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शनिवार, 4 नवंबर 2017

आर्थ‍िक मोर्चे पर प्रधानमंत्री

: डॉ. मयंक चतुर्वेदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय अर्थव्यवस्था में सुस्ती को लेकर प्रतिपक्ष एवं अपनी पार्टी के कुछ नेताओं द्वारा लगाए गए आरोपों का जिस तरह से एक के बाद एक उत्‍तर दिया हैउसके बाद उन सभी लोगों को अवश्‍य ही यह समझ जाना चाहिए कि केंद्र की भाजपा सरकार मोदी नेतृत्‍व में जो भी निर्णय ले रही हैवह देश को स्‍थायी शक्‍ति सम्‍पन्‍न एवं अर्थ व्‍यवस्‍था की दृष्‍ट‍ि से मजबूत बनाने वाले ही हैं। सच यही है कि केंद्र में मोदी सरकार अपने कार्यकाल के पहले दिन से ही राष्‍ट्र को हर मोर्चे पर तकतवर बनाने की दिशा में स्‍थायी कार्य कर रही है ।

आज विपक्ष जो केंद्र पर सबसे बड़ा आरोप लगा रहा हैवह है कि देश की अर्थव्‍यवस्‍था पटरी से नीचे उतर गई हैजिसके कारण से रोजगार के अवसर कम हुए है। जीडीपी का बुरा हाल है। महंगाई चरम पर है। इस बार इन सभी आरोपों के उत्‍तर प्रधानमंत्री ने पॉवर प्वाइंट प्रजेंटेशन के सहारे देकर अपने आलोचकों को बिन्दुवार जवाब देने का प्रयास किया है। इस प्रस्‍तुतिकरण में प्रधानमंत्री मोदी ने कई पैरामीटर्स का जिक्र किया हैजिससे कि वर्तमान में देश की अर्थव्यवसथा की मजबूत स्थितिसरकार की निर्णय शक्ति और विकास की दिशा और गति को साक्ष्‍य सहित समझाया जा सके।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आलोचकों से प्रश्‍न किया है कि क्या ऐसा पहली बार हुआ है जब देश के जीडीपी की वृद्धि किसी तिमाही में 5.7 प्रतिशत पर पहुंची है पिछली सरकार में छह साल में आठ बार ऐसे अवसर आए,जब विकास दर 5.7 प्रतिशत या उससे नीचे गिरी थी। इतना ही नहीं तो देश की अर्थव्यवस्था ने ऐसी तिमाही भी देखी हैं जब विकास दर 0.2 प्रतिशत और 1.5 प्रतिशत थी और उस समय भारत की मुद्रास्फीति और चालू खाते का घाटा भी अधिक था। पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के कार्यकाल में अर्थव्यवस्था की स्थिति इतनी नाजुक हो गई थी कि भारत को "फ्रेजाइल फाइव" ग्रुप का सदस्य कहा जाने लगा था। उस समय बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों के रहते ऐसा कैसे हो गयाहमारे देश में जीडीपी से ज्यादा महंगाई की दर थी और बढ़ते राजकोषीय घाटे तथा बेकाबू चालू खाते के घाटे पर ही चर्चा होती थी।

प्रधानमंत्री ने यूपीए और एनडीए सरकार के तीन सालों के कार्यकाल की कुछ इस तरह से तुलना प्रस्‍तुत की कि उसे पढ़ लेने के बाद कोई यह नहीं कह सकताकि इस सरकार में देश आर्थ‍िक सुधारों की ओर अग्रसर न होकर एक पल के लिए भी अर्थ की कमजोर स्‍थ‍िति में आया दिखाई दिया हो। तुलनात्‍मक रूप से देखे तो पिछली सरकार के आखिरी तीन सालों में गांवों में 80 हजार किलोमीटर सड़क बनी थी और वर्तमान सरकार ने तीन साल में 1 लाख 20 हजार किलोमीटर सड़क बनाई है। यानि 50 प्रतिशत से ज्यादा ग्रामीण सड़कों का निर्माण हुआ है। पिछली सरकार आखरी के तीन साल में 15 हजार किलोमीटर राष्‍ट्रीय राजमार्ग बनाने के काम कियाजबकि भाजपा सरकार ने अपने तीन साल के कार्यकाल में 34 हजार किलोमीटर से ज्यादा राष्‍ट्रीय राजमार्ग बनवाया है।

