विचार की शक्ति असीम है। संसार में जितने भी परिवर्तन हुए हैं, निश्चित ही उनके पीछे विचारों का अहम योगदान है। आओ हम सब मिलकर सार्थक विचार और क्रिया के माध्यम से शक्ति -सम्पन्न तथा सहयोगात्मक मानव संरचना का निर्माण करें..।
शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2021
विश्व में निवेशकों की पसंद का देश बना भारत
तालिबान, शरिया कानून और भारत
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
पटकथा लिखी जा चुकी है, अभी सरकार नहीं बनी लेकिन यह तय हो गया है कि प्रारंभ से ही कौन से देश आतंकी तालिबानियों के साथ हैं। इसमें सबसे ज्यादा खतरा यदि किसी मुल्क को है तो वह भारत है और जो देश अफगानिस्तान में बने वर्तमान हालातों में सबसे अधिक लाभ देख रहा है, वह चीन है। हालांकि चीन के साथ ही अभी पाकिस्तान, टर्की और रूस ने अफगानिस्तान में अपने दूतावास बंद नहीं करके यह साफ संकेत दे दिए हैं कि वे नई तालिबानी हुकूमत के साथ जाएंगे।
वस्तुत: यह सर्वविदित है कि तालिबान की सोच इस्लाम का दुनिया भर में परचम लहराना है। हर हाल में इस्लाम की सत्ता और हर जगह शरिया कानून लागू करने का सपना इस तालिबान के हुक्मरानों का है। इसके लिए अपनी शक्ति से भी आगे तक जाने के लिए तालिबानी लड़ाके तैयार रहते हैं। दीन के प्रति समर्पण और मरने के बाद तमाम हूरों का सपना इन पर पूरी तरह से हावी है। यही कारण है कि तालिबान जब पिछली बार अफगानिस्तान में की सत्ता में आए, उन्होंने शरिया कानूनों के नाम पर कहर ढाया था। इस्लाम की सत्ता का अहंकार इस कदर इन पर हावी हुआ कि इन्होंने अमेरिका तक को चुनौती दे डाली और 9/11 की घटना घटी। अमेरिका में 2001 को हुए इस आतंकी हमले में तीन हजार से अधिक लोगों की मौत हुई और हमले की जिम्मेदारी इस्लामिक संगठन अल-क़ायदा के प्रमुख ओसामा बिन लादेन ने ली थी ।
पूरी योजना अफगानिस्तान से संचालित थी जहां पर कि कट्टरपंथी इस्लामिक समूह तालिबान का ही शासन था। तालिबान ने जब ओसामा को अमेरिका के हवाले करने से इनकार किया, तब मजबूरन 11 सितंबर की घटना के एक माह बाद से अमेरिका आतंकवादियों के इन दोनों ही संगठनों को समाप्त करने की मंशा से सीधे सामने आकर लड़ाई लड़ने लगा। उसने अफगानिस्तान में हवाई हमले शुरू किए। असर भी व्यापक दिखा, लेकिन फिर क्या ? 20 सालों के लम्बे संघर्ष के बाद हालत फिर वहीं आकर ठहर गए हैं। इसका जो सबसे बड़ा कारण सीधे तौर पर नजर आता है, वह है अफगानिस्तान की अधिकांश जनता का तालिबान के सामने समर्पण कर देना। शरिया कानूनों को अमल में लाने का उनका आग्रह, जिसमें कि अफगान सेना का तीन लाख की संख्या में होने के बाद भी 70 हजार तालिबानियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया जाता है। ऐसे में विचार करें कि वर्तमान परिस्थितियों में भारत कहां है, उसके अफगानिस्तान से जुड़े हित क्या हैं और वर्तमान हालातों में उनका क्या होगा ?
