती को लेकर प्रतिपक्ष एवं अपनी पार्टी के कुछ नेताओं द्वारा लगाए गए आरोपों का जिस तरह से एक के बाद एक उत्‍तर दिया हैउसके बाद उन सभी लोगों को अवश्‍य ही यह समझ जाना चाहिए कि केंद्र की भाजपा सरकार मोदी नेतृत्‍व में जो भी निर्णय ले रही हैवह देश को स्‍थायी शक्‍ति सम्‍पन्‍न एवं अर्थ व्‍यवस्‍था की दृष्‍ट‍ि से मजबूत बनाने वाले ही हैं। सच यही है कि केंद्र में मोदी सरकार अपने कार्यकाल के पहले दिन से ही राष्‍ट्र को हर मोर्चे पर तकतवर बनाने की दिशा में स्‍थायी कार्य कर रही है ।

आज विपक्ष जो केंद्र पर सबसे बड़ा आरोप लगा रहा हैवह है कि देश की अर्थव्‍यवस्‍था पटरी से नीचे उतर गई हैजिसके कारण से रोजगार के अवसर कम हुए है। जीडीपी का बुरा हाल है। महंगाई चरम पर है। इस बार इन सभी आरोपों के उत्‍तर प्रधानमंत्री ने पॉवर प्वाइंट प्रजेंटेशन के सहारे देकर अपने आलोचकों को बिन्दुवार जवाब देने का प्रयास किया है। इस प्रस्‍तुतिकरण में प्रधानमंत्री मोदी ने कई पैरामीटर्स का जिक्र किया हैजिससे कि वर्तमान में देश की अर्थव्यवसथा की मजबूत स्थितिसरकार की निर्णय शक्ति और विकास की दिशा और गति को साक्ष्‍य सहित समझाया जा सके।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आलोचकों से प्रश्‍न किया है कि क्या ऐसा पहली बार हुआ है जब देश के जीडीपी की वृद्धि किसी तिमाही में 5.7 प्रतिशत पर पहुंची है पिछली सरकार में छह साल में आठ बार ऐसे अवसर आए,जब विकास दर 5.7 प्रतिशत या उससे नीचे गिरी थी। इतना ही नहीं तो देश की अर्थव्यवस्था ने ऐसी तिमाही भी देखी हैं जब विकास दर 0.2 प्रतिशत और 1.5 प्रतिशत थी और उस समय भारत की मुद्रास्फीति और चालू खाते का घाटा भी अधिक था। पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के कार्यकाल में अर्थव्यवस्था की स्थिति इतनी नाजुक हो गई थी कि भारत को "फ्रेजाइल फाइव" ग्रुप का सदस्य कहा जाने लगा था। उस समय बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों के रहते ऐसा कैसे हो गयाहमारे देश में जीडीपी से ज्यादा महंगाई की दर थी और बढ़ते राजकोषीय घाटे तथा बेकाबू चालू खाते के घाटे पर ही चर्चा होती थी।

प्रधानमंत्री ने यूपीए और एनडीए सरकार के तीन सालों के कार्यकाल की कुछ इस तरह से तुलना प्रस्‍तुत की कि उसे पढ़ लेने के बाद कोई यह नहीं कह सकताकि इस सरकार में देश आर्थ‍िक सुधारों की ओर अग्रसर न होकर एक पल के लिए भी अर्थ की कमजोर स्‍थ‍िति में आया दिखाई दिया हो। तुलनात्‍मक रूप से देखे तो पिछली सरकार के आखिरी तीन सालों में गांवों में 80 हजार किलोमीटर सड़क बनी थी और वर्तमान सरकार ने तीन साल में 1 लाख 20 हजार किलोमीटर सड़क बनाई है। यानि 50 प्रतिशत से ज्यादा ग्रामीण सड़कों का निर्माण हुआ है। पिछली सरकार आखरी के तीन साल में 15 हजार किलोमीटर राष्‍ट्रीय राजमार्ग बनाने के काम कियाजबकि भाजपा सरकार ने अपने तीन साल के कार्यकाल में 34 हजार किलोमीटर से ज्यादा राष्‍ट्रीय राजमार्ग बनवाया है।