इसी तरह रेलवे सेक्टर में पिछली सरकार के आखिरी तीन वर्षों में लगभग 1100 किलोमीटर नई रेल लाइन का निर्माण हुआ था और भाजपा शासन में 2100 किलोमीटर से ज्यादा तक पहुंच गए । वहीं इतने समय में पिछली सरकार ने 1300 किलोमीटर रेल लाइनों का दोहरीकरण किया तो मोदी सरकार में 2600 किलोमीटर रेल लाइन का दोहरीकरण किया गया है। पिछली सरकार के आखिरी के तीन वर्षों में 1 लाख 49 हजार करोड़ का पूंजीगत व्यय किया था तो इतने ही वर्षों में लगभग 2 लाख 64 हजार करोड़ रुपए का पूंजीगत व्यय एनडीए के कार्यकाल में संभव हुआ है । नवीकरणीय ऊर्जासौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा क्षेत्र में पिछली सरकार के बीते तीन वर्षों के कुल कार्यकाल में 12 हजार मेगावॉट की नई क्षमता जोड़ने के स्‍थान पर आज  इतने ही समय में 22 हजार मेगावॉट से ज्यादा ऊर्जा की नई क्षमता को ग्रिड पावर से जोड़ने में मोदी सरकार सफल रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि देश में विमुद्रीकरण के बाद सकल घरेलू उत्पाद अनुपात नकद में  नौ प्रतिशत आ गया हैजबकि यह पहले 12 प्रतिशत था । 10 प्रतिशत से ज्यादा की मुद्रास्फीति कम होकर अब इस साल औसतन 2.5 प्रतिशत पर आ गई है। केंद्र सरकार अपना राजकोषीय घाटा पिछली सरकार के 4.5% प्रतिशत से घटाकर 3.5% प्रतिशत पर ले आई है। भारत का विदेशी मुद्रा भण्‍डार आज 40 हजार करोड़ डॉलर के पार पहुंच गया है। रिजर्व बैंक का अनुमान है कि अगली तिमाही के जो आने वाले आंकड़े हैं उसमें जीडीपी ग्रोथ 7.7 तक होने की संभावना है ।

आंकड़ों को देखें तो कोयलाबिजलीस्‍टील और प्राकृतिक गैस से प्राप्‍त आय में भी काफी अच्छी वृद्धि दर्ज की जा रही है। देश में लोन के क्षेत्र में ग्रोथ देखने योग्‍य है। केपिटल मार्केटम्‍युचल फंड और बीमा क्षेत्र आज तेजी से प्रगति पथ पर है। कंपनियों ने आइपीओ के द्वारा इस साल पहले 6 महीने में ही 25 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की राशि मोबलाइज की है। गैर-वित्तीय संस्थान में कॉरपोरेट बॉन्ड और निजी नियुक्तियों के द्वारा सिर्फ चार महीने में ही 45 हजार करोड़ रुपयों का निवेश किया जा चुका है। मोदी कहते हैं कि ये ये सारे आंकड़े देश की मजबूत आर्थ‍िक स्‍थिति को दर्शाते हैं । इस सरकार ने समय और संसाधन  दोनों के द्वारा उसके सही इस्तेमाल पर लगातार जोर दिया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने जिस एक बात पर विशेष ध्‍यान दिलाया हैवह हैहमें देश में निराशा का माहौल पैदा करने से बचना चाहिए। इस वक्‍त देश आर्थिक विकास की ओर अग्रसर हैजिसमें हमें चाहिए कि देश के आम नागरिक होने के नाते हम अपने प्रधानमंत्री को इस रास्‍ते पर चलने के लिए और अधिक प्रोत्‍साहित करें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थ‍िक मोर्चे पर कही सभी तार्किक बातों को समझकर यदि हम सभी व्‍यवहार करेंगे तो निश्‍च‍ित मानिए वह दिन भी अतिशीघ्र आएगा जब देश विकासशील देशों की सूची से बाहर निकलकर विकसित देशों की श्रेणी में आ खड़ा होगा। 