इस संदर्भ में देखा जाए तो अफगानिस्तान में भारतीय मिशनों पर हुए हमलों में तालिबान की सीधी भागीदारी अबतक रहती आई है। 1999 में आईसी-814 विमान का अपहरण आज भी हर देशभक्त भारतीय को चुभता है जिसमें जैश-ए -मोहम्मद प्रमुख मौलाना मसूद अजहर, अहमद ज़रगर और शेख अहमद उमर सईद को छोड़ने के बदले इस कंधार विमान अपहरण कांड में यात्रियों को सकुशल भारत को लौटाने की शर्त तालिबान की ओर से रखी गई थी। दरअसल, तालिबानी सत्ता को लेकर भारत के समक्ष सबसे बड़ा संकट वैचारिकी का भी है। एक तरफ भारत है जो सर्वपंथ सद्भाव एवं धर्म आधारित व्यवस्था को समान रूप से देखता है, जबकि इसके उलट तालिबान है जिसके लिए इंसानियत से भी ऊपर उसका मजहब है। हदीस की शिक्षाएं हैं और शरीयत कानून है। कुरान के आईने से वह पूरी दुनिया बना देना चाहता है, फिर इसके विरोध में यदि कोई इस्लाम को मानने वाला खड़ा हो जाए या तार्किक रूप से यदि कोई उनसे प्रश्न करेगा तो वह तालिबानियों के हाथों तुरन्त मार दिया जाएगा। ऐसे में उनके लिए अपने मजहब का होना भी मायने नहीं रखता।
इस सब में दुखद पक्ष यह है कि फ्रांस, भारत या अन्य देश में घटी किसी घटना पर दुनिया भर में शोर मचानेवाली इस्लामिक भीड़ आज अफगानिस्तान के समूचे घटनाक्रम पर मौन नजर आ रही है। भारत में पिछले एक दिन भी तालिबानियों की बर्बरता को लेकर जुलूस नहीं निकाला गया और ना ही किसी अन्य देश से ही ऐसी तस्वीरें सामने आईं हैं, जबकि वास्तविकता यही है कि जिन लोगों पर तालिबान अभी कहर ढा रहा है वे सभी इस्लाम को ही मानने वाले हैं, हां शरिया कानून के पक्ष में पूरी तरह से नहीं हैं। ये सभी आधुनिक मुसलमान महिलाओं को भी बहुत हद तक सामान्य रूप से स्वतंत्रता देने एवं शिक्षा के समान अधिकार देने की वकालत करते आए हैं। सोचने वाली बात है, क्या अफगानिस्तान और फिलिस्तीन में मरने वाले अलग-अलग तरह के सलीम और अब्दुल हैं ? जो अबतक काबुल बचाओ, अफगानिस्तान बचाओ जैसा कोई हैशटैग नजर नहीं आया ? नेशनल इंटरनेशनल सैलिब्रिटीज, शांतिदूतों की पूरी फौज जैसे तालिबान की इस सत्ता को मौन समर्थन देती नजर आ रही है। वास्तव में भारत को आज खतरा इसी मौन से है।
हाल ही में एक अध्ययन सीधे तौर पर इसी खतरे की ओर इशारा भी करता है। अमेरिकी थिंक टैंक ''प्यू रिसर्च सेंटर'' की एक स्टडी में यह बात खुलकर सामने आई है। ''रिलिजन इन इंडिया : टॉलरेंस एंड सेपरेशन'' टाइटल से प्रकाशित रिपोर्ट में इसका खुलासा बहुत स्पष्टता के साथ किया गया है। रिपोर्ट बताती है कि भारत में 74 प्रतिशत मुस्लिम आबादी इस्लामी अदालतों यानी कि शरीयत के कानून को लागू करने के पक्ष में हैं। 59 प्रतिशत मुसलमानों ने भी विभिन्न धर्मों के अदालतों का समर्थन किया है। इसका मतलब यह हुआ कि भारत में हर चार मुसलमान में से तीन शरिया अदालत चाहते हैं। यही सोच वास्तव में आज भारत के लिए संकट की घंटी बजा रही है।