इसी तरह रेलवे सेक्टर में पिछली सरकार के आखिरी तीन वर्षों में लगभग 1100 किलोमीटर नई रेल लाइन का निर्माण हुआ था और भाजपा शासन में 2100 किलोमीटर से ज्यादा तक पहुंच गए । वहीं इतने समय में पिछली सरकार ने 1300 किलोमीटर रेल लाइनों का दोहरीकरण किया तो मोदी सरकार में 2600 किलोमीटर रेल लाइन का दोहरीकरण किया गया है। पिछली सरकार के आखिरी के तीन वर्षों में 1 लाख 49 हजार करोड़ का पूंजीगत व्यय किया था तो इतने ही वर्षों में लगभग 2 लाख 64 हजार करोड़ रुपए का पूंजीगत व्यय एनडीए के कार्यकाल में संभव हुआ है । नवीकरणीय ऊर्जासौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा क्षेत्र में पिछली सरकार के बीते तीन वर्षों के कुल कार्यकाल में 12 हजार मेगावॉट की नई क्षमता जोड़ने के स्‍थान पर आज  इतने ही समय में 22 हजार मेगावॉट से ज्यादा ऊर्जा की नई क्षमता को ग्रिड पावर से जोड़ने में मोदी सरकार सफल रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि देश में विमुद्रीकरण के बाद सकल घरेलू उत्पाद अनुपात नकद में  नौ प्रतिशत आ गया हैजबकि यह पहले 12 प्रतिशत था । 10 प्रतिशत से ज्यादा की मुद्रास्फीति कम होकर अब इस साल औसतन 2.5 प्रतिशत पर आ गई है। केंद्र सरकार अपना राजकोषीय घाटा पिछली सरकार के 4.5% प्रतिशत से घटाकर 3.5% प्रतिशत पर ले आई है। भारत का विदेशी मुद्रा भण्‍डार आज 40 हजार करोड़ डॉलर के पार पहुंच गया है। रिजर्व बैंक का अनुमान है कि अगली तिमाही के जो आने वाले आंकड़े हैं उसमें जीडीपी ग्रोथ 7.7 तक होने की संभावना है ।

आंकड़ों को देखें तो कोयलाबिजलीस्‍टील और प्राकृतिक गैस से प्राप्‍त आय में भी काफी अच्छी वृद्धि दर्ज की जा रही है। देश में लोन के क्षेत्र में ग्रोथ देखने योग्‍य है। केपिटल मार्केटम्‍युचल फंड और बीमा क्षेत्र आज तेजी से प्रगति पथ पर है। कंपनियों ने आइपीओ के द्वारा इस साल पहले 6 महीने में ही 25 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की राशि मोबलाइज की है। गैर-वित्तीय संस्थान में कॉरपोरेट बॉन्ड और निजी नियुक्तियों के द्वारा सिर्फ चार महीने में ही 45 हजार करोड़ रुपयों का निवेश किया जा चुका है। मोदी कहते हैं कि ये ये सारे आंकड़े देश की मजबूत आर्थ‍िक स्‍थिति को दर्शाते हैं । इस सरकार ने समय और संसाधन  दोनों के द्वारा उसके सही इस्तेमाल पर लगातार जोर दिया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने जिस एक बात पर विशेष ध्‍यान दिलाया हैवह हैहमें देश में निराशा का माहौल पैदा करने से बचना चाहिए। इस वक्‍त देश आर्थिक विकास की ओर अग्रसर हैजिसमें हमें चाहिए कि देश के आम नागरिक होने के नाते हम अपने प्रधानमंत्री को इस रास्‍ते पर चलने के लिए और अधिक प्रोत्‍साहित करें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थ‍िक मोर्चे पर कही सभी तार्किक बातों को समझकर यदि हम सभी व्‍यवहार करेंगे तो निश्‍च‍ित मानिए वह दिन भी अतिशीघ्र आएगा जब देश विकासशील देशों की सूची से बाहर निकलकर विकसित देशों की श्रेणी में आ खड़ा होगा। 