शनिवार, 7 अक्टूबर 2017

केंद्र का सबके लिए आवास पर काम : डॉ. मयंक चतुर्वेदी



भारत में 80 के दशक में एक फिल्‍म आई थी रोटीकपड़ा और मकान । इस फिल्म में अभिनेता शशिकपूर का एक प्रसिद्ध डायलॉग है, किसी भले आदमी ने कहा है कि ये मत सोचो कि देश तुम्‍हें क्‍या देता हैसोचो ये कि तुम देश को क्‍या दे सकते हो और जब तक हम सब ये नहीं सोचते हमारा कुछ नहीं हो सकता । इसी के साथ इस फिल्‍म की पटकथा यह भी बताती है कि इंसान की सबसे पहली आवश्‍यकता उसकी पेट की आग का शांत होना और उसके बाद तन ढंकने के लिए कपड़े फिर आवास यानि की सिर पर छत का होना है। आज पुन: इस फिल्‍म की याद इसलिए हो आई क्‍योंकि केंद्र सरकार ने फैसला ही कुछ ऐसा लिया है। केंद्र सरकार ने आज किफायती आवास के लिए नई सावर्जनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) नीति की घोषणा की है। इसके अंतर्गत अब से निजी भूमि पर भी प्राइवेट बिल्‍डरों द्वारा निर्मित किए जाने वाले प्रत्‍येक मकान के लिए 2.50 लाख रुपये तक की केंद्रीय सहायता दी जाएगी। जिसके बाद कि अब उम्‍मीद की जा सकती है कि शहरी क्षेत्रों में सरकारी भूमि पर क्रियान्वित होने वाली किफायती आवास परियोजनाओं में निजी निवेश की संभावनाएं भी काफी हद तक बढ़ जाएंगी।

वास्‍तव में काले धन की गिरावट और सरकारी सिस्‍टम के समकक्ष खड़ी हो चुकी नई भ्रष्‍ट अर्थ व्‍यवस्‍था का ध्‍वस्‍त होता समयआज सीधे तौर पर बता रहा है कि अब वे दिन दूर नहीं जब भारत अपनी प्रगति की उड़ान भरने में दुनिया के किसी भी देश से पीछे रहेअर्थात समय के साथ वह तेजी से वैश्‍विक क्ष‍ितिज पर आगे बढ़ रहा है । वस्‍तुत: यह इसलिए भी कहा जा रहा है कि इन दिनों केंद्र एवं राज्‍य सरकारें देश की आम जनता को रोटी मुहैया कराने के बाद अपने देश की जनता को उसी के टैक्‍स के रूप में दिए पैसे से किसी दूसरे रूप में उसी तक अपनी सेवाएं निरंतर पहुंचा रही है । फर्क सिर्फ इतना है कि पूर्व की तुलना में विकास का सूचकांक यहां नया सेट किया गया है।

केंद्र सरकार द्वारा जनता तक पहुंचाई जानेवाली सुविधाओं में एक नई व्‍यवस्‍था यह जुड़ी है कि आवास और शहरी नीति के अंतर्गत किफायती आवास वर्ग में निवेश करने के वास्‍ते निजी क्षेत्र को आठ पीपीपी (सार्वजनिक-निजी भागीदारी) विकल्प दिए गए हैं। इस नीति का उद्देश्‍य सरकारडेवलपर्स और वित्तीय संस्थानों के समक्ष मौजूद जोखिमों को उन लोगों के हवाले कर देना हैजो उनका प्रबंधन बेहतर ढंग से कर सकते हैं। इसके अतिरिक्‍त जो सीधतौर पर समझ आता हैवह यह भी है कि इस नीति के अंतर्गत 2022 तक सभी के लिए आवास के लक्ष्‍य को हासिल करने के लिए अल्‍प प्रयुक्‍त एवं अप्रयुक्‍त निजी और सार्वजनिक भूमि का उपयोग भी किया जा सकेगा ।

निजी भूमि पर किफायती आवास में निजी निवेश से जुड़े दो पीपीपी मॉडलों में प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के ऋण संबंधी सब्सिडी घटक (सीएलएसएस) के तहत बतौर एकमुश्‍त भुगतान बैंक ऋणों पर ब्‍याज सब्सिडी के रूप में प्रति मकान लगभग 2.50 लाख रुपये की केन्‍द्रीय सहायता देना भी इसमें शामिल है। दूसरे विकल्‍प में अगर लाभार्थी बैंक से ऋण नहीं लेना चाहता है तो निजी भूमि पर बनने वाले प्रत्‍येक मकान पर डेढ़ लाख रुपये की केंद्रीय सहायता प्रदान की जाएगी। वस्‍तुत: सरकार ने यहां राज्यप्रमोटर निकायों और अन्य हितधारकों के साथ व्यापक विचार-विमर्श के बाद आठ पीपीपी विकल्प तैयार किए हैं जिनमें से छह विकल्‍प सरकारी भूमि का उपयोग करते हुए निजी निवेश के जरिए किफायती आवास को बढ़ावा देने से संबंधित हैं।