वस्तुत: भारत जैसे देश जहां बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय रहता है, जब धर्म के आधार पर देश का विभाजन हुआ, तब इस बहुसंख्यक समाज ने यही कहा था कि जो भी मुसलमान विभाजित भारत में रहना चाहता है, वह यहां उतने ही अधिकार के साथ रहे जितना कि एक हिन्दू का यहां अधिकार है। कानून बनाते वक्त, संविधान का निर्माण हो रहा था, उस समय भी बहुसंख्यक हिन्दुओं के तंत्र ने हर उस अल्पसंख्यक का ध्यान रखा, जिनकी संख्या बहुसंख्यक समाज से कम थी। आज सबसे बड़ा अल्पसंख्यक मुसलमान है और जितनी भी भारत सरकार की अल्पसंख्यकों के लिए योजनाएं चल रही हैं या पिछड़े वर्ग की योजनाएं चल रही हैं, उनमें जनसंख्या के अनुपात में सबसे अधिक लाभ लेनेवाला भी आज यही मुसलमान समुदाय है।
इतना ही नहीं तो धार्मिक स्थानों पर जहां एक तरफ मंदिरों का सरकारीकरण करते हुए उसके लाभ को सरकार लेने में जरा भी देरी नहीं करती तो दूसरी तरफ उन्हें (अल्पसंख्यक को) हर तरह का शिक्षा संस्थानों के साथ धार्मिक संस्थानों का लाभ वर्ष 1947 से आजतक दिया जा रहा है। बहुसंख्यक हिन्दू समाज के टैक्स पर अल्पसंख्यकों के लिए तमाम जनकल्याणकारी योजनाएं-शिक्षा एवं अन्य चलाई जा रही हैं, किंतु इसके बाद भी देश का बहुसंख्यक समाज यह नहीं कहता कि हमारे लिए भारतीय संविधान में स्वीकृत व्यवस्था से अलग कोई व्यवस्था बनाई जाए, जबकि यह अध्ययन एक चुनौती देता है खासकर मुसलमानों के संदर्भ में जो कि भारत में भी 74 प्रतिशत की संख्या में शरिया कानून को अमल में लाने की इच्छा रखते हैं। अब तय हम सभी को करना है कहीं इस सहमति से तालिबानी सोच तो भारत में नहीं बलवती हो रही? यदि ऐसा है तो अफगानिस्तान का यह घटनाक्रम भारत के लिए एक संकेत है। जिसे हर देशभक्त को पंथ और धर्म से ऊपर उठकर समझने की आवश्यकता है।
बुधवार, 30 दिसंबर 2020
वाद-विवाद-संवाद और मामा माणिकचंद्र वाजपेयी
वाद का अपना एक विवाद हो सकता है। कई बार वाद को लेकर छिड़ी बहसों ने संसद और विधानसभाओं में विवाद को इतना बढ़ाया है कि माननीय अपने क्रोध की सीमाएं तक त्याग गए, किंतु इसके बाद कहना होगा कि वाद इस धरती पर उस सनातन व्यवस्था का हिस्सा है जब से मनुष्य का सृष्टि में जन्म हुआ और संवाद की परंपरा का विकास हुआ है । मनुष्य का ही क्यों जीव-जन्तु और पशु-पक्षी, सरीसर्प तक जो भी चराचर जगत में विचार रखता है। वहां यह वाद आपको देखने को मिल जाएगा, भले ही फिर उसका स्वरूप क्षणिक या खण्डित ही क्यों न हो।
वस्तुत: यह दृष्टि ही है जो आपको भिन्न बनाती है, विशेष बनाती है और परस्पर एक जैसी या लगभग सहमति के स्तर पर एक-दूसरे के नजदीक लाती है। इन अनेक वादों-विवादों और दृष्टि के बीच एक राष्ट्रवाद का संवाद भी है, जो विचार सांस्कृतिक एवं भौतिक स्वरूप के साथ अपने समूह, समाज एवं राज्य की सीमाओं, कई बार इससे इतर आगे होकर भी एक संस्कृति के आधार पर राज्य, भौगोलिक सीमाओं में आबद्ध देश व इससे मुक्त समाज को एक बनाता है। अनेक लोग अपने देश और समाज के लिए करना बहुत कुछ चाहते हैं, करते भी हैं, किंतु इसके बीच कुछ विशेष ही होते हैं जो कुछ विलक्षण कर जाते हैं।