रविवार, 11 दिसंबर 2016

एसोचैम की बातों को गंभीरता से लेने की जरूरत : डॉ. मयंक चतुर्वेदी


ड़े नोटों को बंद करने का निर्णय जिस तरह से सामने आयाउसके बाद देशभर से मिली-जुली प्रक्रिया अब तक आ ही रही है। विपक्ष जहाँ इसके लिए सरकार पर कई आरोप लगा रहा हैयहाँ तक कि देश की जीडीपी ग्रोथ गिरने तक की बात करने के साथ इससे जोडक़र अन्ये मुद्दों को भी प्रमुखता से उठा रहा है तो वहीं केंद्र सरकार से लेकर कई ऐसे संगठन भी हैं जो इस निर्णय के पक्ष में नजर आ रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने देश से  दो माह का समय व्यवस्था सुधारने एवं नोटबंदी की असुविधा से मुक्त होने के लिए मांगादेश ने वह भी प्रधानमंत्री जी को दिया है। इससे जुड़ा एक पक्ष यह भी सामने आया है कि नोट बंदी का फैसला पूर्व में लिया जा चुका थाकांग्रेस सरकार के समय भी इस पर विचार हुआ था किंतु तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राजनीतिक कारणों से अपनी मजबूरियों के चलते इसे लागू नहीं कर पाए थेजिसे कि मोदी ने अपने शासनकाल में पूरा किया है।

यानि की देर सवेर यह होना ही था जो हुआ। किंतु अब सरकार को जरूर वे निर्णय लेने चाहिए जिससे कि लोगों को आ रही तकलीफों से उसे पूरी तरह मुक्ति दिलाई जा सके। मसलनसरकार को इस नोटबंदी से अपना मुख्य उद्देश्य क्या पूरा करना था सभी जानते हैं कि नकली नोटों को व्यवस्था से बाहर करने के साथ आतंकवादनक्सलवाद जैसी देश विरोधी गतिविधियों की कमर तोडऩे के साथ देश के लोगों को यह अहसास कराना था कि देश के विकास के लिए धन की आवश्यकता होती हैयह धन जनता से कर के रूप में सरकारें प्राप्त करती हैं और उस कर के माध्यम से आया धन समग्र विकास की योजनाओं में व्यय किया जाता है।

देश में जितने भी लोग हैं यदि वे अपने हिस्से का ईमानदारी से कर देने लगें तो निश्चित मानिए कि हमारा देश दुनिया का सबसे अमीर देश बन जाएगा । विकास के मामले में हम अमेरिकाफ्र ासजर्मनीजापानइंलैण्ड जैसे समृद्ध देशों को अपने से कई मील पीछे छोडऩे का सामथ्र्य रखते हैं। आगे दूसरे किसी लेख में इसका गणित भी समझाने का प्रयास होगा कि प्रत्येक व्यक्ति का कर कैसे किसी देश को अमीर और गरीब बनाता हैफिलहाल यहाँ इतना ही कि केंद्र सरकार जो अपना संदेश देना चाहती थीवह देने में सरकार पूरी तरह सफल रही है। यह इससे भी समझा जा सकता है कि दुनिया में अमेरिका के राष्ट्रपति से ज्योदा भारत के प्रधानमंत्री की जय-जयकार हो रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्णयों पर पूरी दुनिया में आज बहुत अधिक चर्चा है। यह चर्चा भारत को छोडक़र अन्य देशों में सकारात्मक दृष्टिकोण से ही की जा रही है। निश्चित ही यह सरकार की एक बड़ी उपलब्धी हैपर अब जबकि नोटबंदी को एक माह से अधिक गुजर चुका हैसरकार के सिर्फ आश्वासन देनेभर से काम चलनेवाला नहीं है।