सरकारी भूमि के इस्तेमाल वाले छह मॉडलों में डीबीटी मॉडल को प्रमुखता से लिया गया है जोकि यह कहता है कि  प्राइवेट बिल्‍डर सरकारी भूमि पर आवास की डिजाइनिंग के साथ-साथ इसका निर्माण कर इन्‍हें सरकारी प्राधिकारियों को हस्‍तांतरित कर सकते हैं। निर्माण की सबसे कम लागत के आधार पर सरकारी भूमि आवंटित की जाएगी। तय पैमाने पर आधारित सहमति के अनुरूप परियोजना की प्रगति के आधार पर सरकारी प्राधिकारी द्वारा बिल्‍डरों को भुगतान किया जाएगा और खरीदार सरकार को भुगतान करेगा।

यहां जो दूसरा मॉडल लाया गया है वह है क्रॉस-सब्सिडी वाले आवास का मिश्रित विकासजिसके अनुसार प्राइवेट बिल्‍डरों को दिए गए प्‍लॉट पर निर्मित किए जाने वाले किफायती आवासों की संख्‍या के आधार पर सरकारी भूमि का आवंटन किया जाएगा। ऊंची कीमतों वाले भवनों अथवा वाणिज्यिक विकास से अर्जित होने वाले राजस्‍व से इस सेगमेंट के‍ लिए सब्सिडी दी जाएगी। इसी का एक पीपीपी विकल्प वार्षिकी आधारित रियायती आवास योजना हैजिसके अनुसार सरकार के स्थगित वार्षिकी भुगतान के सापेक्ष बिल्‍डर निवेश करेंगे। बिल्‍डरों को भूमि का आवंटन यहां आवास निर्माण की यूनिट लागत पर आधारित है।

केंद्र सरकार की ओर से आम जनता को सस्‍ते एवं शीघ्र समय में मकान उपलब्‍ध हो सके इस‍के लिए चौथे विकल्‍प के रूप में वार्षिकी सह-पूंजी अनुदान आधारित किफायती आवास को चुना हैजिसके अंतर्गत वार्षिकी भुगतान के अतिरिक्‍त बिल्‍डरों को एकमुश्‍त भुगतान के रूप में परियोजना लागत के एक हिस्‍से का भुगतान किया जा सकता है। वहीं प्रत्‍यक्ष संबंध स्‍वामित्‍व वाले आवास के अंतर्गत प्रमोटर सीधे खरीदार के साथ सौदा करेंगे और लागत राशि वसूलेंगे। दूसरी तरफ सार्वजनिक भूमि का आवंटन आवास निर्माण की यूनिट लागत पर आधारित है। सरकार ने जो अपना अंतिम पीपीपी विकल्प चुना है वह है प्रत्‍यक्ष संबंध किराये वाले आवास । वस्‍तुत: इससे सरकारी भूमि पर निर्मित आवासों से प्राप्‍त किराया आमदनी के जरिए बिल्‍डरों द्वारा लागत की वसूली किया जाना संभावित है।

यहां निष्‍कर्ष रूप से समझ सकते हैं कि सरकारी भूमि आधारित इन छह पीपीपी मॉडलों के अंतर्गत लाभार्थी प्रति मकान 1.00 लाख से लेकर 2.50 लाख रुपये तक की केन्‍द्रीय सहायता पा सकते हैं। वसतुत: देखाजाए तो आवास संबंधी इस निर्णय से देश के हर उस व्‍यक्‍ति को लाभ होगा जो अपना छोटा सा आशियाना चाहता है। इस निर्णय के बाद अब कहा जा सकता है कि सरकार ने आज अनेक तरह की रियायतों और प्रोत्‍साहनों के जरिए अनुकूल स्थितियां रियलस्‍टेट क्षेत्र में भी बना दी हैं।