भारतीय पत्रकारिता में मामाजी यानी कि माणिकचंद वाजपेयी भी एक ऐसा नाम हैं, जिनका संपूर्ण जीवन एक दृष्टि, एक वाद, संवाद के एक सुर को साकार करने में व्यतीत हुआ, जिसमें भारत और मां भारती ही प्रथम एवं अंतिम रहे । किसी ने उन्हें भारतीय बल्कि विश्व भर के पत्रकारिता जगत की अमूल्य औऱ अनुकरणीय निधि कहा, तो किसी ने उन्हें निर्मोही औऱ परमहंस।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह श्री सुरेश सोनीजी का उनके लिए कहा गया यहां स्मरण हो आता है। उन्होंने हाल ही में भोपाल में आयोजित एक आयोजन के दौरान कहा था कि मामा जी जिस धारा में विकसित हुए, उस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की परंपरा में व्यक्ति का व्यक्तित्व इस नाते से जानकारी बहुत कम हो पाती है, क्योंकि इस धारा में यही कहा गया है कि सामने जो कुछ है वह राष्ट्र और समाज का है इसलिए जो कुछ यश गान करना है राष्ट्र और समाज का ही करना है, फिर भी मामा जी को आज हम याद कर रहे हैं वह इसलिए कि उन्होंने पत्रकारिता में जो कुछ किया वह अद्वितीय है । भारतीय सनातन आदर्श को अभिव्यक्त करने वाले वह व्यक्ति रहे हैं, व्यक्ति एक संज्ञा है लेकिन यह संज्ञा अपने आदर्श के कारण विशेषण बन जाती है, जैसे एक प्रतिज्ञा-संकल्प है। भीष्म ने उसे ऐसा जिया की प्रतिज्ञा और भीष्म में कोई अंतर नहीं रहा । यहां संज्ञा और विशेषण एक हो गए । वैसे ही आज माणिकचन्द्र वाजपेयी यह नाम एक विशेषण बन गया है। जैसे कोई कहता है राष्ट्र समर्पित जीवन तो मामाजी जैसा जीवन याद आता है। यानी कि मानिकचंद बाजपेई मामाजी का जीवन भी राष्ट्र समर्पित इस प्रकार से रहा कि वह और राष्ट्र उनका पूरा जीवन, उनक संपूर्ण चित्त एक हो गए थे।
इसी प्रकार से उनके बारे में प्रख्यात पत्रकार श्री राजेन्द्र शर्मा का कहा करते हैं कि मामाजी का मूलतः एक ही सार्वजनिक व्यक्तित्व था जिसमें निश्छलता औऱ निष्कपटता के अलावा कोई दूसरा तत्व समाहित ही नहीं, इसीलिए वे हर सम्पर्क वाले आदमी को अपने आत्मीयजन का अहसास कराते। उनके लेखन का मूल्यांकन केवल राष्ट्रीयता को प्रतिबिंबित औऱ प्रतिध्वनित करता है। सादगी, सरलता और निश्छलता के पर्याय मामाजी उन विरले पत्रकारों में शामिल हैं, जिन्होंने पत्रकारिता को देश, समाज और राष्ट्रीय विचार की सेवा का माध्यम बनाया और सामाजिक और राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर उन्होंने सदैव समाज को जागरूक किया।
वास्तुत: जिसका उदाहरण सिर्फ दैनिक स्वदेश का संपादकत्व नहीं इससे आगे उनकी लिखी पुस्तकें व लेख मालाएं हैं। आपातकाल, हिन्दुत्व, जम्मू-कश्मीर, स्वदेशी, श्रीराम जन्मभूमि, जातिवाद, छद्म धर्मनिरपेक्षता, शिक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और देश के स्वाभिमान से जुड़े विषयों पर लगातार उनकी लेखनी चली । वे अक्सर कहा करते थे, ‘मेरी पहचान मेरे कपड़ों से नहीं, मेरे विचारों से है’। न कोई व्यक्तिगत इच्छा, न आकांक्षा, न सम्मान और न अपमान की चिंता। मूल्य आधारित पत्रकारिता और उसके प्रति समर्पण का भाव ही उनके जीवन का सदैव आदर्श रहा । लेकिन उन्हें लेकर वह दौर भी आया जब राजनीतिक इच्छाओं ने ऐसे महान ध्येय निष्ठ पत्रकार को सिर्फ राजनीति के चश्मे से भी देखा। यह कहकर कि वे आरएसएस से जुड़े थे।