बाजार में जो अब नई समस्या आ रही हैवह है ज्यादातर एटीएम मशीने 100 और 500 के नोट देने के बदले 2000 का नोट उगल रही हैं। यदि किसी को अधिक रुपयों की जरूरत है तो वह या तो किसी से उधार ले अथवा अपना काम छोडक़र अपने खाता वाली बैंक में भागेकिसी तरह रुपए प्राप्त करे एवं काम चलाए। इसमें जो सबसे बड़ा सवाल उठाया जा रहा हैवह यह भी है कि हमारा पैसा है और उसे हम ही उपयोग नहीं कर पा रहे हैं शायद ही कोई हो जो रोज एटीएम की लाइन में लगकर प्रति सप्ताह 24 हजार रुपए निकालने में कामयाब रहा होगा। जहाँ तक कैसलेस सोसायटी बनाने का कार्य हैवह कुछ दिनों में तो हो नहीं जाएगा। केंद्र सरकार ने पहले चरण में ज्यादातर लोगों के जनधन योजना में ही सही खाते खुलवाए। खाते अभी भी नए खोले ही जा रहे हैं। दूसरे चरण में कहें कि यह नोटबंदी सामने आई है। इसका फायदा हुआगरीबों को भी जिनके बैंक खाते थेइसका लाभ मिला। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जो रोजमर्रा के छोटे-मोटे धंधे करके अपना घर चलानेवाले हैंउनका काम कैसे चले जबकि एटीएम मशीने छोटे नोट देने के स्थान पर बड़े नोट उगल रही हों। इसलिए यहाँ कहा जा रहा है कि एसोचैम (दि एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया) की ओर से जिन चिंताओं को व्याक्त किया गया हैउन्हें  सरकार को गंभीरता से लेना चाहिए।

एसोचैम कह रहा है कि नोटबंदी के बाद एफएमसीजीज्वैलरी और छोटे-मझोले उपक्रमों (एसएमई) सहित अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्र प्रभावित हुए हैं। जबकि असंगठित क्षेत्र में बड़ी संख्या में नौकरियाँ जा रही हैं। इसका सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर भी असर होगा। जिस तरह से इसका क्रियान्वयन हुआ उससे शायद प्रधानमंत्री भी खुश नहीं होंगे। कंज्यूमर गुड्स सेक्टर और छोटे व मझोले उद्यम भी इससे प्रभावित हुए हैं। एसोचैम की सरकार को सलाह है कि वह काले धन और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा नोटबंदी के वांछित नतीजों को हासिल करने के लिए बड़े कर सुधारों पर प्रमुखता से कार्य करे,जिसमें सरकार को टैक्स की दरें इस हद तक कम करनी होंगी जिससे काले धन का सृजन करने वाले हतोत्साहित हों। आयकर छूट की सीमा ढाई लाख रुपये से बढ़ाकर पांच लाख  रुपये की जानी चाहिए। इसी तरह 15 से 20 लाख रुपये की आय पर 10 फीसद की दर से कर लगना चाहिए। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की औसत दर को 18 से घटाकर 15 फीसद किया जाना चाहिए।


इसके अलावा जो कार्य सबसे जल्दी और अधिक केंद्र सरकार को करना हैवह है देश में छोटे नोटों की आवक एटीएम मशीनों तक ज्यादा से ज्यादा बनाना न कि 2000 के नोटों की । क्यों  कि इन्हीं छोटे नोटों पर छोटी पूंजीवाले की अर्थव्यवस्था  टिकी है और 70 प्रतिशत ग्रामीणजन पर आधारित भारत देश का मूल आधार भी यही छोटी पूंजीवाले लोक के जन हैं। 

लेखक : सेंसर बोर्ड एडवाइजरी कमेटी के सदस्य एवं पत्रकार हैं।