यहां पुनश्‍च शशि कपूर को रोटीकपड़ा और मकान फिल्‍म के जरिए याद करते हुए कहना होगा कि वह जो कहता है,वह आज देशभर में जीएसटी जैसे कानून और उसके अनुपालन में आम जनता पर भी हूबहू लागू हो रहा है। इससे जनता जनार्दन को मिलनेवाले लाभ को जोड़कर भी देखा जा सकता है। देश में एक टैक्स-एक देश-एक मार्केट का सपना भले ही यर्थाथ हो रहा है लेकिन इसके विरोध में स्‍वर अभी भी तेज हैं। कारण लोगों के मन में कई तरह के कन्फ्यूजन का होना तथा टैक्स के सिस्टम में एकदम से आया बदलाव है।  परन्‍तु इसी के साथ सच यह भी है कि भारत सरकार के पास अब पहले जैसी धन की कोई कमी नहीं रही है। आमजन का पैसा उसके पास टैक्‍स के रूप में कई स्‍तरों पर तेजी के साथ पहुंच रहा हैयह अंतर पूर्व की तुलना में इतना अधिक है कि देश में चहुंओर होनेवाले द्रुत गति से विकास की सहज कल्‍पना की जा सकती हैइससे इस बात के लिए भी पूरी तरह से आशान्‍वित हुआ जा सकता है कि भविष्‍य में भारत का विकास बहुत तेजी से होगाजिसके लक्षण इस एक निर्णय से भी सीधेतौर पर दिखाई दे रहे हैंरोटी के बाद आवास देश के हर नागरिक की पहली जरूरत जो है।

शनिवार, 23 जुलाई 2016

कश्मीर समस्या पर प्रधानमंत्री को सुझाव

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की बैठक में कश्मीर मुद्दे को लेकर शि‍वसेना ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक उम्दा सुझाव दिया है । सुझाव यह था कि नवाज शरीफ के साथ तो चाय पर चर्चा हो गई, कभी कश्मीर के लोगों के साथ भी आप चाय पर चर्चा कीजिए। इस सलाह का महत्व ऐसे समय में और अधि‍क बढ़ जाता है, जब कश्मीर एक बार फिर किसी आतंकी के मारे जाने के बाद सुलग रहा है। यहां बात नवाज शरीफ के साथ मोदी के चाय पीने की तुलना नहीं हो रही, बल्कि बात इससे भी बहुत ज्यादा गंभीर है। वस्तुत: बात यह है कि हम उनके साथ तो चाय पी रहे हैं जो रात-दिन हमारे सीने में छुरा घोपनें का कार्य कर रहा हैं, लेकिन हम उनसे सीधा संवाद बनाने में सफल नहीं हो पा रहे जोकि हमारे देश का ही एक हिस्सा हैं। कश्मीर में कश्मीरियत के नाम पर हुर्रियत नेता यहां के युवाओं को बरगला सकते हैं तो क्यों नहीं सही और यथास्थ‍िति बयान कर इन युवाओं को देश के विकास में योगदान देने के लिए मुख्यधारा में जोड़ा जा सकता ? वास्तव में इस दिशा में एक नई पहल करने की जरूरत है।