पिछली सरकार में हम सभी ने देखा कि कैसे राष्ट्रवादी पत्रकारिता के लिए ध्येय निष्ठ पत्रकारिता के राष्ट्रीय सम्मान को एक झटके में बंद कर दिया गया था। वास्तव में प्रदेश में सरकार बदलने के बाद जिस तरह से फिर मामाजी को याद किया जा रहा है, वह सिर्फ इस सरकार की वाहवाही नहीं है, बल्कि उन सभी ध्येय निष्ठ पत्रकारों का भी सम्मान है, जिनके लिए कवि ''रामावतार त्यागी'' के शब्दों में कहें तो ‘मन समर्पित, तन समर्पित और यह जीवन समर्पित। चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ’ है।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, हरियाणा और त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी और भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्रीधर पराड़कर जी ने प्रख्यात पत्रकार स्व. माणिक चंद्र वाजपेयी के जन्म शताब्दी वर्ष के समापन अवसर कार्यक्रम में डाक टिकट अनावरण किया है । संयोग से इन तीनों महानुभावों का मामाजी से जीवंत संपर्क रहा है। इस अवसर पर इन तीनों महानुभावों ने जो कुछ कहा, उससे यह स्पष्ट है कि मामा माणिकचंद्र वाजपेयी का महत्व ध्येयनिष्ठता की पत्रकारिता करनेवालों और भारत को परमवैभव पर देखनेवाले पत्रकारों के लिए कभी कम नहीं होनेवाला है ।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का यह कहना बिल्कुल सही है कि आज भी लाखों कार्यकर्ताओं और सैकड़ों पत्रकारों के लिए मामाजी का समर्पित जीवन प्रेरणापुंज है । भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री व वरिष्ठ साहित्यकार श्रीधर पराड़कर का कथन भी उनके लिए सही है, जो हम कहानियों में पढ़ते हैं, गणेश शंकर विद्यार्थी, लोकमान्य तिलक के बारे में कि वे कैसे श्रेष्ठ पत्रकार और संपादक रहे, वास्तव में वैसे ही हमारी आंखों के सामने व्यक्ति हुए हैं जिन्हें देखकर कहा जाए कि पत्रकार को कैसा होना चाहिए तो आचरण के स्तर पर मामाजी के रूप में हमें वे प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं।
वहीं, उनके नाम से मध्यप्रदेश सरकार द्वारा ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता के लिए स्थापित राष्ट्रीय पुरस्कार पुन: प्रारंभ करना और इस अवसर पर यह कहना कि वास्तव में मामाजी को अपने जीते जी किसी पुरस्कार की इच्छा नहीं थी वह इससे ऊपर थे, लेकिन हमारे लिए उनके आदर्श को आगे बढ़ाते हुए चलने के लिए यह जरूरी है कि उनके चरणों में यह राष्ट्रीय पुरस्कार अर्पित रहे, ताकि हम उनके विचारों से निरंतर अच्छी बातें सीखते रहें और उनसे प्रेरणा लेकर पत्रकारिता में एक राष्ट्रवादी धारा निरंतर प्रवाहमान बनी रहे।
ऐसे में सही पूछा जाए तो यह मामाजी का सम्मान समूचे पत्रकारिता जगत का ही सम्मान है, जिनके लिए राष्ट्रवाद का विचार एवं दर्शन ही सर्वोपरि है । मध्य प्रदेश सरकार को बहुत साधुवाद।
लेखक फिल्म प्रमाणन बोर्ड एडवाइजरी कमेटी के पूर्व सदस्य एवं पत्रकार हैं ।
शुक्रवार, 1 जून 2018
किसानों की मतलब परस्ती पर क्यों नहीं उन्हें धिक्कारना चाहिए ? डॉ. मयंक चतुर्वेदी
शनिवार, 21 अप्रैल 2018
उच्चशिक्षा में भारत का विस्तार : डॉ मयंक चतुर्वेदी