आज यह सर्वविदित है कि कश्मीर में बिगड़े हालातों के लिए हमारा पड़ौसी मुल्क पाकिस्तान पूरी तरह जिम्मेदार है।  पाकिस्तान की इसी दखलंदाजी के कारण ही विगत दिनों हमारे गृहमंत्री राजनाथ सिंह को यहां तक कहना पड़ा था कि कश्मीर में आज जो कुछ हो रहा है वह सब पाकिस्तान प्रायोजित है और उसका नाम भले ही पाकिस्तान हो, लेकिन उसकी सारी हरकतें नापाक हैं। ऐसा पहली बार तो हुआ नहीं, जब कश्मीर में अलगाववाद और आतंकवाद को हवा देने के लिए पाकिस्तान ने यहां के युवाओं को गुमराह किया हो, यह काम रह-रह कर वह करता ही रहता है । हिजबुल मुजाहिदीन का आतंकी बुरहान वानी हो या उस जैसे तमाम युवा जो उसके बहकावे में आकर अपने देश से ही गद्दारी करने में लग जाते हैं। लेकिन इसके वाबजूद भी हमें अपने विश्वास को बनाए रखना होगा। आज नहीं तो कल घाटी के उन सभी युवाओं को यह बात ठीक ढंग से समझ में आ जाएगी कि कौन उनका सच्चा हितैषी है। वैसे तो यह बात उन्हें तभी समझ जाना चाहिए था जब कश्मीर में बाढ़ आई थी और भारतीय सेना ने बिना भेदभाव किये उनके जानमाल की हिफाजत की थी। लेकिन शायद यहां के अलगाववादी तथा इनके बहकावे में आ जाने वाली आवाम इस अनुभव से कुछ सीखना नहीं चाहती, निश्चित ही प्रकृति उन्हें और अवसर अपने वतन भारत के प्यार को समझने के लिए अवश्य ही देगी।
दूसरी ओर यह भी एक तथ्य है कि कश्मीर का सच दुनिया आज जान चुकी है, भले ही कुछ स्वार्थ से पूर्ण होकर सच्चाई स्वीकार्य न करें किंतु कहना होगा कि इसके वाबजूद भी विश्व के कई देशों ने कश्मीर में आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान की घेरेबंदी शुरू कर दी है, जिसके कि संकेत समय-समय पर पिछले दिनों देखने को मिले हैं। आने वाले दिनों में यह घेराबंदी ओर बढ़ेगी इतना तय है। लेकिन आज भी मूल बात यह है कि कश्मीर का अलगाववाद बंद कैसे हो और तत्काल में भारत विरोधी नारे तथा गतिविधि‍यों को कैसे समाप्त किया जा सकता है ? निश्चित ही वर्तमान परिस्थ‍ितियों में हमें कश्मीर को एक नए सिरे से देखना होगा। समस्या है तो उसका समाधान भी होगा । यह तो सुनिश्चित है‍ कि पाकिस्तान को कोसते रहने से काम नहीं चलने वाला, लेकिन उसकी अनदेखी भी संभव नहीं। इसलिए भारत सरकार को जो उपाए कूटनीतिक स्तर पर पाकिस्तान के साथ अंतर्राष्ट्रीय मंच पर करने हों वह करे किंतु इससे भी ज्यादा जरूरी है कि सबसे पहले वह कश्मीरियों से सीधे संवाद बनाने की व्यवस्था बनाए।
शिवसेना नेता संजय राउत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सही सलाह दी है‍ कि कश्मीर के लोगों के साथ चाय पर चर्चाकरें। साथ में यह भी जरूरी है कि यह चर्चा एक बार की होकर न रह जाए, इस प्रकार के प्रयोजन सतत करने होंगे, क्योंकि कश्मीर में अलगाववादी और पाकिस्तान परस्त तत्व कश्मीरी युवाओं को बहकाने एवं बरगलाने में समर्थ हैं। उनकी यह समर्थता हो सकती है, धर्म के आधार पर हो, यह भी संभव है, कि कश्मीरियत यानि विशेष संस्कृति की दुहाई देकर इन्हें भारत से अलग रखने का षड्यंत्र चलाया जाता हो, यह भी हो सकता है कि बगैर काम किए ही इस क्षेत्र के अधि‍कांश नौजवानों को धन का लालच दिया जाता हो या अन्य कोई और कारण भी इसके पीछे संभव है। ऐसे तत्वों के समक्ष कश्मीर के राजनीतिक दल भी असहाय-अक्षम नजर आते हैं। कई बार तो यहां के राजनीतिक दलों के आए बयानों और भाषणों को सुनकर समझ नहीं आता कि राजनीतिक दल कौन सी भाषा बोल रहे हैं ? ये राजनीतिक दलों की भाषा है या भारत विरोधियों की। वास्तव में ये उन तमाम राजनीतिक दलों की अपनी साख बनाए रखने की मजबूरी भी हो सकती है। इसलिए सार्थक संवाद, बार-बार की बातचीत कश्मीर की जनता और यहां के छोटे-बड़े राजनीतिक दलों से साथ होती रहे यह बेहद जरूरी है।

कश्मीर के हालात बिगड़ने का एक बड़ा कारण यह भी है कि जाने-अनजाने इस भाव को मजबूत किया गया कि यह भारतीय भू-भाग देश के अन्य हिस्सों से कुछ विशेष है। वस्तुत: अनुच्छेद 370 जिसके कारण से कश्मीर को कुछ खास रियायतें और सुविधाएं मिलती रही हैं, जिसके कारण कुछ हद तक यहां के लोगों में सुविधाभोगी होने का प्रचलन तेजी से पनपता रहा, जिसके परिणामस्वरूप हम कह सकते हैं कि आगे चलकर यही अनुच्छेद 370 इसके अलगाववाद का मुख्य आधार बन गया । इसलिए भी चाय के बहाने लगातार संवाद की यहां आवश्यकता है। कश्मीर में यदि इस प्रकार की नई पहल की जाती है तो यह तय मानिए कि कश्मीरी जनता का एक बड़ा वर्ग खुद को भारत के साथ जोड़ने के लिए तैयार हो जाएगा। लगातार के संवाद के अलावा कश्मीरियों को लेकर फिलहाल तो अन्य कोई स्थायी हल यहां की शांति बहाली के लिए सूझता नहीं है।
: डॉ. मयंक चतुर्वेदी