भारत में इन दिनों जो स्थितियां बन पड़ी हैं, उसमें उच्च शिक्षा क्षेत्र के लिए अनेक अवसर उपलब्ध हैं। केंद्र सरकार द्वारा लगातार इस संबंध में किए जा रहे प्रयास और उसके अनुवर्तन में राज्य सरकारों द्वारा अपने यहां का हायर एजुकेशन मॉडल सुदृढ़ करने के लिए किए जा रहे प्रयत्नों के फलस्वरूप समूचे देश में एक बदला-बदला सा नजारा दिखाई दे रहा है। निश्चित तौर पर इसके लिए केंद्र की भाजपानीत मोदी सरकार को श्रेय दिया जा सकता है। वस्तुत: देखा जाए तो आज भारत का उच्च शिक्षा तंत्र विश्व का तीसरा सबसे बडा उच्च शिक्षा तंत्र है। स्वतंत्रता के बाद से देश के विश्वविद्यालयों की संख्या में 11.6 गुना, महाविद्यालयों में 12.5 गुना, विद्यार्थियों की संख्या में 60 गुना और शिक्षकों की संख्या में 25 गुना वृद्धि हुई है। सभी को उच्च शिक्षा के समान अवसर सुलभ कराने की नीति के अन्तर्गत सम्पूर्ण देश में महाविद्यालयों प्रयास निरंतर हो रहे हैं।
गुरुवार, 8 मार्च 2018
# अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस और हम
बुधवार, 7 मार्च 2018
केंद्र की नीति से मर जायेंगे लघु उद्योग
मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018
भारत, जनसंख्या और दुष्परिणाम : डॉ. मयंक चतुर्वेदी
शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018
राममंदिर ,कट्टरता, और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड : डॉ. मयंक चतुर्वेदी
दो विद्वान, दोनों ही इस्लाम के उम्दा जानकार । दोनों का एक विषय पर स्वर भी एक कि उन्हें कभी हिन्दुओं से कोई दिक्कत नहीं हुई। हिन्दुओं ने हमेशा इज्जत और प्यार दिया है। पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष मौलाना कल्बे सादिक और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए सुलह का फार्मूला देने वाले मौलाना सैयद सलमान हुसैनी नदवी आज दोनों ही यह बात सार्वजनिक रूप से स्वीकार्य कर रहे हैं। कहने को लोग कह सकते हैं कि ये दोनों न्यायालय के बाहर से राममंदिर निर्माण का रास्ता सुझाने के लिए अब तक लगातार प्रयास करते हुए अपने मुस्लिम भाईयों के बीच इस बात की सहमति बनाने के लिए प्रयास करते रहे हैं कि भगवान राम का भव्य मंदिर यदि विवादास्पद स्थान पर बन जाता है तो उसमें हर्ज ही क्या है? लेकिन इस्लाम के अपने नियम और कानून है, जिसके ऊपर कोई नहीं।
उच्चशिक्षा का नैतिक पतन
गुरुवार, 25 जनवरी 2018
अल्पसंख्यकों के लिए मोदी सरकार ये क्या कर रही है : डॉ. मयंक चतुर्वेदी
इस विषय में केंद्र की हाल ही संचालित हुईं विभिन्न छात्रवृत्ति योजनाओं को देखा जा सकता है, जिसमें कि "बेगम हजरत महल कन्या छात्रवृत्ति योजना" अल्पसंख्यक समुदाय के बीच महिला सशक्तिकरण एवं शैक्षिक सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुई है। आंकड़े देखें तो पिछले 3 वर्षों में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने भिन्न-भिन्न छात्रवृत्ति योजनाओं में 1 करोड़ 5 लाख से भी ज्यादा विद्यार्थियों को लाभ पहुंचाने में सफलतम कार्य किया है ।



































